कौन हैं श्रीलंका के नये राष्ट्रपति बने रानिल विक्रमसिंघे, देश को निकाल पाएंगे मुसीबतों से बाहर?
कोलंबो, 20 जुलाईः आजादी के बाद सबसे बड़े राजनीतिक-आर्थिक संकट का सामना कर रहे श्रीलंका को आखिरकार राष्ट्रपति मिल चुका है। श्रीलंका की संसद ने बुधवार को रानिल विक्रमसिंघे को देश का अगला राष्ट्रपति चुना। आधिकारिक परिणामों से पता चला कि विक्रमसिंघे को त्रिकोणीय मुकाबले में 134 वोट मिले, जिसमें उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी दुलस अल्हाप्परुमा को 82 और वामपंथी अनुरा दिसानायके को सिर्फ 3 वोट प्राप्त हुए।

हालात कैसे भी हों, डटे रहो
इससे पहले 2020 के चुनाव में रानिल विक्रमसिंघे की यूनाईटेड नेशनल पार्टी जो देश में सबसे पुरानी पार्टी है वह एक भी सीट जीत नहीं पाई थी। यूएनपी के मजबूत गढ़ रहे कोलंबो से रानिल विक्रमसिंघे अपनी सीट नहीं बचा पाए थे। बाद में वह कम्यूनेटिव नेशनल वोट के आधार पर यूएनपी को आवंटित राष्ट्रीय सूची के माध्यम से संसद पहुंच सके। आज दो सालों बाद स्थिति बदल चुकी है। चुनाव में अपना परचम लहराने वाला राजपक्षे परिवार दर-दर भटकने पर मजबूर है।

44 साल बाद सीक्रेट वोटिंग से चुनाव
73 वर्षीय विक्रमसिंघे को सत्तारूढ़ श्रीलंका पोदुजाना पेरामुना (SLPP) का समर्थन प्राप्त है। 6 बार के पूर्व प्रधानमंत्री, विक्रमसिंघे अपने पूर्ववर्ती गोटबाया राजपक्षे के देश छोड़कर फरार होने और इस्तीफा देने के बाद कार्यवाहक राष्ट्रपति बने थे। इस दौरान वह प्रधानमंत्री पद पर भी तैनात थे। 44 वर्षों में यह पहली बार है जब श्रीलंका की संसद ने सीधे तौर पर किसी राष्ट्रपति का चुनाव किया है। यानी 1978 के बाद पहली बार देश में सीक्रेट वोटिंग के द्वारा राष्ट्रपति को चुना गया है। 1982, 1988, 1994, 1999, 2005, 2010, 2015 और 2019 के राष्ट्रपति चुनावों में जनता के प्रत्यक्ष मतों द्वारा चुना गया था।

भारत संग अच्छे संबंधों के हिमायती
विक्रमसिंघे को दूरदृष्टि वाली नीतियों के साथ अर्थव्यवस्था संभालने वाले नेता के तौर पर जाना जाता है। उन्हें अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाने वाला नेता भी माना जाता है। इसके साथ ही सबसे खास बात ये है कि उन्हें भारत समर्थक नेता माना जाता है। वह वे भारत के साथ संबंध प्रगाढ़ करने के प्रबल हिमायती रहे हैं। पड़ोसी देश भारत के प्रति किसी तरह का पूर्वग्रह नहीं रखते। जबकि इससे पूर्व के राष्ट्रपति रहे गोटाबाया और महिंदा राजपक्षे का चीनी प्रेम जगजाहिर रहा है। श्रीलंका की इस बुरी हालत के मूल में राजपक्षे परिवार संग चीन की भी बड़ी भूमिका है।

कई अहम पदों पर रहे हैं रानिल
श्रीलंका को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद 1949 में जन्मे विक्रमसिंघे 1977 में मात्र 28 वर्ष की उम्र में सांसद चुने गए थे। रानिल विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान यूनाइटेड नेशनल पार्टी की यूथ लीग में शामिल हो गए थे। उस समय श्रीलंका में सबसे कम उम्र के मंत्री के रूप में, उन्होंने राष्ट्रपति जयवर्धने के अधीन उप विदेश मंत्री का पद संभाला था। रानिल विक्रमसिंघे 1994 से यूनाइटेड नेशनल पार्टी के प्रमुख रहे हैं। 1993 में पहली बार PM बनने से पहले रानिल उप विदेश मंत्री, युवा और रोजगार मंत्री सहित कई और मंत्रालय संभाल चुके हैं। इसके साथ ही उन्होंने वकालत की भी पढ़ाई की है। वह संसद में दो बार विपक्षी नेता की भूमिका निभा चुके हैं।

रानिल के सामनें क्या हैं चुनौतियां
देश के नए राष्ट्रपति के सामने चुनौतियों का पहाड़ है। उनके सामने श्रीलंका को आर्थिक संकट से निकालने की चुनौती होगी। श्रीलंका के सामने सबसे बड़ी समस्या वहां के भ्रष्ट व्यवस्था और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे वहां के राजनेता रहे हैं। यही वजह है कि अब तक कोई भी देश श्रीलंका को उबारने के लिए खासा प्रयास नहीं कर रहा था। भारत ने भी श्रीलंका की मदद में महत्वपूर्ण उपयोगी सामान ही पहुंचाया है, बहुत अधिक कैश से मदद नहीं की है। भारत, अमेरिका सहित कई विकसित देश अभी तक श्रीलंका को कैश देने से बचते रहे हैं।

श्रीलंका की हालत सुधेरगी?
विकसित देशों को लगता है कि श्रीलंका के नेताओं तक कैश पहुंचा तो ये उसे जनता तक खर्च करने के बजाए बस अपनी झोली भरेंगे। ऐसे में आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक को आगे किया जा रहा है। यही आर्थिक संस्थाएं श्रीलंका को सख्त शर्तों पर बेलआउट पैकेज देंगे। इनकी लीगल बाउंडेशन होगी और श्रीलंका की किसी भी सरकार को इन संस्थाओं की बातें माननी जरूरी होंगी। हालांकि अब जब श्रीलंका की कमान विक्रमसिंघे के हाथ पूरी तरह आ चुकी है यह संभव है कि भारत, जापान, अमेरिका और आस्ट्रेलिया सहित कई अन्य देश अब इस संकट से घिरे द्वीप राष्ट्र की खुलकर मदद कर पाएं।
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