Defence Budget: कहां से खरीदेंगे हथियार? पेंशन में भारी खर्च, मनमोहन के मुकाबले कमजोर है मोदी का रक्षा बजट
Defence Budget 2024: पिछले हफ्ते भारतीय वायु सेना (IAF) के उप प्रमुख एयर मार्शल एपी सिंह ने कहा था, कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर 'आत्मनिर्भरता' हासिल नहीं की जा सकती। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था, कि भू-राजनीति ने आत्मनिर्भर होने का सबक दिया है और इसे अक्षरशः और भावना के साथ समग्र रूप से अपनाया जाना चाहिए।
और आज बजट होने से पहले डिफेंस सेक्टर को उम्मीद थी, कि निर्मला सीतारमण के खजाने से डिफेंस के लिए स्पेशल पैकेज का ऐलान होगा, क्योंकि चीन और पाकिस्तान ने हथियार निर्माण में जितने खर्च किए हैं, उसने डिफेंस एक्सपर्ट्स को चिंता में डाल दिया है।

और उप प्रमुख एयर मार्शल एपी सिंह ने इशारों में यही बात कहने की कोशिश की थी, क्योंकि इंडियन एयरफोर्स के पास लड़ाकू विमानों की कमी हो गई है, जबकि दूसरी तरफ पाकिस्तान ने चीन से पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान खरीदने की घोषणा कर दी है।
भारतीय नौसेना लगातार तीसरे एयरक्राफ्ट की मांग कर रही है, लेकिन आज के बजट को देखने के बाद लगता नहीं, कि भारत सरकार इंडियन नेवी की मांग से सहमत है।

आइये डिफेंस बजट को तोड़-मरोड़कर देखने और जानने की कोशिश करते हैं, कि क्या भारतीय सेना की जरूरतों की पूर्ति इस बजट से हो पाएगी?
डिफेंस सेक्टर के लिए कितना बजट?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2025 के लिए डिफेंस सेक्टर के लिए 6,21,940 करोड़ रुपये की घोषणा की है। यह आवंटन पांच महीने पहले पेश किए गये अंतरिम बजट में घोषित 6.21 लाख करोड़ रुपये से सिर्फ 400 करोड़ रुपये ज्यादा है।
भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने निर्मला सीतारमण के इस बजट पर खुशी जताई है। इस बार का डिफेंस बजट, देश की कुल बजट का 12.9 प्रतिशत है, जबकि पिछले साल कुल बजट का 13 प्रतिशत डिफेंस सेक्टर को दिया गया था।
लेकिन हैरानी ये है, कि तीनों सेनाओं की बार बार मांग के बाद भी सरकार ने नये हथियारों की खरीददारी में कंजूसी कर दी है।
साधारण शब्दों में समझें, तो
- सैलरी बांटने के लिए कुल सैन्य बजट का 45 प्रतिशत हिस्सा खर्च कर दिया जाएगा। इस सैलरी में तीनों सेनाओं के मौजूदा सभी सैनिक, उनके लिए अलग अलग वेलफेयर स्कीम, उनके लिए मेडिकल खर्च शामिल है। इसे रेवेन्यू बजट कहा जाता है और इस साल का रेवेन्यू बजट 2.82 लाख करोड़ है। साल 2023 में रेवेन्यू बजट 2.7 लाख करोड़ था, जबकि कुल खर्च 2.98 लाख करोड़ हुआ था।
- मोदी सरकार ने इस बार कैपिटल खर्च में कुल डिफेंस बजट का 27.6 प्रतिशत आवंटित किए हैं। कैपिटल बजट, डिफेंस बजट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, क्योंकि कैपिटल बजट से ही सेना का आधुनिकिकरण होता है, नये हथियार खरीदे जाते हैं और सेना को मजबूत करने पर खर्च किया जाता है।
इस साल कैपिटल बजट के लिए 1.72 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गये हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 5.7 प्रतिशत ज्यादा है।
- पेंशन बांटने में भी भारत सरकार को भारी भरकम खर्च करना पड़ता है, जिसमें तीनों सेनाओं के रिटायर्ड सैनिकों को पेंशन और अलग अलग तरह की सुविधाएं शामिल होती हैं। इस साल निर्मला सीतारमण ने पेंशन के लिए 1.41 लाख करोड़ रुपये जारी किए हैं और पिछले साल के मुकाबले इस साल रिटायर्ड सैनिकों को पेंशन बांटने के लिए 3 हजार करोड़ रुपये ज्यादा दिए हैं।
- इसके अलावा, डिफेंस बजट में सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) को सड़क बनाने के लिए 6500 करोड़, कोस्ट गार्ड को, सेना की कैंटीन को, हाउसिंग को 2951 हजार करोड़ रुपये जारी किए हैं।
- डिफेंस सेक्टर में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए, बजट में iDEX योजना के लिए 518 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो स्टार्टअप, एमएसएमई और इनोवेटर्स से तकनीकी समाधानों का समर्थन करता है।
डिफेंस बजट का ब्रेकडाउन
कुल रक्षा आवंटन का लगभग 28% यानि 1.72 लाख करोड़ रुपये हथियारों की खरीद के लिए दिए गये हैं। सशस्त्र बलों का राजस्व व्यय (वेतन को छोड़कर) 92,088 करोड़ रुपये और रक्षा पेंशन 1.41 लाख करोड़ रुपये का बजट है। इसके अलावा, भारतीय तटरक्षक बल (कोस्ट गार्ड) के लिए 7,651.80 करोड़ रुपये और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के लिए 23,855 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
इसके अलावा, भारत का सालाना डिफेंस प्रोडक्शन 2023-24 के लिए करीब 1.27 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर छू गया है, जो पिछले वर्ष के 1.09 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। इसे भारत की एक बड़ी उपलब्धि कहा जाएगा।
इसके अलावा, पिछले तीन सालों में भारत ने स्वदेशीकरण अभियान के तहत 12 हजार 300 से ज्यादा वस्तुओं का घरेलू उत्पादन किया है, जो भारत की घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने के प्रयासों को दर्शाता है।
लेकिन सवाल ये है, कि नये हथियारों की खरीद के लिए जो बजट जारी किए गये हैं, क्यों वो पर्याप्त है?

