चीन के ‘क्रेडिट कार्ड’ पर भारी भारत की ‘दोस्ती', श्रीलंका में अब भारत ही एकमात्र खिलाड़ी कैसे बचा?
इस वक्त श्रीलंका भारत की दोस्ती और चीन की कर्जनीति के बीच फंसा हुआ है और देश को इस आर्थिक स्थिति में फंसाने में सबसे बड़ा योगदान पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की रही है...
कोलंबो, मई 31: सड़क के एक तरफ सिर पर कंस्ट्रक्शन टोपी पहले कोलंबो पोर्ट सिटी में मजदूर काम कर रहे हैं, तो सड़क के दूसरी तरफ सैकड़ों लोग, देश को आर्थिक बदहाली में फंसाने वाले राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे के इस्तीफे की मांग के साथ पिछले 50 दिनो से ज्यादा वक्त से धरना दे रहे हैं। कोलंबो पोर्ट सिटी के बाहर प्रदर्शनकारियों ने एक बोर्ड लगा रखा है, जिसपर लिखा है, आईये, भ्रष्ट और शोषक व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ें। श्रीलंका के ये दो दृश्य उसकी कहानी बयां कर रहे हैं, जिसने चीन को क्रेडिट कार्ड के तौर पर इस्तेमाल किया और जब मुसीबत में फंसा, तो सिर्फ दोस्त भारत से ही आखिरी उम्मीद बची है।

चीन और भारत के बीच श्रीलंका
इस वक्त श्रीलंका भारत की दोस्ती और चीन की कर्जनीति के बीच फंसा हुआ है और देश को इस आर्थिक स्थिति में फंसाने में सबसे बड़ा योगदान पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे की रही है, जिन्होंने देश को आर्थिक सुनहरे सपने दिखाकर चीन से जी-भरकर लोन दिया और अब स्थित यह है, कि जैसे ही श्रीलंका फंसा, चीन ने उससे पीछा छुड़ा लिया। महिंदा राजपक्षे की अध्यक्षता (2005-15) के दौरान श्रीलंका ने चीन के साथ 1.4 अरब अमेरिकी डॉलर में कोलंबो पोर्ट सिटी की नींव रखी थी, जिसका निर्माण 269 हेक्टेयर जमीन पर होना है और इस लोन के साथ ही श्रीलंका के ऊपर कुल कर्ज का 10 प्रतिशत हिस्सा चीन का हो गया। जबकि, पहले नंबर पर एशियाई विकास बैंक (एडीबी) और दूसरे नंबर पर जापान है।

चीन से यारी पड़ी श्रीलंका को भारी
चीन से यारी की वजह से श्रीलंका की 2 करोड़ 20 लाख लोगों की आबादी को भीषण ईंधन और ऊर्जा संकट का सामना करना रड़ रहा है और देश के बाद विदेशी मुद्रा भंडार खत्म हो चुका है। लिहाजा, जिस महिंदा राजपक्षे ने श्रीलंका को चीन की गोदी में खेलने के लिए छोड़ दिया था, वो अब भारत की दोस्ती की उंगली थाम कर रखना चाहता है औख श्रीलंका के पूर्व विदेश सचिव जयनाथ कोलम्बेज इस बात को स्वीकार भी करते हैं और कहते हैं कि, 'सुरक्षा के लिहाज से भारत हमारी पहली नीति हैस लेकिन हम चीन के साथ भी आर्थिक संबंध चाहते हैं।' इसी साल जनवरी महीने में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कोलंबो का दौरा किया था और फिर मार्च में एस. जयशंकर का श्रीलका दौरा बताता है, कि चीन और भारत के बीच संबंध साफ करने के लिए श्रीलंका संघर्ष कर रहा है।

