India@75: दो जहाजों की कहानी: भारत ने अमेरिका और चीन, दोनों को कैसे सबक सिखाया?

अमेरिकियों को उस समय उम्मीद थी कि, युद्ध में भारत के लिए मुश्किलें पैदा करने के लिए चीन की तरफ से कुछ जहाज भेजे जाएंगे, लेकिन चीन खामोश बना रहा।

नई दिल्ली, अगस्त 09: पूरे भारत में स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मनाया जा रहा है और भारत जब स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब इतिहास इस महीने वर्तमान से टकराया है, क्योंकि दो जहाजों की ये दास्तां, सिर्फ आधी सदी में दुनिया के सामने भारत में हुए अविश्वसनीय बदलाव की कहानी कहता है। साल 1971, जब अमेरिका की नजरों में भारत की कोई कद्र नहीं थी और रूस, जिसके लिए भारत सबसे अच्छा दोस्त था और अब 50 सालों के बाद स्थिति बदल गई है। चाहे रूस हो या फिर अमेरिका, वे अब भारत को दरकिनार नहीं कर सकते हैं, बल्कि भारत को साथ रखने के लिए हर तरह की कोशिश करते हैं और इसकी दास्ता शुरू होती है, दो जहाजों की कहानी से।

पूर्वी पाकिस्तान से शुरू हुई कहानी

पूर्वी पाकिस्तान से शुरू हुई कहानी

9 अगस्त 1971, आज से करीब 51 साल पहले, भारत और सोवियत संघ ने पाकिस्तान के साथ युद्ध की पूर्व संध्या पर मित्रता और सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के महत्वाकांक्षी फैसलों के नेटवर्क में यह संधि एक महत्वपूर्ण तत्व था, हालांकि, सोवियत संघ के साथ न केवल एक रणनीतिक संबंध का निर्माण किया गया, बल्कि विदेशों में बांग्लादेश के सम्मान की बात भी भारत को ही करनी थी। खासकर दुनिया को बताना था, कि किस तरह से पाकिस्तान की सेना ने बांग्लादेश में, जो उसका ही एक हिस्सा था, वहां पर भीषण नरसंहार किया था। इंदिरा गांधी युद्ध के लिए भारत के सशस्त्र बलों को भी तैयार भी कर रही थीं, जो आगे चलकर पाकिस्तान को दो हिस्सों में तोड़ने वाला था और दो राष्ट्र सिद्धांत को हमेशा के लिए दफन करने वाला भी था, कि सिर्फ मुस्लिम देश में ही मुस्लिम सुरक्षित रह सकते हैं, क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह फूट चुका था।

US और USSR का हिंद महासागर में प्रवेश

US और USSR का हिंद महासागर में प्रवेश

भारत और तत्कालीन सोवियत संघ में संधि के बाद हिंद महासागर में पहली बार दो महाशक्तियों के बीच मुकाबला होने जा रहा था, अमेरिका और यूएसएसआर के जहाज आमने-सामने थे। अमेरिकी जहाज भारत का दुश्मन बनकर और यूएसएसआर का जहाज, भारत की रक्षा करने के लिए। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन, अपने महत्वाकांक्षी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के नेतृत्व में अमेरिकी नेवी के सातवें बेड़े को हिंद महासागर में कूच करने का आदेश दे दिया था, जिसमें यूएसएस एंटरप्राइज परमाणु विमान वाहक के साथ-साथ 70 लड़ाकू विमानों और बमवर्षकों को शामिल किया गया था, जो भारत को सोवियत से समर्थन लेने से डराने के लिए बंगाल की खाड़ी में तैनात हो चुका था। बदले में, सोवियत संघ ने भारत-पाकिस्तान युद्ध शुरू होने के दो दिन बाद, यानि 5 दिसंबर 1971 को हिंद महासागर में अपने प्रशांत बेड़े को अमेरिकी चुनौती को दफ्न कर देने के लिए भेज दिया। 7 दिसंबर तक सोवियत जहाज सीलोन से 500 समुद्री मील पूर्व में पहुंच गए थे, इसकी पनडुब्बियां कभी-कभी पानी की सतह को के ऊपर आती थीं, ताकि अमेरिका को पता चला, कि भारत अकेला नहीं है।

