JD Vance Kids: चौथी बार बनेंगे पिता, गूंजेगी बेटे की किलकारियां, भारत में बैन-किन देशों में भ्रूण जांच जारी?
JD Vance Kids: बुधवार को अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वेंस (Vice President JD Vance) और पत्नी ऊषा वेंस ने एक्स पर घोषणा की वे चौथी बार माता-पिता बनने वाले हैं। फिर एक बार उन्हें बेटा होगा। जेडी वेंस वर्तमान में दो बेटों और एक बेटी के पिता हैं। लेकिन उन्हें कैसे पता चला कि उन्हें होने वाली संतान बेटा ही है?
दरअसल, NIPT टेस्ट (नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट) या एमनियोसेंटेसिस के जरिए पता चला कि उनको बेटा होने वाला है। लेकिन उसके बाद से ही भ्रूण परीक्षण को लेकर बहस छिड़ गई है। क्योंकि भारत में ये टेस्ट बैन हैं। लेकिन कुछ भारतीय इसके लिए विदेश तक चले जाते हैं, ताकि होने वाले बच्चे का जेंडर पता चल सके। आइए इसे समझते हैं।

क्यों बैन हुई भ्रूण के लिंग की जांच?
भ्रूण लिंग परीक्षण (नॉन-इनवेसिव प्रीनेटल टेस्ट) वह प्रक्रिया है, जिसमें गर्भावस्था के दौरान अल्ट्रासाउंड, NIPT जैसी तकनीकों से गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग पता किया जाता है। दुनिया के ज़्यादातर देशों में यह प्रक्रिया कानूनी है। IVF के दौरान होने वाली प्री-इम्प्लांटेशन जेनेटिक टेस्टिंग (PGT) की तुलना में, जिस पर गैर-चिकित्सीय कारणों से ज्यादा पाबंदियां हैं, गर्भावस्था के दौरान किए जाने वाले लिंग परीक्षण पर सीधे प्रतिबंध कम देखने को मिलते हैं। हालांकि, कई देश इसका इस्तेमाल लिंग-चयनात्मक गर्भपात के लिए न हो, इसीलिए इसे कंट्रोल या सीमित करते हैं।
कितने देशों में भ्रूण का जेंडर पता करना कानूनी?
कानून देश-देश में अलग हैं, लेकिन अनुमान के मुताबिक करीब 40 से 50 देशों में भ्रूण लिंग परीक्षण पर प्रतिबंध है। यानी यूनाइटेड नेशन्स के 195 सदस्य देशों में से लगभग 140 से 150 देशों में यह किसी न किसी रूप में कानूनी है। इससे साफ होता है कि दुनिया का बड़ा हिस्सा इसे स्वीकार करता है, खासकर तब जब इसका उद्देश्य स्वास्थ्य से जुड़ा हो।
अमेरिका, यूरोप और एशिया के कानूनी उदाहरण
अमेरिका में भ्रूण लिंग पता करने पर कोई संघीय प्रतिबंध नहीं है। वहां अधिकतर क्लीनिक 10 हफ्ते के बाद NIPT टेस्ट करते हैं और परिणाम निजी तौर पर बताए जाते हैं, हालांकि कुछ राज्य लिंग-चयनात्मक गर्भपात पर नजर रखते हैं। मेक्सिको में यह खुले तौर पर अनुमत है और वहां मेडिकल टूरिज्म के तहत गैर-चिकित्सीय कारणों से भी यह सुविधा मिल जाती है। थाईलैंड में प्रसवपूर्व लिंग परीक्षण वैध है, लेकिन IVF के ज़रिए लिंग चयन सिर्फ मेडिकल कारणों तक सीमित है।
ईरान और यूरोप की स्थिति
ईरान में प्रसवपूर्व लिंग परीक्षण ही नहीं, बल्कि परिवार संतुलन के लिए गैर-चिकित्सीय PGT भी स्वास्थ्य मंत्रालय की निगरानी में अनुमति प्राप्त है। साइप्रस (उत्तर और दक्षिण दोनों) में यह सुविधा आसानी से मिल जाती है, जहां कई यूरोपीय लोग अपने देशों के कड़े कानूनों से बचने आते हैं। जर्मनी जैसे कई यूरोपीय देशों में 12 हफ्ते के बाद लिंग बताने की अनुमति है, जबकि फ्रांस और नीदरलैंड में यह सिर्फ मेडिकल जरूरत पर ही संभव है। यूके में HFEA की चेतावनियों के बावजूद निजी NIPT के जरिए लिंग परीक्षण उपलब्ध है।
भारत समेत कहां-कहां है बैन?
