समंदर में फुकुशिमा प्लांट का करोड़ों लीटर जहरीना पानी छोड़ेगा जापान, रेडिएशन से डरे चीन-कोरिया
जापान अपने फुकुशिमा न्यूक्लियर प्लांट में स्टोर लगभग करीब 2 हजार करोड़ लीटर जहरीला पानी समुद्र में छोड़ने की तैयारी कर रहा है। इस पानी का इस्तेमाल जापान अपने न्यूक्लीयर पावर प्लांट में रिएक्टर्स को ठंडा रखने के लिए करता था।
जापान सरकार को इस जहरीला पानी को समंदर में छोड़ने के लिए IAEA की अनुमति मिल गई है। हालांकि जापान के पड़ोसी चीन और दक्षिण कोरिया में इस फैसले का विरोध कर रहे हैं।

जापान में साल 2011 में भीषण सुनामी आई थी। जिसमें फुकुशिमा न्यूक्लियर प्लांट के तीन रिएक्टर बंद हो गए थे। सुनामी ने रिएक्टर्स के कूलिंग सिस्टम को खासा नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद न्यूक्लियर पावर प्लांट में रिएक्टर्स को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाने लगा।
अब तक इस काम के लिए दस लाख टन से ज्यादा पानी का इस्तेमाल हो चुका है। ये पानी फिलहाल न्यूक्लियर पावर प्लांट की साइट पर बने टैंक्स में स्टोर में है। पानी को स्टोर करने की जगह की कमी के कारण जापान ने इसे समुद्र में छोड़ने का फैसला किया गया है।
साल 2019 में जापान के पर्यावरण मंत्री ने घोषणा की थी कि उनके पास इस पानी को समुद्र में छोड़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। पानी जरूरत से ज्यादा इकठ्ठा हो चुका है और भूकंप या फिर सुनामी की स्थिति में ये खतरनाक साबित हो सकता है।
इसके बाद 2021 में कैबिनेट ने एक बिल पास किया था। लेकिन इसके बाद लोगों ने इसे लेकर विरोध शुरू कर दिया। इसके बाद ये मामला संयुक्त राष्ट्र की इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी(IAEA) के पास चला गया।
अब 2 सालों के बाद IAEA ने जापान को कचरा फेंकने की अनुमति दे दी है। हालांकि यह काम एजेंसी के कर्मचारियों की निगरानी में होगा। हालांकि समंदर में कचरा फेंकने को लेकर स्थानीय मछुआरे समुदाय कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि मछलियों में रेडिएशन जाने की वजह से उनका व्यापार चौपट हो जाएगा।
वहीं दक्षिण कोरिया, चीन और प्रशांत द्वीप के राष्ट्रों ने भी सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की है। चीन का कहना है कि जापान के इस फैसले से समुद्री पर्यावरण और दुनिया भर के लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो गया है। दरअसल कचरे के रेडियोधर्मी होने की वजह से समुद्री जीवों के मृत हो जाने का खतरा है।
इस रेडियोएक्टिव कचरे का असर 30-40 साल तक रहने की आशंका है। हालांकि जापान की सरकार का कहना है कि समुद्र में छोड़ा जा रहे पानी को साफ कर फेंका जा रहा है। इसलिए इस पानी से समंदर पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
हालांकि जानकारों के मुताबिक पानी में फिर भी ट्राइटियम के कण मौजूद रहेंगे। ट्राइटियम एक रेडियो एक्टिव मैटिरियल होता है। यह हाइड्रोजन का आइसोटोप है, जिसे पानी से अलग नहीं किया जा सकता है। ऐसा करने के लिए फिलहाल कोई तकनीक उपलब्ध नहीं है। इसके संपर्क में आने पर कैंसर जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
हालांकि पानी छोड़ने वाली कंपनी TEPCO, जापान की सरकार और IAEA का यह तर्क है कि ट्राइटियम प्राकृतिक रूप से पर्यावरण में होता है। बारिश से लेकर समुद्र के पानी से लेकर नल के पानी तक और यहां तक कि मानव शरीर में भी इसकी हल्की मात्रा पाई जाती है।
वे दूषित पानी को अत्यधिक पतला कर समुद्र में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में छोड़ेंगे। आईएईए की रिपोर्ट में, ग्रॉसी ने कहा कि उपचारित पानी को समुद्र में छोड़ने से लोगों और पर्यावरण पर नगण्य रेडियोलॉजिकल प्रभाव पड़ेगा। उनका कहना है कि हर दिन हर कोई थोड़ी मात्रा में ट्राइटियम के संपर्क में आता है। इसलिए इस कदम से डरने की जरूरत नहीं है।












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