पाकिस्तान के बाद ये मुस्लिम देश बन सकता है परमाणु ताकत, सऊदी बोला, अंजाम सोचना असंभव
ईरान और सऊदी अरब के रिश्ते हमेशा से खराब रहे हैं और ईरान के हथियारों के अलावा ईरानी प्रॉक्सी ताकतों से भी सऊदी अरब को हमेशा से डर रहा है।
Saudi Arab on Iran Atom Power: पाकिस्तान के बाद एक और मुस्लिम देश ईरान बहुत तेजी के साथ परमाणु ताकत बनने की तरफ बढ़ चला है, लिहाजा ऐसे देशों का डर अब सार्वजनिक तौर पर सामने आने लगा है, जिनकी ईरान के साथ छ्त्तीस का आंकड़ा रहा है। इजरायल के बाद सऊदी अरब भी ऐसा ही देश है। इजरायल पहले से ही कहता आया है, कि वो किसी भी हाल में ईरान का परमाणु ताकत नहीं बनने देगा और इजरायल के ऊपर ईरान के न्यूक्लियर सुविधा केन्द्रों पर हमलाकरने के आरोप भी लगते रहे हैं। वहीं, सऊदी अरब ने भी अब कहा है, कि अगर ईरान एक परमाणु ताकत बन जाता है, तो फिर 'पता नहीं इसका अंजाम क्या होगा?'

ईरान हासिल करने वाला है परमाणु बम?
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल ने रविवार को कहा कि, अगर तेहरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो खाड़ी देशों के देश भी अपनी सुरक्षा को मजबूत करने के लिए काम करेंगे। आपको बता दें कि, ईरान और अमेरिका के बीच साल 2015 में ओबामा प्रशासन के साथ परमाणु हथियारों को लेकर समझौता हुआ था, लेकिन साल 2016 में डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन इस समझौते से बाहर आ गया है और अमेरिका ने ईरान पर कई कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इस दौरान अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध काफी मजबूत हो गये थे और ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध सऊदी अरब को राहत पुहंचाने वाला था। लेकिन, अब अमेरिका एक बार फिर से ईरान के साथ परमाणु हथियारों को लेकर नये सिरे से समझौता करना चाहता है, हालांकि अभी तक बात बनी नहीं है, क्योंकि ईरान की एक शर्त ये भी है, कि वो समझौते में फिर से तभी आएगा, जब अमेरिका प्रतिबंध के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करेगा। लेकिन, इस बीच संयुक्त राष्ट्र ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहरी चिंता जताई है और यूएन रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि अगले एक से 2 सालों में ईरान खुद के परमाणु बमों का निर्माण कर लेगा।

ईरान को लेकर सऊदी की चिंता क्या है?
ईरान और सऊदी अरब के संबंध हमेशा से कड़वाहट से भरे रहे हैं और सऊदी अरब, ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। वहीं, ईरान के न्यूक्लियर ताकत बनने की तरफ तेजी से बढ़ते कदम को लेकर जब सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि, 'अगर ईरान को न्यूक्लियर हथियार मिल जाते हैं, को फिर उसका परिमाण क्या होगा, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है।' अबू धाबी में आयोजित वर्ल्ड पॉलिसी कॉन्फ्रेंस के दौरान एक ओपन इंटरव्यू में सऊदी विदेश मंत्री ने कहा कि, 'हम इस क्षेत्र में काफी खतरनाक जगह पर हैं और ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं, कि क्षेत्रीय शक्तियां अपनी सुरक्षा को हासिल करने के लिए किस हद तक आगे जा सकते हैं।'

ईरान के साथ रूकी हुई है बातचीत
परमाणु हथियारों को लेकर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच की बातचीत रूकी हुई है और पश्चिम का कहना है, कि बातचीत रूकने की वजह ईरान की अनुचित मांगे हैं। वहीं, यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद पश्चिमी देशों का ध्यान भी ईरान से हटा हुआ है, लिहाजा बातचीत को लेकर कुछ खास पहल नहीं की गई है। इस बीच ईरान में 22 साल की लड़की महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में संदिग्ध मौत के बाद शुरू हुए देशव्यापी प्रदर्शन ने एक बार फिर से दुनिया का ध्यान ईरान की तरह खींचा है। हालांकि, सऊदी अरब हमेशा से ईरान के साथ चलने वाली परमाणु वार्ता को लेकर 'संदेहास्पद' रहा है। कार्यक्रम के दौरान सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल ने कहा कि, 'सऊदी अरब ने परमाणु वार्ता के पुनर्जीवित करने के प्रयासों का समर्थन किया है, लेकिन सऊदी की शर्त ये है कि, बातचीत का प्रयास शुरूआती प्वाइंट के साथ हो, ना कि अंतिम प्वाइंट के साथ।'

समझौते को लेकर अरब राज्यों का रूख
सुन्नी बाहुल्य खाड़ी अरब राज्यों ने हमेशा से ईरान के साथ एक सख्त और मजबूत परमाणु समझौते की वकालत की है और अरब राज्य हमेशा से ईरान के हथियार कार्यक्रम से डरे रहते हैं। खासकर ईरानी ड्रोन, ईरान की मिसाइल क्षमता और ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क्स ने हमेशा अरब देशों को काफी परेशान किया है। ऐसे में अगर ईरान परमाणु क्षमता हासिल कर लेता है, तो सऊदी अरब के साथ साथ इजरायल की सुरक्षा भी खतरे में आ जाएगी। लिहाजा, सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल ने कहा कि, "दुर्भाग्य से संकेत अभी बहुत सकारात्मक नहीं हैं।" उन्होंने कहा कि, "हम ईरानियों से सुनते हैं, कि उन्हें परमाणु हथियार कार्यक्रम में कोई दिलचस्पी नहीं है, यह विश्वास जगाने के लिए अच्छी बात है, लेकिन ईरान परमाणु हथियार नहीं ही बना रहा है, इसके लिए हमें उस स्तर तक के आश्वासन की जरूरत है"। ईरान का कहना है कि उसकी परमाणु तकनीक पूरी तरह से नागरिक उद्देश्यों के लिए है।












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