प्रकाश के कणों पर 4000KM तक संदेश भेजकर चीन-रूस ने रचा इतिहास, प्रोजेक्ट में भारत को शामिल होने का ऑफर

Russia-China Test Quantum Communications: रूस और चीन ने भविष्य की टेक्नोलॉजी क्वांटम कम्युनिकेशन का सफल परीक्षण किया है और अब इन दोनों देशों ने भारत को भी इस प्रोजेक्ट में शामिल होने का ऑफर दिया है।

माना जा रहा है, कि भारत को प्रोजेक्ट में शामिल होने का ऑफर देने के पीछे रूस और चीन की ग्लोबल साउथ में अपने दायरे का विस्तार करने वाला जियो-पॉलिटिकल गेम है, जिसके तहत दोनों देशों ने सैटेलाइट आधारित क्वांटम कम्युनिकेशन सिस्टम की स्थापना की है।

Russia-China Test Quantum Communications

क्वांटम कम्युनिकेशन सिस्टम को चीन के मोजी सैटेलाइट ने एक्टिव किया है और इस प्रयोग ने करीब 4,000 किमी दूर एक अन्य रूसी सुविधा से जुड़े चीन के ग्राउंड-रिसीविंग स्टेशन से एक संदेश को सफलतापूर्वक प्रसारित किया है।

एलेक्सी फेडोरोव, जो रूस के राष्ट्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, रूसी क्वांटम सेंटर (आरक्यूसी) का एक हिस्सा हैं, उन्होंने एक रिसर्च पेपर में पिछले साल किए गए सफल प्रयोग का खुलासा किया है। क्वांटम कम्युनिकेशन की सबसे बड़ी खासियत ये है, कि दुनिया में अभी कोई भी ऐसी टेक्नोलॉजी नहीं है, जो इस सिस्टम के हैक कर सकता है।

भारत को शामिल होने का ऑफर

बहुत साधारण शब्दों में समझें, तो इस टेक्नोलॉजी के तहत प्रकाश की किरणों के जरिए ध्वनि की तरंगों को भेजा जाता है और इसे किसी भी टेक्नोलॉजी से हैक नहीं किया जा सकता है। भारतीय एजेंसी इसरो ने भी 2021 में बहुत ही छोटे स्केल पर इस टेक्नोलॉजी का कामयाब प्रयोग किया था, लेकिन चीन ने इस कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी को सैटेलाइट से कनेक्ट करने में कामयाबी हासिल कर ली है।

रूस और चीन के बीच क्वांटम कम्युनिकेश के प्रयोग का ये खुलासा, दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष कार्यक्रम में हालिया हुए सहयोग के हिस्से के रूप में हुआ है, जिसके तहत दोनों देशों से सैटेलाइट खुफिया टेडा को एक दूसरे के साथ शेयर करने का समझौता किया है।

दिलचस्प बात यह है, कि पिछले साल जुलाई में ब्राजील-रूस-भारत-चीन-दक्षिण अफ्रीका (ब्रिक्स) समूह की बैठक के मौके पर भारत को भी इस परियोजना का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया गया था। रिपोर्टों में कहा गया है, कि नई दिल्ली की पेशकश यहां क्वांटम टेक्नोलॉजी में विश्वसनीय अनुसंधान की व्यापकता पर आधारित थी, जो संभवतः इसे एक आदर्श उम्मीदवार बनाती है।

सुरक्षित क्वांटम संचार की जरूरत

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (एससीएमपी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रयोग के तहत रूसी और चीनी वैज्ञानिकों ने मॉस्को के करीब एक ग्राउंड स्टेशन और चीन के पश्चिमी शिनजियांग में उरुमकी के पास एक ग्राउंड स्टेशन के बीच 3,800 किमी की दूरी पर 'क्वांटम कुंजी' द्वारा सुरक्षित दो एन्कोडेड तस्वीरें भेजीं थीं।

यह पहला "पूर्ण चक्र" क्वांटम कम्युनिकेशन परीक्षण, चीन के क्वांटम उपग्रह मोज़ी की मदद से संभव हुआ, "जिसने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय क्वांटम संचार नेटवर्क विकसित करने के रास्ते खोल दिए हैं।" मोज़ी को 2016 में लॉन्च किया गया था, और तब से, चीन ने विभिन्न प्रयोगों के संचालन के लिए ग्राउंड रिसीविंग और कंट्रोल स्टेशनों की एक श्रृंखला स्थापित की है।

RQC, मॉस्को स्थित क्यूस्पेस टेक्नोलॉजीज और एमआईएसआईएस विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा प्रकाशित एक पेपर में कहा गया है, कि एडवांस सुपर कंप्यूटर और क्वांटम कंप्यूटिंग ने "सूचना प्रणालियों पर हमला करने और उसे हैक" करने की संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।

लेकिन क्वांटम कम्युनिकेशन- जो एकल फोटॉनों में डेटा को एनकोड करने के लिए क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करता है- उसे हैक नहीं किया जा सकता है। इस सिस्टम के जरिए एन्क्रिप्टेड डेटा को एक और शून्य में स्ट्रांसफर किया जाता है और 'क्वांटम कुंजी' के साथ डिक्रिप्ट किया जाता है।

Russia-China Test Quantum Communications

क्वांटम कम्युनिकेशन रिसर्च क्या है?