भारत से ही आखिरी उम्मीद?
यूनाइटेड नेशंस में श्रीलंका के पूर्व प्रतिनिधि दयान जयतिल्का कहते हैं कि, 'श्रीलंका का मूदा संकट बाहरी संबंधों का संकट है'। दयान जयतिल्का बताते हैं कि, 'श्रीलंका वो देश है, जो अपने बौद्ध विरासत पर गर्व करता है, लेकिन विडंबना ये है, कि श्रीसंका बौद्ध मार्ग का अनुसरण करने के बजाए हर काम कर रहा है।' उनका आशय श्रीलंका का चीन के पक्ष में झुकाव को लेकर था। उन्होंने कहा कि, 'हमें अभी यह देखना बाकी है, कि वो भारत है चीन, जो श्रीलंका के लिए आखिरी कर्जदाता साबित होगा, जो उसे इस संकट से बचाता है। हालांकि, अभी तक के जो सबूत हैं, लो इशारा करते हैं, कि बाहरी शक्ति के तौर पर भारत, चीन के ऊपर भारी पड़ रहा है और ऐसा लग रहा है, जो वो भारत ही है, जो हमें बचाए रखने में आखिरी वक्त कर मदद करेगा।'

राजपक्षे परिवार ने किया बर्बाद
दयान जयतिल्का बताते हैं कि, राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे "श्रीलंका के भीतर व्यापक रूप से अलोकप्रिय हैं" और "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से बदनाम" हैं, यही कारण है कि वह धन नहीं जुटा सकते हैं या श्रीलंका सद्भावना नहीं ला सकते हैं। दयान जयतिल्का ने द प्रिंट को बताया कि, 'श्रीलंका के पास अपने आप को दुनिया के सामने रखने के लिए एक अच्छा ब्रांड है, लेकिन उस ब्रांड पर राजपक्षे का लोगो लगा हुआ है और जब तक वो लोगो नहीं हट जाता है, तब तक श्रीलंका के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद पाना काफी मुश्किल होगा'।

‘चीन हमें कभी निराश नहीं करेगा’
श्रीलंकाई मीडिया आउटलेट इकोनॉमी नेक्स्ट के सलाहकार संपादक शिहार अनीज़ ने कहा कि, 'श्रीलंका का चीन में क्रेडिट कार्ड था। और चीनी यह नहीं पूछ रहे थे कि हमें धन की आवश्यकता क्यों और किसके लिए चाहिए'। वहीं, जयतिल्का ने श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि, 'राष्ट्रपति गोतबया राजपक्षे का मानना था कि, चीन हमें कभी निराश नहीं करेगा, हम चीनियों के बहुत करीब हैं और हम बहुत महत्वपूर्ण हैं, और वे हमें निराश नहीं करेंगे, क्योंकि वो बहुत अमीर हैं।" लेकिन, जहरीला जैविक खाद भेजने के बाद जब पहली बार गोतबया राजपक्षे ने चीनी उर्वरक पर प्रतिबंध लगाया, तो उसपर चीनी रिएक्शन ने गोतबया राजपक्षे की आंखे खोल दीं। द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीलंका के वरिष्ठ पत्रकार शिहार अनीज़ ने भी इस बात पर सहमति जताई कि, आर्थिक संकट से निकलने में मदद के लिए श्रीलंका "चीन पर निर्भर" था'। उन्होंने कहा कि, 'श्रीलंका ने चीन के साथ संबंधों के कारण सभी का विरोध किया। यह 2019 का मामला था जब राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे चुने गए थे, पिछले साल जून या जुलाई तक वो अपने रूख पर कायम रहे'।

