Diplomacy: तालिबान से दोस्ती क्यों कर रही है दिल्ली? भारत और पाकिस्तान के एक्सपर्ट्स क्या कह रहे हैं?
India-Taliban Relation: 15 अगस्त 2021 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान को अपने कंट्रोल में लिया, उस दिन पाकिस्तान में मिठाइयां बंट रही थीं और भारत में टेंशन था, कि अब अफगानिस्तान के जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंकवाद के लिए किया जाएगा। लेकिन, आज की तारीख में हालात पूरी तरह से बदल गये हैं।
इस बुधवार दुबई में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री और तालिबान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के बीच हुई बैठक ने अफगान नेतृत्व के साथ अपने प्रभाव को बढ़ाने के भारत के इरादे को जता दिए हैं। भारत पिछले एक साल से धीरे-धीरे तालिबान के साथ संबंधों को बढ़ा रहा है, लेकिन यह ताजा बैठक, अपनी तरह की पहली उच्च-स्तरीय बातचीत थी।

तालिबान के साथ भारत ने की दोस्ती? (India-Taliban Relation)
भारत ने पिछले 20 वर्षों में अफगानिस्तान में सहायता और पुनर्निर्माण कार्यों में 3 बिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है और भारतीय विदेश मंत्रालय के एक बयान में बताया गया है, कि दुबई में हुई इस बैटक में किन मुद्दों पर बातचीत हुई है। भारत के मुताबिक, क्षेत्रीय विकास, व्यापार और मानवीय सहयोग के साथ-साथ विकास परियोजनाओं को फिर से शुरू करने और अफगानिस्तान में स्वास्थ्य क्षेत्र और शरणार्थियों का समर्थन करने के लिए एक समझौता किया गया है।
यानि, भारत एक बार फिर से अफगानिस्तान में विकास कार्यों को आगे लेकर जाएगा, जिसकी मांग तालिबान प्रशासन काफी वक्त से कर रहा था।
हालांकि, भारत की तरफ से इस बैठक को लेकर जो नहीं गया गया और जो इस बैठक के समय और एजेंडे से से स्पष्ट था, वो ये, कि इसने क्षेत्र की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं में बदलाव का संकेत दे दिया है।
तालिबान के विदेश मंत्री के साथ भारत की बातचीत उस वक्त हुई है, जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हवाई हमले किए हैं, जिसकी भारत ने निंदा की है, जिसमें कम से कम 46 लोग मारे गए थे।
पिछले साल नवंबर में तालिबान ने मुंबई स्थिति अफगानिस्तान वाणिज्य दूतावास में अपने कार्यवाहक वाणिज्यदूत की नियुक्ति की थी और इसे भी दोनों देशों के बीच संबंधों के सामान्यीकरण के चश्में से देखा जाना चाहिए।
हालांकि, भारत सरकार ने नियुक्ति पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह समय, उसी महीने भारत के विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव की काबुल यात्रा से मेल खाता है।
भारत में पढ़े अफगानिस्तान के पूर्व छात्र इकरामुद्दीन कामिल को तालिबान ने मुंबई वाणिज्य दूतावास में तैनात किया है, जो बताता है, कि तालिबान भी भारत के साथ कितनी बेसब्री से संबंध सुधारना चाहता है। रूस, चीन, तुर्की, ईरान और उज़्बेकिस्तान ने भी तालिबान को देश में मौजूद अपने दूतावासों के संचालन की इजाजत दी है। इससे पहले, 2022 में, भारत ने काबुल में अपने दूतावास को आंशिक रूप से फिर से खोलने के लिए एक छोटी तकनीकी टीम भी भेजी थी।
भारत और तालिबान में करीबी, एक रणनीतिक बदलाव? (What us India's Taliban Strategy)
जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है, ये हालिया घटनाएं नई दिल्ली और काबुल के बीच संबंधों के गहराने का संकेत हैं।
लेकिन, अल जजीरा की रिपोर्ट में भारतीय थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उप निदेशक और फेलो कबीर तनेजा ने कहा, "लेकिन यह कदम रणनीतिक बदलाव नहीं हो सकता है, जैसा कि यह प्रतीत होता है।"
उन्होंने कहा, "यह 2021 से काबुल में तालिबान की वास्तविकता के प्रति भारत के सतर्क और नजरिए का एक स्वाभाविक विकास है।"
