दाऊद के गुर्गे Salim Dola का नेटवर्क एक्सपोज, विदेशों तक भेजता था म्याऊं-म्याऊं ड्रग, भोपाल तक जुड़े तार
Salim Dola: भारतीय एजेंसियों ने लंबे वक्त के बाद अंडरवर्ल्ड डॉन और 1993 बम्बई सीरियल ब्लास्ट के मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम को तगड़ा झटका दिया है। दरअसल इंस्ताबुल में दाऊदी के करीबी और भारत में ड्रग्स का कारोबार चलाने वाले सलीम डोला को गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद अब उसे भारत डिपोर्ट किया गया है। उस पर नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट के तहत गंभीर आरोप हैं। जानेंगे डोला कैसे अपना नेटवर्क देश के बाहर रहकर चलाता था और किस ड्रंग को भारत के छोटे-छोटे शहर तक पहुंचाता था।
2024- सांगली-सूरत से लेकर दुबई और तुर्की तक नेटवर्क
साल 2024 में मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच को 4 किलोग्राम एमडी ड्रग मिला। जिसकी कीमत भारत में तकरीबन 10 करोड़ के आस-पास निकली। ड्रग की जब्ती ने सिर्फ ड्रग ने बल्कि उस पूरी चेन को खोल दिया जो महाराष्ट्र के सांगली, गुजरात के सूरत से लेकर दुबई के रास्ते तुर्की तक जाती थी। इसमें नाम आया सलीम डोला का। कुछ गिरफ्तारियां हुईं लेकिन पैटर्न में यही पता चला कि सलीम डोला सिर्फ फोन पर ऑर्डर देता था और उसके गुर्गे इसे फॉलो करते थे।

कौनसा ड्रग सप्लाई करता था डोला?
अगस्त 2025 में DRI भोपाल ने एक फैक्ट्री पर रेड डाली थी। जिसमें अवैध रूप से मेेफेड्रोन ड्रग्स बनाया जा रहा था। जांच हुई तो सलीम डोला और दाऊद इब्राहिम का नाम सामने आया और यह फैक्ट्री लोकल सिंडिकेट का नहीं बल्कि ग्लोबल नेटवर्क का अहम हिस्सा निकली। इसमें बनने वाला मेफेड्रोन ड्रग जिसे म्याऊं-म्याऊं कहते हैं वह भोपाल से बनकर विदेशों तक में जाता था। ये फैक्ट्री भोपाल के हुजूर में चल रही थी जिसमें से 400 किलो कच्चा माल मुंबई के भिवंडी के रास्ते विदेशों में सप्लाई किया गया था।
कैसे काम करता था नेटवर्क?
2025 में ही DRI मुंबई ने अजहरुद्दीन इदरीसी नाम के व्यक्ति से भी पूछताछ की। उसने बताया कि अशरफ रैन नाम के व्यक्ति ने उसे पैसों का लालच देकर भिवंडी-ठाणे इलाके से भोपाल तक कच्चा माल पहुंचाने का काम दिया था। उसे अंजुर फाटा, भिवंडी से माल उठाकर मिनी ट्रक के जरिए भोपाल लाना होता था। वह दूसरे सामान के साथ मिलाकर इसे भोपाल तक लाता था। फिर यहां पर म्याऊं-म्याऊं तैयार होता था।
कैसे मिले डोला के सुराग?
यह पूरी कार्रवाई भारत में पहले हुई जांच से जुड़ी बताई जा रही है। मुंबई के कुर्ला इलाके में हाल ही में हुई कार्रवाई के दौरान सलीम डोला के कई करीबी शागिर्दों को पकड़ा गया था। पूछताछ में उन्होंने माना कि डोला उन्हें जो ऑर्डर देता है वे उसे फॉलो करते हैं। जब मुंबई पुलिस और नार्कोटिक्स डिपार्टमेंट ने अपने अंदाज में पूछताछ की तो सलीम डोला की लोकेशन का पता चल गया। जिसकी जानकारी खूफिया एजेंसियों ने तुर्की की एजेंसियों के साथ शेयर कर दी। वहीं भारत में छापेमारी में एजेंसियों ने 126.14 किलोग्राम मेफेड्रोन, जिसे आम भाषा में 'म्याऊं-म्याऊं' कहा जाता है, बरामद किया था। साथ ही ₹25.22 लाख रुपए और डी-कंपनी से जुड़ा अहम लॉजिस्टिक डेटा भी हाथ लगा था।
तुर्की में कैसे हुई गिरफ्तारी?
डिपोर्टेशन की कार्रवाई भारतीय खुफिया एजेंसियों और तुर्की प्रशासन की ज्वॉइंट और हाई लेवल इन्वेस्टीगेशन के बाद संभव हुई है। इस्तांबुल पुलिस के नारकोटिक्स क्राइम डिवीजन ने कई हफ्तों की निगरानी और ट्रैकिंग के बाद 25 अप्रैल को डोला को Beylikduzu जिले में मौजूद एक रिहायशी संपत्ति से गिरफ्तार किया। वह इंटरपोल के रेड नोटिस के तहत वांटेड था और अंतरराष्ट्रीय ड्रग तस्करी मामलों में उसका नाम शामिल था।
आगे क्या होगा डोला का?
सलीम डोला को भारत लाने के बाद केंद्रीय एजेंसियों ने पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया है। जल्द ही उसे आगे की जांच के लिए मुंबई पुलिस को सौंपा जाएगा। उस पर संगठित अपराध, सीमा पार ड्रग तस्करी और NDPS Act 1985 के तहत कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया जाएगा। यह कानून बेहद सख्त माना जाता है और कमर्शियल मात्रा में ड्रग्स पकड़े जाने पर न्यूनतम 10 साल की जेल का प्रावधान है। इसके अलावा इसमें जमानत मिलना भी काफी मुश्किल होता है।
डोला पकड़ा, नेटवर्क अब भी जिंदा?
अधिकारियों के मुताबिक, डोला पर सिर्फ मुंबई के कुर्ला मामले में ही नहीं बल्कि इंटरनेशनल ड्रग रूट्स को फंडिंग देने और उन्हें ऑपरेट करने में भी अहम भूमिका निभाने के आरोप लग सकते हैं। जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि उसकी पूछताछ से दाऊद इब्राहिम के मौजूदा नेटवर्क, उसके सक्रिय लोगों और ड्रग्स से कमाए गए पैसों को वैध बनाने वाले चैनलों की अहम जानकारी मिल सकती है।
डी-कंपनी को कितना नुकसान?
सलीम डोला की भारत वापसी हाल के सालों में डी-कंपनी से जुड़े किसी बड़े सदस्य का सबसे हाई प्रोफाइल एक्स्ट्राडीशन माना जा रहा है। इससे यह संकेत भी मिला है कि अब डी-कंपनी के बड़े गुर्गों के लिए विदेशों में सुरक्षित ठिकाने लगातार कम होते जा रहे हैं।
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