इंडियन एयरफोर्स को कहां से मिलेंगे और विमान?
भारतीय वायुसेना को चीन और पाकिस्तान के दोहरे खतरे से निपटने के लिए भारतीय वायुसेना के पास 42 फाइटर जेट स्क्वाड्रन निश्चित तौर पर होने चाहिए, लेकिन इस वक्त हमारे पास सिर्फ 31 फाइटर जेट स्क्वाड्रन ही रह गए हैं। और चीन की आक्रामकता को देखते हुए ये अच्छी स्थिति नहीं है, क्योंकि भारत को हमेशा दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ने की क्षमता बनाए रखने की सलाह दी जाती रही है।
स्थिति ये है, कि भारतीय वायुसेना के पास अब लड़ाकू विमानों की तुलना में, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल इकाइयां ज्यादा हैं। यानि, भारतीय वायुसेना के बेड़े में लड़ाकू विमानों की संख्या काफी कम हो गई है।
भारत की पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान वाला प्रोजेक्ट, जिसे AMCA (एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) कहा जाता है, उसकी फाइल कई सालों से सरकारी ऑफिस में धूल खा रही थीं और इस साल मार्च में आखिरकार सरकार ने डिजाइन को हरी झंडी दी थी।
लेकिन, भारत सरकार ने AMCA के लिए 15000 करोड़ आवंटित किए (मार्च में), जो इस प्रोजेक्ट के लिहाज से ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।
स्थिति ये है, कि अगर आज की तारीख में सारे के सारे पैसे आवंटित कर भी दिए जाएं, तो भारत को स्वदेशी पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने में कम से कम 10 साल और लगेंगे, जबकि चीन 2 तरह के पांचवी पीढ़ी विमानों को ऑपरेट करता है और पाकिस्तान ने चीन से पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान खरीदने की घोषणा कर दी है।
इसके अवाला, इंडियन एयरफोर्स ने 114 मीडियम रोल फाइटर एयरक्राफ्ट (MRFA) खरीदने के लिए लंबे समय से भारत सरकार को अर्जी दे रखी है और भारत सरकार की कोशिश, कोई ऐसा कॉन्ट्रैक्ट हासिल करना है, जो इन लड़ाकू विमानों का निर्माण भारत में करे, लेकिन ऐसा करने के लिए अभी तक कोई तैयार नहीं हुआ है। जिससे एयरफोर्स की क्षमता पर गंभीर असर पड़े हैं।
वहीं, भारतीय वायुसेना लंबे अर्से से हल्के लड़ाकू विमान (LCA) का इंतजार कर रही है, लेकिन हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) बार बार अपने डेडलाइन को मिस कर रहा है। अब मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि HAL ने भारतीय वायु सेना (Indian Air Force) को LCA Tejas MK-1A की आपूर्ति करने की तारीख जुलाई के अंत तक तय की है। लेकिन ऐसा कहा जा रहा है, कि ये डेडलाइन भी संभव नहीं है।
HAL को पहले फाइटर जेट्स की आपूर्ति फरवरी 2024 तक करनी थी, लेकिन HAL ऐसा कर नहीं पाया और उसने डिलीवरी की नई तारीख मार्च 2024 तय की, लेकिन HAL मार्च में भी फाइटर जेट्स की डिलीवरी करने में नाकाम हो गया।
फाइटर जेट प्रोजेक्ट्स में देरी की वजह से भारतीय वायुसेना को बड़ा झटका लगा है, जो अपने बेड़े में बचे हुए MIG-21 बाइसन लड़ाकू विमानों की जगह लेने के लिए इन नए विमानों का बेसब्री से इंतजार कर रही है।
इस वक्त भारतीय वायुसेना के पास MIG-21 के दो स्क्वाड्रन हैं, जो नंबर-2 स्क्वाड्रन 'कोबरा' और नंबर 23 स्क्वाड्रन 'पैंथर्स' है। इनमें से एक स्क्वाड्रन को इस साल और दूसरे को अगले साल चरणबद्ध तरीके से वायुसेना के बेड़े से हटा दिया जाएगा और उनकी जगह पर LCA-Mk1A विमानों को शामिल किया जाएगा।
भारतीय वायुसेना के लिए अपने लड़ाकू स्क्वाड्रन की ताकत को बनाए रखने के लिए LCA का बेड़े में समय पर शामिल होना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, ताकि इसे 30 स्क्वाड्रन से नीचे गिरने से रोका जा सके।

