दादा थे गिरमिटिया मजदूर, पोता बना दक्षिण अफ्रीका का सबसे बड़ा जज, जानिए कौन हैं नरेन्द्रन कोलापेन
गिरमिटिया मजदूर बनाकर दादा को अंग्रेज ले गये दक्षिण अफ्रीका, अब पोता बना देश का सबसे बड़ा न्यायमूर्ति।
जोहानिसबर्ग, दिसंबर 25: भारतीय मूल के नरेंद्रन 'जोडी' कोलापेन को दक्षिण अफ्रीका की सर्वोच्च न्यायिक पीठ, संवैधानिक न्यायालय में न्यायमूर्ति नियुक्त किया गया है। राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने शुक्रवार को सार्वजनिक साक्षात्कार की लंबी प्रक्रिया के बाद संवैधानिक कोर्ट में 64 वर्षीय कोलापेन और राममाका स्टीवन मथोपो की नियुक्ति की घोषणा की है।
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राष्ट्रपति ने की नियुक्ति
कोलापेन और मथोपो उन पांच उम्मीदवारों में शामिल हैं जिनकी इस साल अक्टूबर में दो रिक्तियों पर नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति के सामने सिफारिश की गई थी। दोनों 1 जनवरी, 2022 से पदभार ग्रहण करेंगे। संवैधानिक न्यायालय में नियुक्ति के लिए कोलापेन का दो बार साक्षात्कार हुआ था, लेकिन पिछली बार एक ही संस्थान के कार्यवाहक न्यायाधीश के रूप में दो कार्यकाल पूरा करने के बावजूद वो असफल रहे थे। वहीं इस बार दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति ने कहा कि, कोलापेन और मथोपो का कानूनी पेशे और न्यायपालिका में शानदार करियर रहा है।

कौन हैं नरेन्द्रन कोलापेन?
नरेन्द्रन कोलापेन, जो अब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अपने पद से हट गये हैं, उन्होंने 1982 में कानूनी अभ्यास शुरू किया और उन्होंने अपने करियर के शुरूआती दिनों से ही जनहित से जुड़े कामों को बड़े पैमाने पर किया। साल 1993 में वो मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले वकीलों में शामिल हुए और 1995 में इसके राष्ट्रीय निदेशक बने और 1996 के अंत तक उस पद पर रहे। 1997 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीकी मानवाधिकार आयोग के आयुक्त के रूप में पदभार ग्रहण किया था और 2002 से 2009 तक सात सालों के लिए आयोग के अध्यक्ष के रूप में काम किया। उन्हें अप्रैल में दक्षिण अफ्रीकी कानून सुधार आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था।

बड़े विद्वान माने जाते हैं कोलापेन
कोलापेन कई गैर सरकारी संगठनों और समुदाय-आधारित संगठनों की संरचनाओं में काम कर चुके हैं, जिसमें कानूनी संसाधन केंद्र, फाउंडेशन फॉर ह्यूमन राइट्स और वृद्धों के लिए लॉडियम केयर सर्विसेज शामिल हैं। उन्हें संयुक्त राष्ट्र और हार्वर्ड विश्वविद्यालय सहित दुनिया भर में मानवाधिकारों के मुद्दों पर बोलने के लिए भी आमंत्रित किया गया है। उन्हें डरबन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया है और कानून और मानवाधिकारों के क्षेत्र में समाज में उनके योगदान के लिए फिरोजा हार्मनी इंस्टीट्यूट का पुरस्कार दिया गया और कांग्रेस ऑफ बिजनेस एंड इकोनॉमिक्स द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया। इस अवार्ड की शुरूआत तब की गई थी, जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों के लिए संघर्ष कर रहे थे।

अंग्रेजों के जमाने में अफ्रीका गया था परिवार
एक कार्यक्रम में कोलापेन ने कहा था कि, करीब 150 साल पहले पहले अंग्रेजों ने गिरमिटिया मजदूरों की तरह उनके परिवार को दक्षिण अफ्रीका लाया था और फिर उनका परिवार भी हजारों दूसरे भारतीयों की तरफ दक्षिण अफ्रीका में ही रच-बस गया। उन्होंने कार्यक्रम में कहा था कि, दक्षिण अफ्रीका में लाई गई विशिष्ट भारतीय पहचान, संस्कृति और धर्म से शर्माने की जरूरत नहीं है, लेकिन भारतीय मूल के दक्षिण अफ्रीकी नागरिकों के रूप में इंद्रधनुष राष्ट्र के निर्माण में मदद करने के लिए इसका इस्तेमाल करना चाहिए। दक्षिण अफ्रीकी लोगों के लिए संघर्ष करने के लिए साल 1956 में कोलापेन की मां को दो बार जेल में डाल दिया गया था और उस वक्त कोलापेन अपनी मां के पेट में थे।












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