इस्लामिक देश बांग्लादेश में कैसे होता है हिंदुओं का उत्पीड़न? जान बचाकर भागे लोगों ने याद किया अतीत का दर्द
India-Bangladesh: भारत में अकसर एक सवाल पूछा जाता है, कि जिस बांग्लादेश को 1971 में पाकिस्तानी शासन के बर्बरता से आजाद करवाया गया, जिसे आजादी दिलवाई गई, आखिर वो अहसानफरामोश कैसे हो गया? इस सवाल का जवाब भारत के लोग 1971 की जंग में तलाशना शुरू करते हैं, जो एक बड़ी गलती है।
दरअसल, बांग्लादेश का इतिहास 1971 से शुरू नहीं होता है, बल्कि बांग्लादेश और भारत के बीच के संबंध को 1947 से पहले से ही खंगाला जाना चाहिए, जब भारत के बंटवारे के लिए मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मजहबी आधार पर मुहिम चलाई गई थी। इस मुहिम को सबसे ज्यादा पसंद किया गया, बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में, जिसने भीषण दंगों का दर्द झेला।

जिन्ना के भारत के विभाजन वाली मुहिम को 1947 से पहले बिहार-बंगाल में काफी समर्थन मिला और वहां के मुसलमान, जिन्ना की इस बात पर सहमत थे, कि 'हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते।' यानि, आज के बांग्लादेश में भारत को किस नजरिए से देखा जाता है, उसे धर्म के चश्मे से देखने पर ही साफ देखा जा सकता है और उसी चश्मे से देखने पर पता चलता है, कि जब जुलाई-2024 में कोटा के खिलाफ बांग्लादेश में प्रदर्शन शुरू होता है, तो शेख हसीना के भागने तक वो आंदोलन हिंदुओं के नरसंहार की तरफ मुड़ जाता है।
ऐसा नहीं है, कि बांग्लादेश में पहली बार हिंदुओं के खिलाफ सामूहिक-मजहबी हिंसा की गई हो, बल्कि समय समय पर बांग्लादेश में हिंदुओं को बताया जाता है, कि वो जिस देश में रह रहे हैं, वो एक इस्लामिक देश है, जहां उनका उत्पीड़न होता रहेगा। हिंसा की उठती लहरों ने बार बार हिंदुओं को बांग्लादेश से पलायन के लिए मजबूर किया है और इस रिपोर्ट में हम आपको उन हिंदुओं की आपबीति बताते हैं, जिन्हें इस्लामिक हिंसा की वजह से बांग्लादेश छोड़कर भागना पड़ा।
अतीत में बांग्लादेश से भागे हिंदुओं का दर्द
1947 के बाद से ही बांग्लादेश से लाखों हिंदुओं का विस्थापन हुआ है, जिन्होंने पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम और मेघालय जैसे भारतीय राज्यों में शरण ली है। कई लोग अपने जीवन को फिर से बनाने की उम्मीद लेकर आए, लेकिन उनके माथे पर "शरणार्थी" का स्थायी लेबल चस्पा कर दिया गया।
वनइंडिया ने कई बंगाली हिंदुओं से बातचीत की, जिन्होंने अतीत में हुए अत्याचारों को देखा है। उनके बयान बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के सामने आने वाली चुनौतियों की एक गंभीर तस्वीर पेश करते हैं।
1971 में भारत भागकर आए सुशील गंगोपाध्याय बांग्लादेश के नोआखली जिले में बिताए गये अपने समृद्ध जीवन को याद करते हुए कहते हैं, कि "हमारा एक बड़ा परिवार और बहुत सारी जमीनें थीं। लेकिन मुक्ति संग्राम के दौरान, पाकिस्तानी सेना और रजाकारों ने हम पर हमला किया। घर जला दिए गए और कई लोगों को बेरहमी से मार दिया गया।" उन्होंने दुख से भरी आवाज में कहा "बांग्लादेश में बहुसंख्यक समुदाय की लगातार दुश्मनी ने उन्हें भारत में स्थायी शरण लेने के लिए मजबूर कर दिया है।"

