Manipur: जलते घर, टूटते शहर, चीन और म्यांमार.. 1500 शब्दों में पढ़िए मणिपुर के जलने की पूरी कहानी
Manipur Explainer: जातीय हिंसा ने म्यांमार की सीमा से लगे भारत के बेहद खूबसूरत राज्य मणिपुर को अशांति में डाल रखा है। दो महीने से ज्यादा समय से मैतई और कुकी समुदायों के बीच लगातार झड़पों ने दोनों को आपस में घिरा हुआ और डरा हुआ महसूस कराया है।
जिस गांव में जिस समुदाय की ज्यादा आबादी है, वो हिंसक बना और कम आबादी वाला समुदाय बना पीड़ित।
मणिपुर में मुख्य तौर पर तीन जातीय समुदाय हैं मैतई, नगा और कुकी। मैतई समुदाय में हिंदू और मुसलमान आते हैं और जनसंख्या में मैतई की संख्या ज्यादा है। मैतई समुदाय के लोग घाटियों में, यानि मैदानी इलाकों में रहते हैं।
नगा और कुकी समुदाय में ईसाईयों की संख्या ज्यादा है और इस समुदाय में आदिवासी भी आते हैं। ये समुदाय पहाड़ों पर रहता है।

बात मणिपुर की राजनीति की करें, तो मणिपुर विधानसभा में इस वक्त 60 विधायकों में से 40 विधायक मैतई समुदाय के हैं, जबकि 20 नगा और कुकी समुदाय के विधायक हैं।
इसके अलावा, मणिपुर की सबसे खास बात यहां का भूभाग है। मणिपुर को आप एक फुटबॉल मैदान की तरह मान सकते हैं, जिसके करीब 10 प्रतिशत घाटी भूभाग पर मैतई समुदाय का वर्चस्व है। वहीं, 90 प्रतिशत भूभाग पहाड़ी इलाके में आते हैं, जहां मणिपुर के मान्यता प्राप्त आदिवासी रहते हैं।
ये विवाद घाटी और पहाड़ी में रहने वाले लोगों के बीच होती रहती है।
पिछले कुछ सालों में आदिवासियों के बीच ईसाईयों की घुसपैठ काफी ज्यादा बढ़ी और जमकर धर्म परिवर्तन किया गया है, लिहाजा ईसाई समुदाय की आबादी काफी तेज से बढ़ी है।
मैतई समुदाय को बनाया गया निशाना
बीबीसी की एक रिपोर्ट में मैतई समुदाय पर किए गये एक हमले के बारे में बताते हुए रिपोर्टर सौतिक बिस्वास ने लिखा है, कि सुंदर घाटी मैं कैसे मैतई समुदाय पर हमला किया गया।
उन्होंने लिखा है, कि मई की शुरुआत में अंधेरे की आड़ में, पहाड़ के ऊपर से लोग निकले और रात की शांति को चीरते हुए गोलियां चला रहे थे। उनमें से कुछ ने तलवार लहरा रहे थे, जबकि कई लोगों के हाथों में पेट्रोल और डीजल की बोतलें थीं।
पहाड़ से उतरे हुए लोग 'उन्हें मार डालो, उन्हें जला डालो' के नारे लगा रहे थे और उनके शोर से रात का सन्नाटा खौफनाक बन चुका था।
मणिपुर में ताजा विवाद की वजह हाईकोर्ट का वो फैसला है, जिसमें कहा गया है, कि मैतई समुदाय के लोगों को भी जनजाति का दर्जा दिए जाने को लेकर सरकार विचार करे। मैतई समुदाय की ये डिमांड पिछले 10 सालों से पेडिंग है।

हिंसा की शुरूआत कैसे हुई?
