65 बच्चों समेत 242 बर्बर मौतों से इजरायल और फिलिस्तीन को क्या हासिल हुआ ?
तेल अवीव, 21 मई: सियासी और मजहबी लड़ाई में इंसान की जिंदगी कीड़े मकोड़े से भी बदतर हो गयी है। खून यूं बह रहा है जैसे पानी हो। इजरायल और फलस्तीन के बीच पिछले 11 दिनों की लड़ाई के बाद आखिर संघर्ष विराम हो गया। इस लड़ाई में अभी तक 230 फलस्तीनी मारे जा चुके हैं। इनमें 65 बच्चे शामिल हैं। इजरायल के भी 12 लोग मारे गये हैं जिनमें भारत की एक नर्स सौम्य संतोष शामिल हैं।

यरुशलम की अलअस्का मस्जिद से शुरू हुआ विवाद अब भयंकर युद्ध में बदल गयी। छोटे-छोटे बच्चे अभी भी खौफ के साये में जी रहे हैं। स्थिति कितनी भयावह है इसका अंदाजा गाजापट्टी के मलबे से निकाली गयी उस बच्ची की हालत को देख कर लगाया जा सकता है। सात साल की सूजी के सामने उसके भाई, बहन और मां बम धमाके में मारे गये। बमों के धमाके और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच खौफ में डूबे लोगों की आंखों से जैसे नींद गायब हो गयी। कुछ पल के लिए आंख झपकती भी है तो सायरन की कर्कश आवाज जगा देती है। कब कोई रॉकेट उनके घर पा आ गिरे, कोई नहीं जानता था।

युद्ध से भयावह स्थिति
इजरायल के लड़ाकू विमानों ने गुरुवार को भी गाजापट्टी पर हमले जारी रखे। अलजजीरा टीवी के मुताबिक इस हमले में एक फलस्तीनी महिला मारी गयी है। बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं। इजरायल के हवाई हमले में गाजा शहर का उत्तरी और दक्षिणी हिस्सा तबाह हो चुका है। 184 घर जमींदोज हो चुके हैं। 33 मीडिया सेंटर भी ध्वस्त हुए हैं। 1335 घरों को बड़ा नुकसान और करीब 13 हजार घरों को आंशिक नुकसान पहुंचा है। अनुमान है कि इजरायल की बमबारी के चलते गाजापट्टी को 322 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। 2014 के बाद इजरायल का गाजापट्टी पर ये अब तक का सबसे बड़ा हमला है। 2014 में लड़ाई 50 दिनों तक चली थी। इस बार 11 दिनों में ही भयंकर तबाही मच गयी है। इस लड़ाई में आपाहिज, गर्भवती महिलाएं और बच्चे भी मारे गये हैं। गाजा शहर में हर तरफ मलबा और मौत का मातम है।

गाजा पट्टी और इजरायल
गाजा पट्टी करीब 10 किलोमीटर चौड़ा और 40 किलोमीटर लंबा एक पतला भूभाग है। पतला आकार होने के कारण ही इसे गाजा पट्टी या गाजा स्ट्रीप कहते हैं। इसके तीन ओर इजरायल है। दक्षिण में मिस्र है। गाजापट्टी में करीब 15 लाख फलस्तीनी (अरब मुस्लिम) रहते हैं। गाजा सबसे बड़ा शहर जहां की आबादी करीब 4 लाख है। 1948 में इजरायल नया देश बना तो फलस्तीनियों को अलग करने के लिए आर्मिस्टाइस रेखा खींच दी गयी और तय हुआ कि फलस्तीनी लोग गाजापट्टी में रहेंगे। फलस्तीनियों ने इस विभाजन को नहीं माना। यरुशलम और अलअस्का मस्जिद पर दावा को लेकर यहूदी और मुस्लिम समुदाय में संघर्ष शुरू हो गया। स्वतंत्र फलस्तीनी देश की स्थापना के लिए फलस्तीनी मुक्ति संगठन का गठन हुआ। इसके नेता यासर आराफात हुआ करते थे। विभाजन के समय करीब लाखों फलस्तीनी भाग कर गाजापट्टी चले गये। कुछ फलस्तीनी (मुस्लिम) इजरायल में रह गये जिन्हें यहूदियों की तुलना में कम अधिकार प्राप्त है। 1967 के युद्ध में इजरायल ने गाजापट्टी पर अधिकार कर लिया था। 2005 में एक समझौते के तहत इजरायल ने गाजा से हट जाने का फैसला किया। 2007 में 'हमास' ने गाजापट्टी पर कब्जा जमा रखा है जिसको एक आतंकवादी संगठन माना जाता है।

