S Jaishankar: एक्शन में भारत का द ग्रेट डिप्लोमेट! एस. जयशंकर कैसे बने विदेश नीति के महानायक?
S Jaishankar: मई 2019 में जब भारत की निवर्तमान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पूर्व विदेश सचिव डॉ. एस जयशंकर को फोन किया, तो जयशंकर नई दिल्ली के खान मार्केट में एक प्रसिद्ध किताब की दुकान पर किताबें खरीद रहे थे। सुषमा स्वराज के फोन ने जयशंकर को हैरानी में डाल दिया।
जयशंकर ने 17 मार्च 2024 को प्रकाशित एक इंटरव्यू में कहा, "मुझे इसकी बिल्कुल उम्मीद नहीं थी।"

एस जयशंकर उस वक्त टाटा ग्रुप के ग्लोबल कॉरपोरेट अफेयर्स के प्रेसिडेंट थे और सुषमा स्वराज ने उन्हें ये फोन कॉल यह बताने के लिए किया था, कि उनके हाथों में साउथ ब्लॉक की कमान सौंपी जा रही है। साउथ ब्लॉक में भारतीय विदेश मंत्रालय है। जनवरी 2018 में विदेश विभाग से रिटायर्ड होने वाले जयशंकर को उम्मीद नहीं थी, कि उन्हें सुषणा स्वराज का फोन आएगा और उन्हें विदेश विभाग का मुखिया बनाने का ऑफर दिया जाएगा।
पूर्व विदेश सचिव एस. जयशंकर (2015-2018) के लिए यह एक तरह से घर वापसी थी। 31 मई 2019 को जयशंकर को सभी 57 मंत्रियों के बैठने के लिए बनाए गए स्पेशल मंच पर बैठाया गया। साउथ ब्लॉक के 'चीन विशेषज्ञ' भारत के विदेश मंत्री बनने जा रहे थे।
और इसके पांच सालों के बाद 9 जून 2024 को, जब नरेन्द्र मोदी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, उनके साथ शपथ लेने वाले जयशंकर भी थे, जिन्हें लगातार दूसरी बार केन्द्रीय मंत्री बनाया गया है। हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा गया है, कि वो विदेश मंत्री होंगे, लेकिन जिम्मेदारी पहले दे दी गई है। आज BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में जयशंकर भारत का नेतृत्व कर रहे हैं।
कैसे रहा जयशंकर का पहला कार्यकाल?
एस जयशंकर एक मंझे हुए डिप्लोमेट रहे हैं और पिछले पांच सालों में जियो-पॉलिटिक्स में जितनी चुनौतियां आई हैं, और जिस तरह से भारत उनमें शामिल रहा, शायद उतनी चुनौतियों से एस. जयशंकर ही जूझ सकते थे।
विदेश मंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के पांच वर्षों में, राजनयिक से राजनेता बने एस. जयशंकर, मोदी सरकार की सबसे मुखर आवाज के रूप में उभरे, जिसने तीव्र ध्रुवीकृत दुनिया में भारत के जियो-पॉलिटिकल उदय को चिह्नित किया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़े, एस जयशंकर का यह तीखा जवाब, कि "भारत एक महीने में रूस से उतना तेल आयात करता है, जितना यूरोप एक दोपहर में करता है", उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के दौरान दुनिया में नई दिल्ली की स्वतंत्र विदेश नीति को आक्रामक तरीके से सामने रखा।

जयशंकर की फोन पर काम करने की क्षमता, एक ऐसा कौशल जो उन्होंने राजनयिक के रूप में अपने दशकों के करियर में निखारा है - उसने नई दिल्ली और उसके बाहर सत्ता के गलियारों में भारी प्रशंसा दिलाई है।
यूक्रेन युद्ध में चाहे रूस की आलोचना नहीं करना हो, या फिर अमेरिकी प्रेशर को पूरी तरह से खारिज करते हुए रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना हो.. जयशंकर ने हर पश्चिमी दबाव का आक्रामक अंदाज में मुकाबला किया।
लेकिन, जब अमेरिका ने एक भारतीय अधिकारी पर खालिस्तानी आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू को मारने की साजिश रचने का आरोप लगाया, तो ये इल्जाम सीधे तौर पर भारत पर था और भारत के लिए अमेरिका से डील करना किसी परीक्षा से कम नहीं था। वहीं, जब पन्नून को ही मुद्दा बनाकर अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 26 जनवरी गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि बनने से इनकार कर दिया, तो ये भारत की प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया, क्योंकि सवाल ये था, कि इतने कम समय में आखिर कैसे किसी और को विदेश मेहमान बनाया जाए। लेकिन, इस दौरान अपनी मजबूत विदेश नीति का परिचय देते हुए एस. जयशंकर ने फ्रांस से संपर्क किया और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएलन मैक्रों मुख्य अतिथि बनने के लिए तैयार हो गये।
WION की एक रिपोर्ट में पूर्व राजदूत राजीव भाटिया एस. जयशंकर की विदेश नीति को लेकर कहते हैं, कि "2019 के बाद से पांच साल संकटों और संघर्षों की लंबी अवधि का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे भारत की विदेश नीति का प्रबंधन करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है।"
उन्होंने कहा, कि "लेकिन, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शानदार प्रदर्शन किया, भारत के हितों को आगे बढ़ाया और भारत की कूटनीति की छवि को आगे बढ़ाया। लेकिन, मोदी सरकार 3.0 में एक बार फिर से उनकी क्षमता और राजनीतिक कौशल का परीक्षण होना निश्चित है।"
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