हालांकि, क्वांटम कुंजी के विकास में कई अहम उपलब्धियां अभी तक हासिल हुई हैं, लेकिन लंबी दूरी के कम्युनिकेशन के दौरान फोटॉन के नुकसान के कारण ऑप्टिकल फाइबर केबल का इस्तेमाल करते हुए एक निश्चित रफ्तार से जमीन-आधारित कम्यिनिकेशन ट्रांसफर फिलहाल करीब 1,000 किमी तक ही सीमित है।

लेकिन, चीन ने इस बाधा को दूर करने और लंबी दूरी की क्वांटम ट्रांसमिशन शुरू करने के लिए 2016 में मोज़ी उपग्रह को लॉन्च किया था। साल 2020 में, रूसी और मोजी टीमों ने मॉस्को के पास ज़ेवेनिगोरोड वेधशाला में उपग्रह को ट्रैक करने के लिए दूरबीनों और कैमरों के साथ एक ग्राउंड स्टेशन स्थापित किया था। ज़ेवेनिगोरोड ग्राउंड स्टेशन और उरुमची के पास चीन के नानशान ग्राउंड स्टेशन के बीच क्वांटम कम्युनिकेशन को लेकर काफी प्रयोग किए गए हैं।

पूरे क्वांटम कम्युनिकेशन प्रयोग में ज़ेवेनिगोरोड और मोज़ी सैटेलाइट के बीच "गुप्त कुंजियाँ" ट्रांसफर गईं, जो ग्राउंड स्टेशन से 600 किमी और 1,100 किमी के बीच परिक्रमा करती थीं। रिसर्च पेपर में कहा गया है, कि जैसे ही चीनी पक्ष को उपग्रह से साझा कुंजी प्राप्त हुई, लगभग 4,000 किमी दूर दो स्टेशनों के बीच एक कनेक्शन स्थापित हो गया।

इसके तहत दो कोड किए गये मैसेज को दो कुंजी की मदद से ट्रांसफर और डिक्रिप्ट किया गया। हालांकि, रिसर्च पेपर में फिलहाल कई तरह की खामियां और सुधार की भी बात कही गई है।

प्रोजक्ट में शामिल होने क्यों हिचकिचा रहा भारत?

प्रोजेक्ट में शामिल होने से भारत की हिचकिचाहट की वजह चीन है, जिसे भारत अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। खासकर क्वांटम कम्युनिकेशन में चल रहे रिसर्च के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी भारी-भरकम खर्च कर रही है।

पिछले साल 13 जुलाई को फ्यूचर टेक्नोलॉजीज फोरम के दौरान, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा था, कि उन्हें "भारतीय भागीदारों के साथ, विशेष रूप से अत्याधुनिक कंप्यूटिंग तकनीक, डेटा प्रोसेसिंग, स्टोरेज और ट्रांसमिशन प्रौद्योगिकियों में" विशिष्ट परियोजनाओं पर चर्चा करने की उम्मीद है।

हालांकि, "बढ़े हुए भू-राजनीतिक तनाव" के कारण संभावनाएं "अनिश्चित" बनी हुई हैं। भारत सरकार के अधिकारियों ने बताया है, कि जनवरी 2023 से कई रूसी प्रतिनिधिमंडलों ने विभिन्न भारतीय संस्थानों और सरकार से संबद्ध विभागों का दौरा किया है, लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हुआ है।

मॉस्को और बीजिंग, पश्चिमी नेतृत्व वाले तंत्र के लिए एक वैकल्पिक फाइनेंस, भू-अर्थशास्त्र, आर्थिक, तकनीकी और वाणिज्यिक प्रणाली बनाने के अपने प्रयासों को तेज कर रहे हैं। क्वांटम संचार लिंक को उस दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

पुतिन ने पिछले साल मॉस्को में फ्यूचर टेक्नोलॉजीज फोरम में कहा था, कि उन्होंने क्वांटम प्रौद्योगिकी को अर्थव्यवस्था और डिजिटल बुनियादी ढांचे में "महत्वपूर्ण भूमिका" देने की योजना बनाई है। फेडोरोव ने यह भी कहा, कि साथी ब्रिक्स देशों ब्राजील, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ भविष्य की प्रौद्योगिकियों को आगे बढ़ाना "तकनीकी रूप से बिल्कुल संभव" है।

लेकिन, चूंकी इस परियोजना में वैज्ञानिक, तकनीकी और वाणिज्यिक क्षमता है, लिहाजा देशों को पहले अपने राष्ट्रीय दूरसंचार, आईटी और डेटा विनिमय कानूनों को संरेखित करने की आवश्यकता होगी। इसके अलावा भी, क्वांटम संचार नेटवर्क को विशेष उपग्रहों और ग्राउंड कंट्रोल स्टेशनों जैसे अन्य बुनियादी ढांचे की भी आवश्यकता होती है।

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