Explained: 10 अरब के बाद 15 अरब डॉलर का निवेश, भारत में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री का चक्का चलता क्यों नहीं है?

Semiconductor Manufacturing: सेमीकंडक्टर सेक्टर में मौजूदा समय में भारत का योगदान करीब करीब शून्य है और फिलहाल वैश्विक चिप उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा ताइवान और अमेरिका में किया जाता है, जहां से भारत के साथ साथ दुनिया के ज्यादातर देश खरीदते हैं।

मोदी सरकार ने चिप मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को दूसरा धक्का दिया है, जिसका मकसद, प्रोत्साहन नीति के दूसरे चरण के जरिए वित्तपोषण को शुरुआती 10 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 15 बिलियन डॉलर करके इस क्षेत्र को बढ़ावा देना है।

Semiconductor Manufacturing

टाटा, ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉरपोरेशन (PSMC) के साथ मिलकर 91,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत से भारत का पहला वाणिज्यिक फैब्रिकेशन प्लांट बना रहा है। इसके अलावा, सरकार ने तीन असेंबली और टेस्टिंग प्लांट को भी मंजूरी दी है। ये प्लांट फैब्रिकेशन प्लांट की तुलना में कम जटिल हैं और इनमें अमेरिका स्थित माइक्रोन टेक्नोलॉजी, असम में टाटा और जापान की रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ सीजी पावर एंड इंडस्ट्रियल सॉल्यूशंस की परियोजनाएं शामिल हैं।

सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए मजबूत कोशिशें

इन चार परियोजनाओं की कुल लागत 1.48 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है, जिसमें केंद्र सरकार पूंजीगत व्यय सब्सिडी में लगभग 59,000 करोड़ रुपये का योगदान दे रही है। राज्य सरकारें भी इन संयंत्रों को आकर्षित करने के लिए सस्ती जमीन और बिजली जैसे प्रोत्साहन दे रही हैं।

लेकिन इन कोशिशों के बावजूद, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में भारत की वर्तमान स्थिति न्यूनतम बनी हुई है। ज्यादातर चिप्स ताइवान और अमेरिका जैसे देशों में बनाए जाते हैं। अमेरिका में लगभग 50 बिलियन डॉलर की एक बड़ी चिप प्रोत्साहन योजना है, जबकि यूरोपीय संघ में भी ऐसी ही पहल है।

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घर में सेमीकंडक्टर क्यों बनाना चाहता है भारत?

भारत के आर्थिक और रणनीतिक मकसदों के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स की स्थापना काफी ज्यादा महत्वपूर्ण है। एयरोस्पेस से लेकर ऑटोमोटिव और घरेलू उपकरणों तक, विभिन्न उद्योगों में चिप्स आवश्यक हैं। अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख तकनीकी खिलाड़ियों के बीच भू-राजनीतिक तनाव के मद्देनजर, भारत अपने स्थानीय उद्योग को मजबूत करने के लिए सरकारी वित्त पोषित योजनाओं का लाभ उठाना चाहता है।

लेकिन इन ख्वाहिशों को पूरा करना काफी मुश्किल साबित हो रहा है। तकनीकी सीमाओं की वजह से टाटा-पीएसएमसी फैब एडवांस नोड्स का उत्पादन नहीं करेगा।

चिप निर्माण में कई सारी दिक्कतें मौजूद हैं, जैसा कि सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इंटरनेशनल कॉरपोरेशन (SMIC) में चीन के महत्वपूर्ण निवेश से देखा जा सकता है। चीन ने अपनी कंपनियों को सेमीकंडक्टर रेस में बनाए रखने के लिए बेतहाशा पैसे दिए हैं, लेकिन उसे भी टेक्नोलॉजी को लेकर दिक्कतें आ रही हैं। अमेरिका ने चीन को टेक्नोलॉजी देने पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे चीन के लिए एडवांस स्टेज में पहुंचना मुश्किल हो रहा है।

छोटे नोड आकार के चिप्स के निर्माण के लिए बहुत ज्यादा तकनीकी इनोवेशन की जरूरत होती है, जो एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड (TSMC) जैसी कंपनियों को बहुत ज्यादा लाभ है।

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भारत के साथ सबसे बड़ी दिक्कत टेक्नोलॉजी की है।

सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता में प्रमुख परियोजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता देना शामिल है। इस पहल का मकसद विदेशों में बनी चिप्स पर अपनी निर्भरता को कम करने के अलावा, ग्लोबल टेक्नोलॉजी प्राइस चेन में भारत की स्थिति को बढ़ाना है।

लेकिन भारत को TSMC जैसी स्थापित कंपनियों के साथ तालमेल बिठाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ये प्रयास घरेलू स्तर पर एक मजबूत सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। इन पहलों की सफलता लगातार निवेश और टेक्नोलॉजी के डेवलपमेंट पर निर्भर करेगी।

सेमीकंडक्टर सेक्टर में काफी तेजी से टेक्नोलॉजी एडवांस होती चली जाती है और उस रेस में खुद को बनाए रखना भारत के लिए बड़ी चुनौती साबित होती है।

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