तालिबान शासन के एक साल: पैसे की तंगी और बीमारी से कैसे जूझ रहा है अफगानिस्तान?

देश में गरीबी चरम पर पहुंच चुकी है। खासकर दक्षिणी अफगानिस्तान में स्थिति काफी ज्यादा खराब होती जा रही है। खासकर यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है।

काबुल, अगस्त 10: दक्षिणी अफगानिस्तान में एक जर्जर अस्पताल में बेबस पड़े मरीज तालिबान के एक साल के शासन की कहानी बयान करने के लिए काफी है और बताता है, कि अफगानिस्तान में कितना घनघोर मानवीय संकट है, जहां लोगों के पास ना पैसे हैं और ना ही इलाज के लिए अस्पताल बचे हैं। पिछले साल 15 अगस्त को तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से देश की सत्ता पर काबिज होने का ऐलान किया था, लेकिन पिछले एक साल में तालिबान को किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी है और तालिबान के पास देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने का एक भी रास्ता नहीं है। गुट के अंदर आपसी लड़ाई ने स्थिति को और खराब ही किया है और तालिबान की अंतरिम सरकार अभी तक स्थाई सरकार नहीं बन पाई और ना ही तालिबान अभी तक ये तय कर पाई है, कि अफगानिस्तान में उसे किस तरह की सरकार का निर्माण करना है।

गंभीर मानवीय संकट से गुजरते अफगान

गंभीर मानवीय संकट से गुजरते अफगान

पिछले महीने अफगानिस्तान के हेलमंद प्रांत के मूसा कला जिला अस्पताल को संदिग्ध हैजा से पीड़ित लोगों को छोड़कर बाकी सभी तरह के मरीजों के लिए अपने दरवाजे बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा और उसके बाद ये अस्पताल काफी तेजी से बिना रजिस्टर्ड रोगियों से भर गया। रोगियों को पानी चढ़ाने की जरूरत थी, क्योंकि हैजा उनके शरीर को तोड़ रहा था, लेकिन अस्पताल के पास पानी चढ़ाने जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं थीं। कई मरे और कई अपनी तकदीर के सहारे बच गये। पता चला, कि हेलमंद प्रांत के लोग जो पानी पीते हैं, वो खराब है, लिहाजा अभी भी भारी संख्या में लोग हैजा से पीड़ित होते रहते हैं, लेकिन तालिबान के पास ना पैसे हैं और ना ही इच्छाशक्ति, कि वो लोगों का इलाज करवा सके, या फिर स्वच्छ पानी की व्यवस्था कर सके। समाचार एजेंसी एएफपी से बात करते हुए अस्पताल के प्रमुख एहसानुल्लाह रोडी ने कहा, कि 'यह काफी मुश्किल है।' उन्होंने कहा कि, डॉक्टर महज पांच घंटे की नींद सो पाता है। डॉक्टर एहसानुल्लाह रोडी बताते हैं, कि ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं हुई थी। वहीं, संयुक्त राष्ट्र का कहना है, कि अफगानिस्तान का मानवीय संकट दुनिया का सबसे खराब संकट है।

बर्बादी की कहानी- भूखे पेट सोते बच्चे

बर्बादी की कहानी- भूखे पेट सोते बच्चे

देश में गरीबी चरम पर पहुंच चुकी है। खासकर दक्षिणी अफगानिस्तान में स्थिति काफी ज्यादा खराब होती जा रही है। खासकर यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। पहले से ही अफगानिस्तान में महंगाई काफी ज्यादा थी, जिसे यूक्रेन युद्ध ने और भी ज्यादा बढ़ा दिया है। लोगों के जेब में सामान खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, लिहाजा अब उन्हें हताशा घेर रही है। हेलमंद की प्रांतीय राजधानी लश्कर गाह में अपने कुपोषित छह महीने के पोते के बगल में एक अस्पताल की खाट पर बैठी एक महिला ने एएफपी से कहा, "जब से अमीरात (तालिबान) सत्ता में आई है, हमें खाना पकाने का तेल भी नहीं मिल रहा है।" उन्होंने कहा, कि "गरीब लोगों को यहां पर पैरों तले कुचल दिया जाता है।" वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय और डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (MSF) संयुक्त तौर पर बूस्ट नाम के एक अस्पताल का संचालन कर रहा है, जहां महिला के पोते का पांचवी बार इलाज किया जा रहा है।

