ईरान के बाद सीरिया ने भी सऊदी से जोड़ा रिश्ता, अरब वर्ल्ड में बदल गई राजनीति, अमेरिका कैसे हुआ बाहर?
अरब वर्ल्ड की राजनीति अभी तक काफी अशांति रही है और सीरिया के साथ साथ इराक वार ने भी अरब देशों को स्थिर नहीं होने दिया। लेकिन, अब अरब वर्ल्ड में चीन ने भी अपनी राजनीति शुरू कर दी है।

Middle East News: जियो-पॉलिटिक्स के लिहाज से मार्च महीना कई मायनों में कई आश्चर्यों से भरा रहा, खासकर इस महीने की वैश्विक राजनीति में चीन लगातार चर्चा में बना रहा है। सबसे पहले तो दुनिया इस बात पर चौंकी, कि ईरान और सऊदी अरब के बीच चीन की मदद से दोस्ती कायम हो गई और फिर दूसरा सरप्राइज ये आया, कि सीरिया और सऊदी अरब में भी डिप्लोमेटिक रिश्ता कायम हो गया है। यानि, अरब वर्ल्ड इस महीने दुनिया के केन्द्र में रहा और जो अरब वर्ल्ड अब तक अमेरिका के इशारे पर काम करता था, वहां से अमेरिका की विदाई होने के पुख्ता प्रमाण मिलने लगे हैं। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब और सीरिया, ईद के बाद एक दूसरे के देश में अपने-अपने दूतावासों को फिर से खोलने के लिए राजी हो गये हैं।
सीरिया और सऊदी अरब में दोस्ती के मायने
सीरिया और सऊदी अरब के बीच फिर से डिप्लोमेटिक रिश्ता कायम होना, अपने आप में बहुत बड़ी खबर है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद, जिन्हें सीरियाई नागरिकों के खिलाफ उनके शासन द्वारा किए गए अपराधों के कारण अरब नेताओं द्वारा त्याग दिया गया था, उन्हें एक बार फिर से अरब देशों में स्वागत किया जाएगा। माना जा रहा है, कि सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद, जल्द ही अरब देशों में होने वाले कार्यक्रमों में दिखाई देंगे, जबकि उन्हें अरब देशों के शिखर सम्मेलन से अरब लीग ने 2011 में ही सस्पेंड कर दिया था। लिहाजा, अरब देशों में राष्ट्रपति बशर अल-असद की वापसी का मतलब ये है, कि रूस और चीन का वर्चस्व खाड़ी देशों में और बढ़ेगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि राष्ट्रपति बशर अल-असद को रूस का समर्थन प्राप्त है और पुतिन की मदद से ही वो लगातार सीरिया में राष्ट्रपति चुनाव एकतरफा मुकाबले में जीतते हैं। रूस की सेना सीरिया सरकार को सैन्य मदद देती रहती है, जिससे सीरिया में सरकार विरोधियों को कुचल दिया गया है।

सीरिया के ऊपर से हटेगा सस्पेंसन?
कुछ दिन पहले, सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद ने संकेत दिया था, कि अरब लीग से सीरिया के निलंबन को हटाया जा सकता है। हालांकि, फिलहाल ये कहना जल्दबाजी होगा, कि आखिर कब तक सीरिया से प्रतिबंध हटेगा, लेकिन अप्रैल महीने में ही अरब लीग की अगली बैठक है, लिहाजा अब पूरी दुनिया की नजर अरब वर्ल्ड पर है, कि क्या सीरियाई राष्ट्रपति को न्योता भेजा जाता है? नवंबर 2011 में अरब स्प्रिंग के समय सीरिया को अरब लीग से सस्पेंड कर दिया गया था, जब सीरियाई शासन ने लगभग 5,000 प्रदर्शनकारियों और विरोधियों को मार डाला था। देश में छिड़े गृह युद्ध के अगले दस सालों में, विभिन्न घरेलू और विदेशी ताकतें, सीरिया में आपस में उलझती रहीं और एक-दूसरे से लड़ती रही, जिसकी वजह से सीरिया में कम से कम 6 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। बशर अल-असद शासन ने मानवाधिकारों का जमकर उल्लंघन किया है और कई मौकों पर उन्होंने रासायनिक हथियारों का भी इस्तेमाल किया है। लिहाजा, ज्यादातर अरब देशों ने सीरिया के वरिष्ठ अधिकारियों पर यात्रा प्रतिबंध और सेंट्रल बैंक ऑफ सीरिया के साथ निवेश और व्यवहार की सीमा सहित अन्य प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन, क्या अब ये प्रतिबंध हट जाएंगे और क्या अरब देश अब मानवाधिकार उल्लंघन को भूल जाएंगे? बड़ा सवाल है।

अरब देशों में सीरिया का प्रभाव कितना?
अरब देशों में सिर्फ इराक, लेबनान और यमन ही हैं, जिन्होंने सीरिया पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था, जहां हाफ़िज़ अल-असद के सहयोगी ईरान का बहुत प्रभाव है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने पिछले साल संयुक्त राष्ट्र महासभा के सामने बोलते हुए कहा था, कि सीरियाई सरकार "मानव अधिकारों और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के बड़े पैमाने पर उल्लंघन" के लिए जिम्मेदार है और उन्होंने कहा था, कि "इन अपराधों के अपराधी और रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल नागरिकों के खिलाफ जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए"। हालांकि, युद्ध की शुरुआत में ऐसा लग रहा था, कि असद शासन का पतन हो जाएगा, लेकिन ईरान और रूस ने खुलकर सीरिया की मदद की। रूस ने सीरिया में सरकार विरोधियों के खिलाफ एयरस्ट्राइक किए और जमीनी अभियान चलाया, जिसने पूरी तस्वीर बदल दी और अब यह स्पष्ट हो गया है, कि सीरिया का शासन पराजित नहीं होगा। हालांकि, सऊदी अरब और कतर ने कई विद्रोहियों का समर्थन किया, जबकि तुर्की ने सीरिया में पैर फैला चुके इस्लामिक स्टेट के आतंकियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

