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यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों का नस्लभेद का शिकार होने का भी आरोप

मोहम्मद महताब रज़ा
BBC
मोहम्मद महताब रज़ा

पूर्वी यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों के लिए हालात मुश्किल होते जा रहे हैं. एटीएम से कैश नहीं निकल पा रहा है और स्थानीय ग्रोसरी स्टोर तक में उन्हें नस्लभेद का सामना करना पड़ रहा है.

पूर्वी शहर सूमी में रह रहे भारतीय छात्रों का कहना है कि उन्होंने दिन के समय छतों पर निशानेबाज़ तैनात देखे हैं और रात भर भारी बमबारी होती रहती है.

छात्रों का कहना है कि उनके बंकरों के ऊपर से टैंकों के गुज़रने की आवाज़ आती है.

सूमी स्टेट मेडिकल यूनिवर्सिटी में चौथे वर्ष के छात्र मोहम्मद महताब रज़ा ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास अब पैसे ख़त्म हो रहे हैं. एटीएम में भी कैश नहीं है. अगर हमें यहां से निकलने का मौका मिल पाया तो यहां से दूर पश्चिमी यूक्रेन की तरफ़ जाना होगा. हम पैसों के बिना कहीं कैसे पहुंच सकते हैं?"

महताब जब एक एटीएम गए तो वहां एक महिला ने उन्हें बाहर लगा नोटिस दिखाते हुए समझाया कि यहां अब सिर्फ़ पैसे जमा किए जा सकते हैं, कैश निकाला नहीं जा सकता है.

बिहार के रहने वाले महताब ने बीबीसी से कहा, "अगर ऐसे ही हालात रहे तो हम यहां से 1500 किलोमीटर दूर यूक्रेन के पश्चिमी हिस्से में कैसे जाएंगे?"

बंकर के भीतर से वीडियो के ज़रिए बीबीसी से बात करते हुए महताब और उनके दोस्तों ने कई तरह कि चिंताएं ज़ाहिर कीं. हालात की वजह से अब उनका धैर्य जवाब दे रहा है.

मोहम्मद महताब रज़ा
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मोहम्मद महताब रज़ा

नस्लभेद के शिकार हो रहे छात्र

पंजाब की रहने वाली जसलीन कौर ने बताया, "हमने देखा है कि ट्रेनों में चढ़ने के दौरान भारतीयों के साथ नस्लभेद हो रहा है. यहां स्थानीय लोगों को हमसे अधिक खाद्य सामाग्री ले जाने दी जा रही है. हो सकता है कि जल्द ही हमारे पास खाने के लिए कुछ भी ना हो. इसलिए हमें यहां से निकालने के लिए जल्दी से जल्दी कुछ किया जाना चाहिए."

वीडियो पर बात करते हुए जिया बलूनी ने कहा, "कीएव जाने के लिए पांच से छह घंटे लगते हैं. सबसे पास रूस का बॉर्डर लगता है. जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तब हम सो रहे थे. हमारे माता-पिता का फ़ोन आया तो पता चला.

इंडिया में पहले पता चल गया था कि अटैक हुआ है. बहुत पैनिक हुआ. हमें बोला गया कि सामान ख़रीद कर ले आओ नहीं तो सुपरमार्केट बंद हो जाएंगे. वहां लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई थीं.

जब सायरन बजता है तो हमें बंकर में जाना पड़ता है. जब सेफ़ लगता है तो हम वापस कमरों में आ जाते हैं. दो दिन से काफ़ी हमले हो रहे हैं. काफ़ी बच्चों ने आर्मी को लड़ते हुए देखा है. कई जगहें जल चुकी हैं. दो दिन से तो हमने भी बम की आवाज़ें सुनी हैं. रात को एक दो बजे जब सेफ़ लगता है तब हम कमरे में आते हैं."

जिया बलूनी उत्तराखंड में ऋषिकेश की रहने वाली हैं. 2018 में जिया ने सूमी स्टेट यूनिवर्सिटी में मेडिकल की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया था. अभी फ़ोर्थ ईयर की स्टूडेंट हैं.

जिया बलूनी, सूमी यूनिवर्सिटी की छात्रा
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जिया बलूनी, सूमी यूनिवर्सिटी की छात्रा

सायरन की आवाज़ से ख़ौफ़

जिया जिस बंकर में हैं वहां भारत के 500 अन्य छात्र भी रह रहे हैं. उनका कहना है कि जब भी सायरन की आवाज़ सुनाई देती है यहां ख़ौफ़ फैल जाता है.

वो बताती हैं, "माता पिता डरे हुए हैं. रात भर नहीं सो पाते वो. बार-बार फोन करते रहते हैं. हमारा रेलवे स्टेशन नहीं चल रहा है कि हम वेस्टर्न बॉर्डर तक जा पाएं. वहां पहुंचने के लिए रेल से जाने पर क़रीब बीस घंटे लगेंगे. बीच में कुछ हमले हों तो और घंटे लग सकते हैं. हमारे लिंकिंग रोड भी तोड़ दिए गए हैं."

जिया बताती हैं, "सीसीटीवी कैमरों में हमने रूस के टैंक देखे थे. दस टैंक थे जो हमारी सिटी के अंदर आ रहे थे."

वहीं छत्तीसगढ़ के रहने वाले अहमद शेख रज़ा ने बताया कि हर 45 मिनट में सायरन बजने लगता है. वो कहते हैं, "हमें बंकर के भीतर भागना होता है. हम रात भर बंकर में रहते हैं और दिन भर सायरन की आवाज़ के ख़ौफ में रहते हैं."

अहमद बताते हैं कि अब उन्हें बाहर ज़रूरी सामान ख़रीदने जाते हुए भी डर लग रहा है क्योंकि उन्होंने देखा है कि इमारतों पर निशानेबाज़ तैनात कर दिए गए हैं.

सोनम सिंह की चिंता कुछ अलग है. उनका मेडिकल कोर्स तीन महीने में समाप्त हो रहा है. उनकी चिंता है कि वो अपनी पढ़ाई पूरी करके डिग्री हासिल कर पाएंगी या नहीं.

भारतीय छात्रों ने सरकार से अपील करते हुए कहा है कि रूस के लिए भी सुरक्षित रास्ता निकालने की कोशिश की जाए क्योंकि यहां से रूस सिर्फ़ 40-45 किलोमीटर दूर ही है.

(बीबीसी संवाददाता अभिनव गोयल के इनपुट पर भी आधारित)

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