अस्पताल में जीवन और मौत से जंग

अस्पताल में ज्यादातर मरीज कुपोषित हैं और सांस के साथ जंग कर रहे हैं। एक अन्य बच्चा मरीज की मां ब्रेशना ने कहा कि, "हमें सूखी रोटी भी नहीं मिल रही है, जिसकी उम्र 15 से 20 के बीच है। उन्होंने एएफपी से कहा, कि "हमारे पास तीन या चार दिनों में खाने के लिए कुछ नहीं है।" वहीं, सहायक नर्सिंग पर्यवेक्षक होमिरा नोरोज़ी ने कहा, कि रोते हुए शिशुओं का इलाज करना काफी मुश्किल है, वो भूखे होते हैं और कर्मचारियों के पास आराम करने का भी वक्त नहीं होता है। उन्होंने कहा, कि "हमारे पास बहुत सारे मरीज़ हैं जो गंभीर रूप से आते हैं, और उनके माता-पिता कहीं और जाने की स्थिति में नहीं हैं।'' नर्स ने कहा, कि "हम नहीं जानते कि कितनी मौतें हुई हैं ... हमारे पास पूरे जिले की जिम्मेजारी है, क्योंकि बहुत लोग अब अस्पताल ही नहीं आते हैं।''

हर तरफ दुर्दशा ही दुर्दशा

हर तरफ दुर्दशा ही दुर्दशा

अफगानिस्तान की दुर्दशा 15 अगस्त 2021 से पहले ही शुरू हो गई थी, जब तालिबान ने अमेरिकी नेतृत्व वाले सैनिकों की जल्दबाजी में वापसी और सरकार के पतन के बाद काबुल पर कब्जा कर लिया था। लेकिन, तालिबान के अधिग्रहण के बाद देश के करीब 3 करोड़ 80 लाख लोग सड़कों पर आ चुके हैं। तालिबान के कब्जे के बाद ही अमेरिका ने अफगानिस्ता के केन्द्रीय बैंक की 7 अरब डॉलर की संपत्ति को फ्रीज कर दिया था, लिहाजा अफगानिस्तान का बैंकिंग सेक्टर औपचारिक तौर पर ध्वस्त हो चुका है। वहीं, तालिबान राज से अफगानिस्तान की जीडीपी में 45 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से मिली मदद से होता था, जो अब पूरी तरह से बंद हो चुका है। ऐसा नहीं है, कि कई देश अभी भी अफगानिस्तान को अभी भी दान नहीं देना चाहते हैं, लेकिन अफस्तान का नाम पर 'अमीरात' हो चुका है, जिसे किसी भी राष्ट्र से मान्यता नहीं मिली है और अफगानिस्तान विश्लेषक नेटवर्क के रोक्सन्ना शापोर बताते हैं, कि "आप उस देश में सहायता कैसे प्रदान करते हैं जहां की सरकार को मान्यता ही नहीं मिली है।''