कोर्ट के इसी फैसले के बाद 3 मई को ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन की तरफ से मणिपुर में रैली का आयोजन किया गया, जिसमें आदिवासियों से एकजुट होने का आह्नान किया गया। ये रैली राजधानी इंफाल से करीब 65 किलोमीटर की दूरी पर तोरबाग इलाके में आयोजित की गई थी।
बीबीसी के मुताबिक, इस रैली में हजारों लोग शामिल हुए थे और इसी रैली के बाद मैतई समूह के खिलाफ आक्रोश भड़का और देखते ही देखते ये आक्रोश हिंसा में तब्दील हो गई।
बहुसंख्यक मैतेई और जनजातीय कुकी अल्पसंख्यक समूहों के बीच संघर्ष के दौरान अब तक 130 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। लगभग 60,000 लोग अपनी ही भूमि में शरणार्थी बन गए हैं।
हिंसा की ये कहानी के पीछे सिर्फ एक जनजाति का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके पीछे म्यांमार और ड्रग्स का भी मुद्दा है, जिसे चीन स्पांसर करता है।
मणिपुर की सैन्य पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी लेनिन लामाबाम ने कहा, कि "यह पहाड़ियों से घिरी घाटी है। यह एक संवेदनशील क्षेत्र है। उनके पास (कुकी) सुविधाजनक स्थान हैं। वे पहाड़ियों से हमला कर सकते हैं। कभी भी कुछ भी हो सकता है।"
सैन्य अधिकारी लेनिन लामाबाम अपने 80 जवानों और सैकड़ों सीमा बलों के साथ इलाके में गश्त कर रहे हैं।
मई में हुई हिंसा, और बाद में कुछ छिटपुट हमलों के बाद, सुंदरघाटी और आसपास के रहने वाले आधे से ज्यादा लोग भाग चुके हैं और अपने रिश्तेदारों के यहां या फिर राहत शिविरों में शरण ले चुके हैं। उनके घर और अन्न भंडार नष्ट हो गए हैं, और उनका सारा सामान, टीवी और वॉशिंग मशीन तक लूटा जा चुका है।
बीबीसी के मुताबिक, एक पुलिस अधिकारी ने कहा, कि विस्थापितों में आधे से ज्यादा लोग मैतई समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जो घाटी में बनाए गये राहत शिविरों में रह रहे हैं।
ड्रग्स के खिलाफ सरकार का अभियान
मणिपुर में भड़के तनाव के पीछे कई फैक्टर हैं, जिनमें से एक फैक्टर है, नशीली दवाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने, मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, जो मैतेई समुदाय से हैं, उनके नेतृत्व वाली सरकार ने पोस्त की खेती को निशाना बनाया है, जिसे मणिपुर में एक विवादित अभियान माना गया है।
2017 के बाद से, उनकी सरकार ने 18,600 एकड़ से ज्यादा पोस्ता खेतों को नष्ट करने का दावा किया है, जिनमें से ज्यादातर कुकी समुदायों के क्षेत्रों में हैं। (मणिपुर लंबे समय से नशीली दवाओं की लत के संकट से जूझ रहा है और यह दुनिया के दूसरे सबसे बड़े अफीम उत्पादक, म्यांमार की सीमा से लगे चार उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्यों में से एक है।)
मुख्यमंत्र विरेन सिंह के अभियान के विरोधियों का कहना है, कि पोस्ता की खेती करने वाले लोगों, जिनमें कुकी समुदाय के लोग ज्यादा हैं, उनका मानना है, कि इस कार्रवाई से उनकी जीविका छीनने की कोशिश की गई है।
विरोधियों का कहना है, कि सरकार ने कुकियों पर 'ड्रग्स का कारोबार' करने का आरोप लगाया है। कुकी नेताओं ने मुख्यमंत्री पर कुकी समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर कार्रवाई करने का आरोप लगाया। हालांकि, मुख्यमंत्री विरेन सिंह और बीजेपी ने इन आरोपों को नकारा है।
लेकिन, स्थानीय पड़ताल से पता चलता है, कि मणिपुर में पोस्ता की खेती काफी ज्यादा बढ़ गई है।
लीतांगपोकपी मे एक स्थानीय पूर्व शिक्षक, तरुण नगनगोम ने बीबीसी से कहा, कि पहले वे पहाड़ियों में कुकियों के स्वामित्व वाली जमीनों पर मौजूद लकड़ियों को काटते थे और फिर उन्हें बाजार में बेचने का काम करते थे, लेकिन अब ये कारोबार धीमा हो गया है, क्योंकि अब पहाड़ों में पोस्ता की खेती काफी ज्यादा होने लगी है।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबक, इम्फाल के पूर्वी हिस्से में 730 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में खसखस के खेत हैं, जो मणिपुर के अनुमानित 33 लाख लोगों में से 16% लोगों का घर है, और जिसमें नागा, मैतेई और नेपाली लोगों के बसे हुए गांव शामिल हैं, लेकिन इन क्षेत्र में पोस्ता की खेती के खिलाफ कार्रवाई की गई है।

मणिपुर में म्यांमार की क्या है भूमिका?