इजरायल ने गाजापट्टी पर क्यों किया हमला ?
इजरायल में करीब 75 फीसदी यहूदी, 18 फीसदी अरब मुसलमान, 2 फीसदी ईसाई और शेष अन्य समुदाय के लोग रहते हैं। अलअस्का मस्जिद पूर्वी यरुशलम में है और यह इजरायल के नियंत्रण में है। मस्जिद का कार्य एक ट्रस्ट देखती है। 1967 की लड़ाई में 6 मई को इजरायल ने पूर्वी यरुशलम पर विजय प्राप्त की थी। अलअस्का मस्जिद इसी क्षेत्र में है। अलअस्का मस्जिद को मुसलमान तीसरा सबसे बड़ा धर्मस्थल मानते हैं। यहूदी इस क्षेत्र को टेंपल माउंट कहते जो उनका सबसे पवित्र धार्मिक स्थल है। इसकी वजह से दोनों समुदायों में विवाद रहता है। 6 मई 2021 को जब यरुशलम विजय दिवस निकालने की तैयारी चल रही थी इसी बीच हिंसा भड़क उठी। फलस्तीनी 6 मई काला दिवस की तरह मनाते हैं क्यों उनका इस दिन उनका पवित्र स्थान (अलअस्का मस्जिद) हाथ से निकल गया था। फलस्तीनी प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थरबाजी की तो इजरायली सुरक्षा बलों ने रबर की बुलेट का इस्तेमाल किया। यह घटना अलअस्का मस्जिद परिसर में हुई। इसके बाद फलस्तीनियों और इजरायल में लड़ाई शुरू हो गयी। फलस्तीनी हित की रक्षा के नाम पर हमास ने गाजापट्टी से इजरायल पर रॉकेट दागने शुरू कर दिये। इसके बाद भयंकर युद्ध भड़क गया।

ज्ञान शक्ति में यहूदी बहुत आगे
यहूदी धर्म दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में एक है। यह ईसाईयत और इस्लाम से भी पुराना है। करीब तीन हजार साल पहले यरुशलम में इस धर्म का उद्भव हुआ था। कालांतर में यहूदियों के कबीले कमजोर पड़ते गये। रोमन साम्राज्य के हमले के बाद यहूदी यरुशलम से विस्थापित हो गये और पूरी दुनिया में इधर उधर बस गये। यहूदी बिखर गये लेकिन उनकी बौद्धिक योग्यता का कोई जवाब नहीं था। अपने ज्ञान और कौशल के बल पर वे जिस भी देश में रहे, महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। अधिकांश यहूदी यूरोप और अमेरिका में बसे थे। उनकी ज्ञान शक्ति से कई शासकों को जलन होने लगी। पूरी दुनिया को नयी दिशा देने वाले कार्ल मार्क्स, सिगमंड फ्रायड और अलबर्ट आईंस्टीन यहूदी थे। अमेरिका की वैज्ञानिक और आर्थिक तरक्की में यहूदियों का सबसे बड़ा योगदान है। इसलिए अमेरिका आज भी यहूदियों का कट्टर समर्थक है। कहा जाता है कि अगर हिटलर को यहूदियों से घृणा नहीं होती तो एटम बम पहले अमेरिका के पास नहीं बल्कि जर्मनी के पास होता। महान वैज्ञानिक अलबर्ट आईंस्टीन हिटलर के तानाशाह बनने के पहले जर्मनी में रहते थे। लेकिन जब हिटलर की पुलिस आईंस्टीन के पीछे पड़ गयी तो वे भाग कर अमेरिका आ गये। जब दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ तो आईंस्टीन ने ही सबसे पहले अमेरिका को एटम बनाने का सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि अगर हिटलर को हराना है तो अमेरिका को एटम बम बनाना पड़ेगा। वर्ना यह बम हिटलर बना लेगा और दुनिया को तबाह कर देगा। आईंस्टीन के सुझाव पर ही अमेरिका ने एटम बम पर प्रोजेक्ट शुरू किया था हालांकि वे इसमें शामिल नहीं थे। आज इसी ज्ञान शक्ति के बल पर एक छोटा सा देश इजरायल अरब देशों के बीच मजबूती से जमा हुआ है।












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