नेपाल बनेगा हिंदूराष्ट्र, लौटेगी राजशाही? लोकतंत्र खत्म करने की मांग को लेकर भीषण प्रदर्शन
2008 में 240 साल पुरानी राजशाही व्यवस्था समाप्त होने के बाद नेपाल में लोकतंत्र आया था। लेकिन 15 साल बीतने के बाद लोगों को राजशाही पसंद आने लगी है। नेपाल में लोकतंत्र को हटाने और राजशाही को वापस लाने के लिए आए दिन प्रदर्शन हो रहे हैं।
नेपाल में राजशाही को वापस लाने के लिए एक बार फिर से गुरुवार को प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारी, राष्ट्रीय ध्वज लहराते हुए और पूर्व राजा ज्ञानेंद्र के समर्थन में नारे लगाते हुए, राजधानी में एकत्र हुए और शहर के केंद्र की ओर बढ़ने लगे।

इस दौरान राजशाही समर्थक और पुलिस के बीच झड़प हो गई। इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पानी की बौछारें और आंसूगैस का इस्तेमाल किया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को दर्जनों राउंड आंसू गैस छोड़नी पड़ी।
इस दौरान दोनों पक्षों को मामूली चोटें आईं हैं। पुलिस ने बताया कि भीड़ ने प्रदर्शन के लिए तय क्षेत्र को पार करने का प्रयास किया। अधिकारियों ने रैली से 2 दिन पहले शहर के प्रमुख इलाकों में विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन इसके बावजूद प्रदर्शन के लिए हजारों लोग जुटे।
इस दौरान लोगों ने "हम अपने राजा और देश को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं। राजशाही वापस लाओ। गणतंत्र को ख़त्म करो,'' का नारा लगाया। जानकारी के मुताबिक इस रैली का नेतृत्व दुर्गा प्रसाई कर रहे थे। इस रैली को पूर्व राजा ज्ञानेंद्र का भी समर्थन हासिल है।
दुर्गा प्रसाई को नेपाल की राजनीति में एक विवादस्पद व्यवसाई माना जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के साथ रिश्ता बिगड़ने के बाद दुर्गा प्रसाई ने देश में राजशाही वापस लाने का अभियान शुरू किया है।
दुर्गा प्रसाई लोगों को राष्ट्र, राष्ट्रीयता, धर्म-संस्कृति और नागरिक बचाव अभियान के तहत लोगों को संगठित कर रहे हैं। काठमांडो पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, प्रसाई ने वर्तमान नेपाल सरकार को गिराने और राजशाही और हिंदू साम्राज्य को बहाल करने की धमकी दी है।
पुलिस ने प्रसाई पर भीड़ को उकसाने का आरोप लगाया है। 2008 में समाप्त की गई राजशाही की वापसी की मांग करने के लिए राजा और दुर्गा प्रसाई के समर्थक पूरे देश से चलकर राजधानी काठमांडू आए थे। उन्होंने सरकार और राजनीतिक दलों पर भ्रष्टाचार और विफल शासन का आरोप लगाया।
साल 2006 में कई हफ्तों तक सड़क पर विरोध प्रदर्शन के कारण तत्कालीन राजा ज्ञानेंद्र को अपना सत्तावादी शासन छोड़ने और लोकतंत्र लागू करने के लिए मजबूर होना पड़ा था।












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