अमेरिका ने लगा रखी थी चीन से उम्मीद

अमेरिका ने लगा रखी थी चीन से उम्मीद

अमेरिकियों को उस समय उम्मीद थी कि, युद्ध में भारत के लिए मुश्किलें पैदा करने के लिए चीन की तरफ से कुछ जहाज भेजे जाएंगे, लेकिन चीन खामोश बना रहा। बीजिंग जानता था, कि अगर उसके जहाज पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए चले गए, तो उसके पूर्व कम्युनिस्ट मित्र और सहयोगी यूएसएसआर के साथ उसके संबंध खराब हो जाएंगे और अमेरिका को चुनौती देने के लिए चीन किसी भी हाल में यूएसएसआर को कमजोर नहीं करना चाहता था। और फिर नतीजा ये हुआ, कि भारत ने ना सिर्फ पाकिस्तान को बुरी तरह से हराया, बल्कि बांग्लादेश आजाद हो गया और अमेरिकी नेवी का सातवां बेड़ा समुद्र में भारत के खिलाफ कुछ नहीं कर पाया। अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन दांत पीसकर रह गये, लेकिन वो आयरन लेडी इंदिरा गांधी को झुका नहीं पाए।

51 सालों के बाद बदली कहानी

51 सालों के बाद बदली कहानी

इक्यावन साल बाद, जब भारत और रूस अपनी संधि की वर्षगांठ मना रहे हैं, उस वक्त दुनिया की मध्यम और बड़ी शक्तियों ने पूरी तरह से नए दोस्त बना लिए हैं और पुराने दोस्तों से अब रिश्ते टूट चुके हैं। रूस और चीन ने अपनी पुरानी दुश्मनी को त्याग दिया है और खोए हुए समय की भरपाई करने का फैसला किया है। भारत और अमेरिका नजदीक आ रहे हैं और चीन एक प्रमुख शक्ति बन चुका है, जो महासागरों में अपनी शक्तिशाली समुद्री उपस्थिति दिखा रहा है। चीन, पाकिस्तान और जिबूती में नौसैनिक अड्डों का निर्माण कर रहा है और दक्षिण चीन सागर में नेविगेशन के मार्गों को नियंत्रित कर रहा है।

हिंद महासागर में भारत का शक्ति प्रदर्शन

हिंद महासागर में भारत का शक्ति प्रदर्शन

अब भारत हिंद महासागर में अपने हिसाब से लाइन खींचने की कोशिश कर रहा है और हिंद महासागर के छोटे देशों को भारत ने अपनी ताकत और रणनीति से अपनी लाइन में लाने का प्रयास किया है। भारत अब हिंद महासागर में या कम से कम दक्षिण एशिया के विशेष क्षेत्र में आने वाले हिस्सों में अपनी प्रधानता का दावा कर रहा है। भारत ने श्रीलंका को साफ तौर पर कहा, कि वो चीनी सैटेलाइट जहाज को किसी भी सूरत में हिंद महासागर में घुसने नहीं दे। इसलिए जब अंतरिक्ष और उपग्रह ट्रैकिंग में शामिल एक चीनी रिसर्च जहाज 11 अगस्त को श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर डॉक करना चाहता था,तो भारत ने कोलंबो को चेतावनी दे दी। पहले तो श्रीलंका ने भारत के साथ लुकाछिपी का खेल खेलने की कोशिश की, लेकिन फिर श्रीलंका के पास कोई और चारा नहीं बचा था, क्योंकि आर्थिक संकट में फंसे श्रीलंका को सबसे ज्यादा मदद भारत ने ही पहुंचाई है। श्रीलंका के पीएम रानिल विक्रमसिंघे ने भी संसद को आश्वासन दिया है, कि जहाज निर्धारित समय पर नहीं आएगा।