मौजूदा हालात को देखते हुए सुशील गहरा दर्द जताते हैं और कहते हैं, कि "बांग्लादेश में हाल की घटनाओं को देखकर दिल दहल जाता है। मैंने एक गर्भवती महिला के पेट पर लात मारने का दृश्य देखा; ऐसी क्रूरता अकल्पनीय है। एक भारतीय के रूप में, मैं अपने मूल भाइयों को बचाने की मांग करता हूं। अगर वहां हिंदुओं के साथ दुर्व्यवहार जारी रहा, तो हमें बांग्लादेश में 'भारत छोड़ो' आंदोलन पर विचार करना पड़ सकता है।"
सुशील गंगोपाध्याय के मन में 1971 के भीषण हालात अभी भी ताजा हैं। वो कहते हैं, कि "मैं सिर्फ 10 या 12 साल का था। रजाकारों ने हमें प्रताड़ित किया, पुरुषों के शवों को नदियों में फेंक दिया और हमारी माताओं के साथ ज्यादती की। पाकिस्तानी सेना ने कई महिलाओं को गर्भवती कर दिया। इतने सालों बाद भी, वे निशान अभी भी मौजूद हैं।"
एक और मार्मिक कहानी बनगांव की अनिमा दास की है, जो बांग्लादेश से भागते समय गर्भवती थी। उन दर्दनाक दिनों को याद करते हुए उन्होंने कहा, "उस वक्त मेरा बेटा छोटा था, और मेरी बेटी मेरे गर्भ में थी। देश संघर्ष में डूबा हुआ था; घर जलाए जा रहे थे। डर के मारे मेरे ससुर ने हमें भारत भेज दिया।"
अनिमा के मन में अभी भी हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा की यादें ताजा है, जो एक ऐसा आघात था, जो उन्हें अभी भी डराता है। वो कहती हैं, "मैंने तब से बांग्लादेश का कई बार दौरा किया है, लेकिन मैं वहां फिर से रहने के बारे में नहीं सोच सकती।"

बांग्लादेश से पलायन कर भारत आए और सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले कई हिंदुओं का ऐसा ही दर्द है, जिन्हें बस हिंदू होने की वजह से निशाना बनाया गया और अपनी जमीन-जायदाद को छोड़कर दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया। उन लोगों में आज भी विस्थापन का दर्द है, लेकिन इसके साथ ही, भारत द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा के लिए राहत और आभार की भावना भी है। बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए उनकी एकमत सलाह है: भारत में शरण लें।
वनइंडिया से बात करते हुए, हरधन बिस्वास, जिनके पिता बांग्लादेश से पलायन कर गए थे, उन्होंने कहा, कि उत्पीड़न की चक्रीय प्रकृति ने हिंदू समुदाय को लगातार डर में रखा है, जिससे कई लोग अपने वतन से भागने और भारत में शरण लेने के लिए मजबूर हो गए हैं। उन्होंने कहा, कि "हिंदुओं ने ऐतिहासिक रूप से बांग्लादेश में चुनौतियों का सामना किया है, स्वतंत्रता के समय से लेकर मुक्ति संग्राम और उसके बाद भी। और उसके आगे भी। हालांकि, कई लोगों ने वहीं रहने का फैसला किया, लेकिन सिर्फ बार-बार खतरों का सामना करने के लिए।"
1956 में भारत आए परेश दास ने एक दर्दनाक अनुभव हमसे शेयर किया। उन्होंने कहा, कि "मेरे दादा को मेरी आंखों के सामने मार दिया गया था। हमने डर के मारे अपनी जमीन छोड़ दी। उन्होंने मेरे चचेरे भाई पर मेरे सामने ही हमला किया। हालांकि हम अब भारत में शांति से रह रहे हैं, लेकिन नोआखली में रिश्तेदारों को अभी भी धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। अभी एक महीने पहले, मेरे चाचा को भूमि विवाद के कारण मार दिया गया था। मैंने उनसे कहा, कि वे संपत्ति से ज्यादा अपनी जान को कीमती समझें।"
भारत सरकार से दखल देने की अपील
न्यूटाउन के पास रहने वाले रशोमोय बिस्वास ने 1971 के बाद के उत्पीड़न के बारे में बताया। उन्होंने कहा, कि "बांग्लादेश में हिंदू होना एक अपराध था। आजादी के बाद भी कोई राहत नहीं मिली। पाकिस्तानी सेना और जमात बलों ने हमें निशाना बनाया और हमलों के लिए हिंदुओं के घरों को टारगेट किया।"
उन्होंने कहा, ''मेरे परिवार ने रातें छिपकर बिताईं, अक्सर भूखे रहकर। जबकि हम अब भारत में शांति से रह रहे हैं, हमारे कई रिश्तेदार बांग्लादेश में ही रह रहे हैं। लेकिन हम भारत सरकार से हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वहां हिंदू बिना किसी डर के रह सकें।''












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