भूकंप ने संकट को और बढ़ाया

भूकंप ने संकट को और बढ़ाया

वहीं, जून महीने में आए भूकंप के भीषण झटकों ने अफगानिस्तान की दुर्दशा को और भी ज्यादा गंभीर कर दिया है। भूकंप की वजह से एक हजार से ज्यादा लोग मारे गये और हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। हालांकि, इस मौके पर भारत समेत कुछ और देशों ने भारी मदद पहुंचाई है और उनके लिए खाने-पीने का प्रबंध किया है, जिसको लेकर रोक्सन्ना शापोर कहते हैं, कि ये एक गैर-राजनीतिक मदद है और ये एक जीवन रक्षक सहायता है, लिहाजा उसे नहीं रोका गया। खाद्य सहायता और स्वास्थ्य देखभाल के लिए नकद भी एयरलिफ्ट किया जाता है, लेकिन दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए विकास सहायता जो अर्थव्यवस्था को बदल सकती है, जरूरत उसकी है, जो काफी ज्यादा जटिल है। रोक्सन्ना शापोर ने कहा कि, "यदि आप अंदर जाते हैं और कहते हैं,'मैं सभी शिक्षकों के वेतन का भुगतान करने जा रहा हूं' तो यह बहुत अच्छा है। लेकिन तब तालिबान उस पैसे का क्या करेंगे जो वे शिक्षक के वेतन का भुगतान न करने से बचाते हैं?" ये एक बड़ा सवाल है।

कैसा होता है अफगानों का दैनिक जीवन

कैसा होता है अफगानों का दैनिक जीवन

हालांकि, देश में अब काफी हद तक शांति है, लेकिन लोग काम मांग रहे हैं, जो तालिबान के पास नहीं है। कई जगहों पर लोगों ने पंक्चर और गाड़ियों की रिपेयरिंग के काम शुरू कर दिए हैं, लेकिन वहां पर भी अभाव ही दिखाई देता है। मरे हुए मुर्गों की बिक्री होती है और भी कुछ छोटे-मोटे काम होते हैं, जो लोग करने की कोशिश करते हैं। लश्कर गाह से दांतेदार चट्टानों के साथ एक निर्जन नदी के किनारे एक अस्थायी ट्रैक से जुड़ा हुआ मूसा कला शहर ने साल 2001 से 2021 के बीच कई खूनी संघर्ष देखे हैं, लेकिन अब संघर्ष पेट भरने की है, जो काफी दटिल है। जगह जगह मिट्टी के ऐसे घर मिलते हैं, जिनपर गोली और बमों के निशान हैं, जिनमें से ज्यादातर घर अब गिरते रहते हैं। निराशा में भरे लोग और भूखे बच्चों को देखना एक क्रूर विडंबना से कम नहीं लगता है। लोग कहते हैं, कि पहले लड़ाईयों की वजह से ज्यादतर वक्त सड़के बंद रहती हैं, लेकिन अब सड़कें खुली हैं, लेकिन लोग किस काम से उसपर चलेंगे, ये बड़ा सवा है। हेलमंद के सार्वजनिक स्वास्थ्य निदेशक सैयद अहमद ने एएफपी को बताया कि नए रोगियों की बाढ़ का मतलब है कि "कम जगह" है और "कम कर्मचारी हैं, इसलिए मुश्किलें काफी हैं"।

क्या तालिबान की वजह से हो रहा ऐसा?

क्या तालिबान की वजह से हो रहा ऐसा?

डॉक्टर सैयद अहमद ने इस विकराल स्थिति के पीछे तालिबान पर लगए गये आर्थिक प्रतिबंधों को जिम्मेदार बयाया और कहा, कि लोगों की जरूरतें और मांग बढ़ गई हैं। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है, कि इस्लामवादी संगठन तालिबान निर्दोष नहीं है। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के ग्रीम स्मिथ ने कहा कि, "तालिबान की दमनकारी सामाजिक नीतियों ने उन जमी हुई संपत्तियों को अनलॉक करने पर एक समझौते पर पहुंचना और मुश्किल बना दिया है।" उन्होंने कहा कि, "यह वास्तव में नीति निर्माताओं की भावनाओं के बारे में है, जिन्होंने लड़कियों को घर में कैद कर दिया गै, लड़कियों के लिए माध्यमिक स्कूल बंद कर दिए हैं और आप एक तरफ चंदा चाहते हैं, जबकि दूसरी तरफ आतंकवादियों को अपने घर में छिपाते हैं, ये बातें काफी ज्यादा मूड खराब करती हैं। यानि, तालिबान ही इस स्थिति के जिम्मेदार है और तालिबान लोगों का भूख कैसा भरता है, देखने वाली बात होगी।

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