मणिपुर और म्यांमार की सीमा आपस में लगती है, लिहाजा म्यांमार से हमेशा से अवैध प्रवासी मणिपुर आते रहे हैं। खासकर 2021 में सैन्य शासन स्थापित होने के बाद म्यांमार से भागकर भारी संख्या में सैन्य विद्रोही भारत आए हैं।
सैन्य विद्रोहियों के साथ भारी संख्या में ड्रग्स तस्करी भी सीमा पार से भारत में घुसे हैं। म्यांमार की सेना को चीन का समर्थन है, लिहाजा चीन की कोशिश भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को मणिपुर के जरिए अशांत करने की है।
मणिपुर, म्यांमार के साथ 400 किलोमीटर लंबी सीमा साझा करता है और म्यांमार से सटती सीमा वर्ती क्षेत्रों में मैतई समुदाय के लोगों की संख्या ज्यादा है, लिहाजा उन गावों में म्यांमार के अवैध प्रवासियों के खिलाफ आवाजें उठती रहती हैं। 'बर्मी शरणार्थियों वापस जाओ' के नारे लगे पोस्टर्स इन क्षेत्रों में हर दूसरे कदम पर देखने को मिलते हैं।
म्यांमार में चल रहे गृहयुद्ध की वजह से शरणार्थियों की आमद के बारे में स्थानीय लोगों में भारी चिंता है। अनुमानित तौर पर इस वक्त करीब 40 हजार से ज्यादा म्यांमार के शरणार्थी, मणिपुर में रह रहे हैं।
राज्य सरकार के एक पैनल ने अप्रैल के अंत तक मणिपुर के चार जिलों में म्यांमार से 2,187 अप्रवासियों की पहचान की थी।
एक आधिकारिक नोट में "बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों" की बात की गई थी और कहा गया था, कि "हाल की हिंसा को प्रभावशाली अवैध पोस्त की खेती करने वालों और म्यांमार से मणिपुर में बसने वाले ड्रग माफियाओं द्वारा भड़काया गया था।"
वहीं, पिछले कुछ महीनों में चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स में बार बार मणिपुर को लेकर लेख लिखे गये हैं।
हालांकि, हाल की हिंसा से पहले आम लोगों का जीवन काफी हद तक बिना किसी टकराव के चल रही थी। तलहटी में बसे गांवों में, मैतेई लोगों ने जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने और सड़क निर्माण के लिए उत्खननकर्ताओं को नियुक्त करने के लिए, ऊपर की ओर यात्रा की है और कुकी व्यापार करने के लिए नीचे आये हैं।
लेकिन, अब स्थानीय लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल ये है, कि अब आगे क्या होगा। स्थानीय लोग अभी भी इस बात पर यकीन नहीं कर पाते हैं, कि मणिपुर में हिंसा इतनी ज्यादा कैसे बढ़ गई। स्थानीय लोग पूछते हैं, कि क्या मणिपुर में आग बाहर से लगाई गई है और उनके बीच का कारोबार कैसे बहाल होगा और उनका जीवन, पटरी पर कैसे लौट पाएगा?












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