सीरिया से क्यों दोस्ती चाहते हैं अरब देश?
रूस और ईरान की मदद से सीरिया के प्रभाव में कमी नहीं आई, लेकिन सीरियाई सरकार के लिए भी लगातार युद्ध लड़ना जटिल होता चला गया। वहीं, कई अरब सरकारों ने सीरिया में युद्ध के बारे में दूसरे विचार किए हैं और यह फैसला लिया है, कि असद शासन के साथ संबंध बहाल करना उनके राष्ट्रीय हित में है। दमिश्क (सीरिया की राजधानी) के साथ अपने संबंधों के बारे में अपना विचार बदलने वाला पहला देश 2015 में ट्यूनीशिया था, उसके बाद संयुक्त अरब अमीरात ने 2018 में दमिश्क में अपना दूतावास फिर से खोल दिया। यूएई मे ये कहा, कि अरब देशों को सीरिया में मौजूद होना चाहिए और संघर्ष को सुलझाने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए। जॉर्डन ने 2019 में दमिश्क में अपने प्रभारी डी' अफेयर भेजा और ओमान ने 2020 में सीरिया से रिश्ते जोड़ लिए। पिछले महीने, रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के प्रोत्साहन पर, मिस्र के विदेश मंत्री सामेह शौकरी ने घोषणा की थी, कि काहिरा अरब देशों और सीरिया के बीच संबंधों के सामान्यीकरण का समर्थन करता है। वहीं, पिछले महीने तुर्की और सीरिया में विनाशकारी भूकंप, जिसमें हजारों लोग मारे गए और लाखों लोग बेघर हो गए थे, उसने पूरी दुनिया में पीड़ितों के लिए सहानुभूति की लहर पैदा की। और सऊदी अरब सहित कई अरब देशों को सैकड़ों टन अनाज सीरिया में भेजा। यानि, सीरिया को लेकर अरब देशों के मन में बदलाव आना शुरू हो गया।

सीरिया-सऊदी में कैसे सुधरे संबंध?
विनाशकारी भूकंप ने सऊदी सरकार के मन में सीरिया के लिए अपने दरवाजे फिर से खोलने के विचार दिए, तो ईरान के साथ हुई दोस्ती ने सीरिया को लेकर दिल में बसी दुश्मनी को कम कर दिया। लिहाजा, सत्ता परिवर्तन हुए बिना सऊदी ने सीरिया के साथ रिश्ते जोड़ लिए। यदि सीरिया के राष्ट्रपति असद की अरब जगत में वापसी होती है, तो तुर्की और अन्य जगहों से लाखों सीरियाई शरणार्थियों की सुरक्षित वापसी पर भी बातचीत शुरू हो जाएगी। यानि, एक फैक्टर ये भी रहेगा, कि कई देशों के लिए इस बात पर सीरिया को स्वीकार करना आसान होगा और बशर अल-असद अंतरराष्ट्रीय अछूत भी नहीं रहेंगे। वहीं, दुनिया की राय भी इस कड़वी गोली को और आसानी से स्वीकार कर लेगी, कि बशर अल-असद के अपराधों के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए। लिहाजा, अब काफी हद तक सीरिया की अरब जगत में कितने दिनों तक वापसी होताी है, ये इस बात पर निर्भर करेगा, कि सीरियाई शरणार्थियों की दुर्दशा को लेकर राष्ट्रपति बशर अल-असद क्या फैसले लेते हैं और क्या उनकी सुरक्षित वतन वापसी को हरी झंडी दिखाते हैं?

चीन और रूस और मजबूत, अमेरिका Out?
सीरिया की अरब देशों से दोस्ती का मतलब ये है, कि रूस के लिए सीरिया संकट समाप्त हो जाएगा और चीन के साथ उसका प्रभुत्व अरब वर्ल्ड में और बढ़ेगा। चीन पहले से ही काफी मजबूती से अरब वर्ल्ड में अपने कदम रख चुका है और जो बाइडेन की सऊदी अरब के साथ की गई 'ऐतिहासिक गलती' ने अमेरिका के पैर अरब से उखाड़ दिए हैं। अरब वर्ल्ड में बाइडेन की विदेश नीति अत्यंत खराब साबित हुई है, जिसने चीन के लिए एक साफ रास्ता बना दिया। सऊदी अरब और यूएई के प्रमुखों ने बाइडेन का फोन उठाना बंद कर दिया है, तो अमेरिका ने सऊदी अरब को अंजाम भुगतने की धमकी दे दी और रही सही कसर वैश्विक तेल संकट ने पूरी करत दी। तेल उत्पादन बढ़ाने की गुहार लगाने खुद बाइडेन सऊदी अरब पहुंच गये, लेकिन सऊदी के प्रिंस सलमान ने बाइडेन को खाली हाथ लौटा दिया। बाइडेन के बाद शी जिनपिंग भी सऊदी अरब गये और उनके लिए रेट कार्पेट बिछाया गया, जिसने यह तय कर दिया है, कि अरब वर्ल्ड अब चीन और रूस के खेमे में है और आने वाले वक्त में इसका असर दिखना शुरू हो जाएगा।
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