अब शक्ति का प्रयोग करता भारत

अब शक्ति का प्रयोग करता भारत

भारत का इतिहास शांत रहने का रहा है, लेकिन शायद इस बार भारत ने अपनी ताकत का प्रयोग करने में अधिक आत्मविश्वास महसूस किया, क्योंकि भारत क्वाड का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान शामिल हैं। शायद, भारत अपने पक्ष में अमेरिका के साथ अधिक सहज महसूस करता है, भले ही वह सस्ते तेल और रक्षा उपकरणों की खरीद के माध्यम से रूसियों के साथ एक मजबूत लेन-देन संबंध बनाए रखता है। निश्चित रूप से, विश्व व्यवस्था फिर से बदल रही है। इस सप्ताह के अंत में अमेरिकी नौसेना का एक मालवाहक जहाज "मरम्मत और रखरखाव" के लिए चेन्नई के कट्टुपल्ली में एलएंडटी शिपयार्ड में डॉक किया गया और यह पहली बार है जब किसी अमेरिकी जहाज ने भारतीय बंदरगाह में डॉक किया है।

अब दोस्त बनकर आया है अमेरिका

अब दोस्त बनकर आया है अमेरिका

यानि, 1971 में दुश्मन बनकर हिंद महासागर में आने वाला अमेरिका इस बार दोस्त बनकर आया है। निश्चित रूप से, यूएसएस चार्ल्स ड्रू का कोई सामान्य "मरम्मत और रखरखाव" कार्य नहीं है। क्योंकि, इस मौके पर भारत के रक्षा सचिव अजय कुमार और नौसेना के उप-प्रमुख, वाइस-एडमिरल एस.एन. घोरमडे भी मौजूद थे, जिसने भारत की बदलती शक्ति को रेखांकित किया है और 50 सालों में उन दो जहाजों की कहानी को फिर से याद दिलाया है, जब भारत को कमजोर माना जाता था और आज भारत एक शक्ति की तरह दुनिया के सामने खड़ा है।

हिंद महासागर में भारत दिखा रहा भारतीयता

हिंद महासागर में भारत दिखा रहा भारतीयता

इस हफ्ते शतरंज की बिसात पर नया खेल शुरू हो गया है। भारत ने अपने बंदरगाह पर एक अमेरिकी जहाज का स्वागत किया है, जबकि वह रूसी तेल खरीदने के लिए बड़ी मात्रा में पैसा खर्च करना जारी रखे हुए है, और इसके ही श्रीलंका के माध्यम से चीनी को बता रहा है, कि भारत अब हिंद महासागर की "भारतीयता" का दावा करने में संकोच नहीं करेगा। यह बताने की जरूरत नहीं है, कि चीन बौखलाया हुआ है। क्योंकि, वो कमजोर स्थिति में गिर चुके श्रीलंका का भी इस्तेमाल नहीं कर पाया। चीनी विदेश मंत्रालय ने सोमवार को हंबनटोटा की अपनी जहाज यात्रा के भारत के विरोध को "मूर्खतापूर्ण" घोषित किया और कहा कि इसे दो देशों के बीच "सामान्य आदान-प्रदान को बाधित" नहीं करना चाहिए। कुछ लोग कहेंगे, कि भारत की कार्रवाई दूसरे राष्ट्र की संप्रभुता में अस्वीकार्य हस्तक्षेप है, लेकिन जानने वाले जानते हैं, कि अब हिंद महासागर को लेकर भारत दुनिया को संदेश देने की स्थिति में आ चुका है, कि हिंद महासागर में पानी की एक एक बूंद पर भारतीयता लिखी है।

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