भारत में PCPNDT एक्ट 1994 के तहत भ्रूण लिंग परीक्षण पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसका मकसद कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है और उल्लंघन पर 7 साल तक की जेल हो सकती है। चीन ने 2005 से ऐसा ही कानून लागू कर रखा है, जिसमें जुर्माना और लाइसेंस रद्द करने का प्रावधान है, हालांकि अवैध तरीके अब भी सामने आते हैं। कनाडा में असिस्टेड ह्यूमन रिप्रोडक्शन एक्ट गैर-चिकित्सीय लिंग चयन पर रोक लगाता है। ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, नेपाल और कोसोवो में भी मेडिकल कारणों को छोड़कर यह प्रतिबंधित है।
टेस्ट कराने किन देशों में जाते हैं भारतीय?
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के रईस लोग जो अपने होने वाले बच्चे के जेंडर का करना चाहते हैं, वे पहले भारत में ये टेस्ट करवाने की जुगाड़ तलाशते हैं। यदि वह फेल होते हैं तो पैसे खर्च कर दुबई, थाईलैंड, सिंगापुर जैसी जगहों पर घूमने के बहाने जाते हैं और ये टेस्ट करवा लेते हैं।
वैश्विक रुझान और आंकड़े
एशिया में प्रतिबंध ज्यादा हैं क्योंकि यहां लिंग अनुपात असंतुलन बड़ी समस्या रही है। भारत में कुछ इलाकों में यह अनुपात 1,000 लड़कों पर 918 लड़कियों तक गिर गया था। यूरोप के 20 से ज्यादा देश Biothics नियमों के तहत इसे केवल चिकित्सा उपयोग तक सीमित रखते हैं। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में अक्सर स्पष्ट कानून नहीं हैं, इसलिए यह सामान्य अल्ट्रासाउंड के जरिए कानूनी रूप से हो जाता है।
WHO की राय और भविष्य की दिशा
WHO और UNFPA गैर-चिकित्सीय लिंग परीक्षण का विरोध करते हैं, लेकिन इसे रोकने के लिए कोई वैश्विक संधि नहीं है। हीमोफिलिया जैसे एक्स-लिंक्ड रोगों के मामलों में मेडिकल छूट हर जगह मान्य है। NIPT की बढ़ती लोकप्रियता, जो 10 हफ्ते में 99% तक सटीक है, कानून लागू करने की चुनौती बढ़ा रही है और इससे अमेरिका व ईरान जैसे देशों की ओर "प्रजनन पर्यटन" बढ़ रहा है।
सामाजिक असर और नैतिक बहस
जहां अनुमति वाले कानून मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देते हैं, वहीं प्रतिबंधों का मकसद सामाजिक संतुलन बनाए रखना है, जैसे भारत में 1994 के बाद लिंग अनुपात में सुधार की कोशिश। आज भी यह बहस जारी है कि व्यक्तिगत आज़ादी ज्यादा जरूरी है या समाज को होने वाला नुकसान। विशेषज्ञ "डिज़ाइनर बेबी" जैसे खतरों की चेतावनी देते हैं। 2026 तक संकेत मिलते हैं कि एशिया में कानून और सख्त होंगे, जबकि तकनीक के चलते कुछ देशों में उदार रुख बना रहेगा।
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