श्रीलंका ने चीन को कैसे किया नाराज?
पत्रकार अनीज़ ने कहा कि, कोलंबो के 'यू-टर्न' के कारण ही श्रीलंका अब चीन से "आसान वित्तीय ऋण" का लाभ नहीं उठा सकता है। उन्होंने कहा कि, "यह तब है जब श्रीलंका को इसका अहसास होने लगा श्रीलंका ने भारत, अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ अपने संबंधों को फिर से जोड़ना शुरू कर दिया'। उन्होंने कहा कि, जिन जिन क्षेत्रों में श्रीलंका ने यृटर्न लिया, उनमें श्रीलंका के उत्तरी द्वीपों में अक्षय ऊर्जा परिजनाओं का विकास था, जिसे पहले एक चीनी कंपनी को दिया गया था, लेकिन बाद में कोलंबो ने कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर उसे भारत को दे दिया। जिसके बाद ही चीन के विदेश मंत्री वांग यी इस साल कोलंबो पहुंचे थे, और कोलंबो स्थित थिंक टैंक अवेयरलॉग इनिशिएटिव के संस्थापक डॉ. जॉर्ज कुक ने द प्रिंट को बताया कि, 'जनवरी में चीनी विदेश मंत्री ने श्रीलंका आना जरूरी समझा, क्योंकि चीन को डर था कि संबंध ठीक नहीं चल रहे हैं।" लेकिन, उस दौरे के दौरान श्रीलंकन राष्ट्रपति ने चीनी विदेश मंत्री से कर्ज री-स्ट्रक्चर करने का अनुरोध किया, जिसे चीन ने ठुकरा दिया।

‘इस खेल में अब सिर्फ भारत खिलाड़ी’
चीनी विदेश मंत्री वांग यी की कोलंबो यात्रा के बमुश्किल दो महीने बाद, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मार्च में बिम्सटेक शिखर सम्मेलन से इतर अपने श्रीलंकाई समकक्ष से मुलाकात की थी। जयशंकर की यात्रा के पहले दिन ही दोनों देशों ने कई समझौतों पर हस्ताक्षर कर लिए। उस समय श्रीलंका के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान में कहा गया था कि, दोनों विदेश मंत्रियों ने कोलंबो और नई दिल्ली के बीच राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों के व्यापक स्पेक्ट्रम की समीक्षा की, क्योकि दोनों देशों के बीच "अति प्राचीन काल से अटूट संबंध है'। वहीं, एक भारतीय राजनयिक ने द प्रिंट को बताया कि, 'श्रीलंका के लोगों के बीच अब इस बात की सराहना बढ़ रही है कि उनका भारत ही एक वास्तविक मित्र है, जिस पर वे भरोसा कर सकते हैं।"

भारत पर श्रीलंका की नई सोच
कोलंबो की विदेश नीति में आगे बढ़ते हुए, श्रीलंका के पूर्व राजनयिक जयतिल्लेका ने दिप्रिंट को बताया कि, 'हमारे पास राजपक्षे थे जो व्यापक रूप से चीन की ओर झुके थे। हालांकि महिंदा राजपक्षे भारत और चीन के बीच अधिक से अधिक संतुलन बनाने में सक्षम थे, लेकिन राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे द्वारा अपने वर्तमान कार्यकाल में चीन के प्रति तूफानी मोह और गजब का आलिंगन था, जिसको लेकर ना सिर्फ दिल्ली, बल्कि वॉशिंगटन भी नाराज हुआ'। जयतिल्का ने कहा कि, 'श्रीलंका ने बाहरी शक्तियों के साथ संतुलन स्थापित करने में काफी ज्यादा देर कर दी है।' उन्होंने कहा कि, 'अब संतुलित संबंध भी काम वहीं कर रहा है, क्योंकि आपके हाथों में भीख का कटारो है और आपने सॉफ्ट पॉवर के तौर पर अपनी शक्ति को खत्म कर लिया है, लिहाजा किसी भी तरह से विदेश नीति को बनाए रखना मुश्किल है। तो, अब भारत ही एकमात्र आपके लिए विकल्प बचा है और यहां पर भारत ही एकमात्र खिलाड़ी बचा है। उन्होंने कहा कि, श्रीलंका में विदेशी शक्तियों की स्थापना में भारत एक पूर्व प्रतिष्ठित खिलाड़ी के तौर पर अपना भूल सुधारते हुए जबरदस्त वापसी की है और अब यहां पर सिर्फ भारत ही एकमात्र खिलाड़ी है'।
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