ये तो सिर्फ भारतीय वायुसेना की दिक्कते हैं, इंडियन नेवी और इंडियन आर्मी की दिक्कतें अलग अलग हैं।
भारतीय नौसेना के जिम्मे हिंद महासागर में चीन की आक्रामकता को रोकना है और चीन के पास अब तीन एयरक्राफ्ट कैरियर हैं और 3 एयरक्राफ्ट कैरियर का वो और निर्माण कर रहा है। भारतीय नौसेना की भी मांग है, कि भारत सरकार तीसरे एयरक्राफ्ट के निर्माण के लिए सहमति दे, लेकिन भारत सरकार से अभी तक इजाजत नहीं मिली है। अगर इजाजत मिलती भी है, तो उसे बनाने में कम से कम 7 से 8 सालों का वक्त लगेगा, लेकिन तब तक चीन के पास 6 एयरक्राफ्ट कैरियर होंगे, जिससे भारतीय नौसेना को मुकाबला करना होगा। लेकिन, कैसे? ये एक बड़ा सवाल है।
मनमोहन के मुकाबले मोदी सरकार ने सुरक्षा पर कम खर्च
मनमोहन सिंह ने 2004 में सत्ता को संभाला था और उस वक्त उन्होंने डिफेंस सेक्टर के लिए 77 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए थे, और जब 2013 में उनकी सरकार ने आखिरी बार देश का बजट पेश किया था, उस वक्त डिफेंस बजट 2.03 लाख करोड़ का था। यानि मनमोहन सरकार के दौरान 10 सालों में डिफेंस सेक्टर का एवरेज ग्रोथ 16.3 प्रतिशत था।
लेकिन, अगर मोदी सरकार के कार्यकाल की बात करें, तो 2014 में जब नरेन्द्र मोदी की सरकार के दौरान भारत का बजट पेश किया गया, तो जिफेंस सेक्टर को 2.18 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गये थे और अपने आखिरी बजट के दौरान मोदी सरकार ने साल 2023 में 5.93 लाख करोड़ का डिफेंस बजट पेश किया था। यानि, एवरेज ग्रोथ 17.2 प्रतिशत था, जो यूपीए सरकार के ग्रोथ रेट के मुकाबले 0.9 प्रतिशत ज्यादा है।
लेकिन, अगर यूपीए और एनडीए सरकार के आखिरी पांच पांच सालों के डिफेंस बजट की तुलना करते हैं, तो पता चलता है, कि देश की सुरक्षा पर मनमोहन सरकार के समय ज्यादा खर्च किए गये थे।
मनमोहन सिंह की सरकार के समय 2010 से 2014 के बीच हथियारों की खरीददारी और मॉडर्नाइजेश के लिए 34.4 प्रतिशत बजट आवंटित किए थे, जबकि मोदी सरकार के दौरान 2018 से 2023 के बीच हथियारों की खरीददारी और मॉडर्नाइजेश के लिए औसतन 24 प्रतिशत बजट आवंटित किए गये थे।
डिफेंस सेक्टर में आगे का अनुमान क्या है?
ऐसा अनुमान है, भारतीय सशस्त्र बल अगले पांच से छह सालों में हथियारों की खरीददारी पर 130 अरब डॉलर खर्च कर सकती है। इसके अलावा, सरकार का लक्ष्य घरेलू रक्षा विनिर्माण (घरेलू उत्पादन) को बढ़ावा देकर आयातित सैन्य उपकरणों पर निर्भरता कम करना है। रक्षा मंत्रालय ने अगले पांच वर्षों के भीतर रक्षा विनिर्माण कारोबार में 25 अरब डॉलर या 1.75 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में 2028-29 तक सैन्य हार्डवेयर निर्यात को मौजूदा 21,083 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 50,000 करोड़ रुपये करने की योजना की घोषणा की।
लेकिन, सवाल ये है, कि क्या वाकई ऐसा होगा? अगर ऐसा होता है, तो डिफेंस सेक्टर के लिए ये एक रिकॉर्ड की बात होगी और सबसे जरूरी ये है, कि भारत को अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत है और चाहे भारतीय वायुसेना की नये लड़ाकू विमानों की मांग हो या भारतीय नौसेना की एयरक्राफ्ट कैरियर की, इन मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।












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