अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल, कैसे चार साल में भारत के पड़ोसी देशों में मचा राजनीतिक उथल-पुथल?
Nepal Gen Z protest: पिछले चार-पांच वर्षों में भारत के पड़ोसी देशों में अस्थिरता की लहर ने जोर पकड़ा है। अफगानिस्तान से शुरू हुआ ये सिलसिला अब नेपाल तक पहुंच चुका है। हर जगह आंदोलन का एक ही रूप देखने को मिला। अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा, श्रीलंका में आर्थिक संकट, बांग्लादेश में छात्र आंदोलन और अब नेपाल में Gen-Z प्रदर्शनों ने सत्ता परिवर्तन को तेज कर दिया है।
इन देशों में भ्रष्टाचार, आर्थिक बदहाली, और सामाजिक असंतोष ने जनआंदोलनों को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप सरकारें गिरीं और अराजकता बढ़ी। नेपाल में प्रदर्शनकारियों ने संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक कब्जा कर लिया, वहीं बांग्लादेश में शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा। यह कहानी भारत के पड़ोस में उथल-पुथल और बदलाव की तस्वीर पेश करती है।

नेपाल: Gen-Z का विद्रोह और सत्ता का संकट
नेपाल में 2025 में सोशल मीडिया बैन के खिलाफ शुरू हुआ Gen-Z आंदोलन सत्ता परिवर्तन का कारण बना। प्रदर्शनकारियों ने संसद, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के आवास पर कब्जा कर लिया। कई मंत्रियों के घरों में आगजनी हुई। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन जनता का गुस्सा शांत नहीं हुआ। भ्रष्टाचार और आर्थिक बदहाली ने युवाओं को सड़कों पर उतारा। नेपाल में अस्थिरता ने भारत के लिए सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियां बढ़ा दी हैं, क्योंकि सीमा पर अशांति क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।
अफगानिस्तान: तालिबान का उदय और अशरफ गनी का पलायन
अफगानिस्तान (Afghanistan) में 2021 में तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया, जिसने दो दशकों तक चली अमेरिका समर्थित सरकार को ध्वस्त कर दिया। 2001 में अमेरिका ने तालिबान को हटाकर अशरफ गनी की सरकार स्थापित की थी, लेकिन 2020 के अमेरिका-तालिबान समझौते के बाद विदेशी सेनाओं की वापसी शुरू हुई। तालिबान ने मौके का फायदा उठाया और अप्रैल 2021 से हमले तेज कर दिए। 15 अगस्त 2021 को काबुल पर कब्जे के साथ राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर भाग गए। काबुल हवाई अड्डे पर भगदड़ में 170 से अधिक लोग मारे गए। तालिबान ने महिलाओं के अधिकार सीमित किए और देश आर्थिक संकट में डूब गया।
श्रीलंका: आर्थिक संकट और जनआंदोलन
श्रीलंका (Sri Lanka) में 2022 में आर्थिक संकट ने सरकार को उखाड़ फेंका। 2019-2022 के दौरान विदेशी कर्ज बढ़ने, कोरोना महामारी और पर्यटन उद्योग के ठप होने से अर्थव्यवस्था चरमराई। ईंधन, दवाओं और रोजमर्रा की वस्तुओं की कमी ने जनता को सड़कों पर उतार दिया। मार्च-अप्रैल 2022 में कोलंबो में लाखों लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन और संसद पर कब्जा कर लिया। 9 जुलाई 2022 को राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे मालदीव भाग गए और बाद में इस्तीफा दे दिया। मई 2022 में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को भी पद छोड़ना पड़ा। देश में अस्थिरता अब भी बनी हुई है।
बांग्लादेश: छात्र क्रांति और शेख हसीना का पतन
2024 में बांग्लादेश (Bangladesh) में छात्र आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार को गिरा दिया। भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और आरक्षण नीति पर असंतोष ने आंदोलन को जन्म दिया, जिसे 'दूसरा स्वतंत्रता संग्राम' कहा गया। जुलाई-अगस्त 2024 में हिंसक प्रदर्शनों में 300 से अधिक लोग मारे गए। सेना की भूमिका के बाद 5 अगस्त 2024 को हसीना को इस्तीफा देकर भारत भागना पड़ा। नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी, लेकिन देश में स्थिरता बहाल नहीं हुई। प्रदर्शनकारियों ने बंगबंधु शेख मुजीबुर्रहमान की मूर्ति तक तोड़ दी, जो देश में गहरे असंतोष को दर्शाता है।
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भारत के लिए चुनौती
पड़ोसी देशों में चल रही राजनीतिक उठापटक भारत के लिए कई स्तरों पर चुनौती बन गई है।
- सुरक्षा खतरा - नेपाल और बांग्लादेश में अस्थिरता का सीधा असर भारत की सीमाओं पर पड़ सकता है। अवैध घुसपैठ, शरणार्थियों का दबाव और उग्रवाद की आशंका बढ़ जाती है।
- कूटनीतिक मुश्किलें - हर बार सरकार बदलने के साथ भारत को अपने संबंधों की नए सिरे से समीक्षा करनी पड़ती है। खासकर बांग्लादेश और नेपाल जैसे करीबी पड़ोसी भारत की विदेश नीति पर सीधा असर डालते हैं।
- आर्थिक असर - क्षेत्र में अस्थिरता का मतलब है व्यापार, ट्रांजिट और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर ब्रेक लगना। चीन जैसी ताकतें इस खाली जगह का फायदा उठाकर अपना प्रभाव बढ़ा सकती हैं।
- क्षेत्रीय स्थिरता - अफगानिस्तान में तालिबान, श्रीलंका का आर्थिक संकट और नेपाल-बांग्लादेश की उथल-पुथल मिलकर दक्षिण एशिया की स्थिरता को लगातार चुनौती दे रही हैं।
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