कबीर तनेजा के मुताबिक, "अन्य पड़ोसियों की तरह, भारत के लिए भी तालिबान एक वास्तविकता है, और अफगानिस्तान और अफगान लोगों की अनदेखी करना कोई विकल्प नहीं है।"
नई दिल्ली में जिंदल स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के एसोसिएट प्रोफेसर राघव शर्मा ने इस पर सहमति जताई। उन्होंने अल जीजरा से कहा, "मुझे लगता है कि यह पहले की नीति का ही एक हिस्सा है, जहां हम तालिबान के साथ बातचीत कर रहे हैं, लेकिन हम वास्तव में अपनी बातचीत की गहराई को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं।" उन्होंने कहा, "लेकिन इस तरह की बातचीत से नीति शायद ही कभी उभरी हो।"
उन्होंने कहा, "जब तालिबान के साथ कूटनीतिक जुड़ाव की बात आती है, तो हम हाशिये पर ही रहे हैं।"
उन्होंने वाशिंगटन इंस्टीट्यूट के एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा, जो एक अमेरिकी थिंक टैंक है जिसने तालिबान के साथ अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव का विश्लेषण किया है। अध्ययन में पाया गया कि कतर, चीन और तुर्की जैसे देश तालिबान के साथ संबंध विकसित करने में अग्रणी हैं, जबकि पाकिस्तान प्रभाव के मामले में पांचवें नंबर पर है। शर्मा ने कहा, "भारत इस सूची में भी नहीं है।"
शर्मा ने कहा, "लंबे समय से भारत कहता रहा है, कि अफगानिस्तान रणनीतिक महत्व का देश है और हमारे ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, लेकिन फिर आपको अपनी बात पर अमल करना होगा।" उन्होंने कहा, कि "गणतंत्र सरकार के पतन के बाद, हमने अफगानिस्तान को ठंडे बस्ते में डाल दिया, और केवल तभी इस पर ध्यान दिया, जब हमें जरूरत थी।"
यानि, शर्मा के मुताबिक भारत ने तालिबान के साथ संबंधों को सुधारने में कोई खास कदम आगे नहीं बढ़ाए हैं।
Foreign Secy @VikramMisri met Acting Foreign Minister of Afghanistan Mawlawi Amir Khan Muttaqi in Dubai today.
Both sides discussed 🇮🇳s ongoing humanitarian assistance to Afghanistan, bilateral issues and security situation in the region. India reiterated its commitment to… pic.twitter.com/a3UyuIqkAG
— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) January 8, 2025
तालिबान को लेकर भारत की झिझक बरकरार?
तनेजा का मानना है, कि इस सब से एक सकारात्मक कदम जो निकल सकता है, वह है अफगानों के लिए वीजा की संभावना। उन्होंने कहा, "मिसरी-मुत्तकी की भागीदारी से मुख्य बात यह है, कि भारत अफगानों के लिए वीजा की एक श्रृंखला को फिर से शुरू करने के करीब है, विशेष रूप से व्यापार, स्वास्थ्य पर्यटन और शिक्षा के लिए।"
2021 में तालिबान के कब्जे के बाद चिकित्सा और छात्र वीजा सहित अफगान वीजा को निलंबित करने के लिए भारत की आलोचना की गई थी। तब से भारत ने अफगानों के लिए बहुत कम वीजा जारी किए हैं। तनेजा ने कहा, "अब समय आ गया है, कि नई दिल्ली ऐसा करे।" उन्होंने कहा, कि "इससे कई अफगान नागरिकों को राहत मिलेगी, जिन्होंने उच्च शिक्षा, चिकित्सा देखभाल आदि प्राप्त करने के लिए भारत को अपनी पसंदीदा पसंद के रूप में इस्तेमाल किया था।"
हालांकि शर्मा ने कहा, कि सुरक्षा चिंताओं के कारण उन्हें इस बात की कम उम्मीद है, कि ज्यादा वीजा जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा, "आखिरकार, तालिबान एक वैचारिक आंदोलन है और सत्ता में उनके फिर से उभरने से कट्टरपंथ में तेजी आई है, जो एक चुनौती होगी।"
हालांकि, भारत को भी इस क्षेत्र में शामिल रहने की जरूरत है। लेकिन "भारत का मानना है कि तालिबान के लिए चैनल खुला रखकर, वे कम से कम कुछ मुद्दों पर उनसे जुड़ने में सक्षम होंगे जो भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। क्या तालिबान ऐसा कर पाएगा, यह एक और सवाल है क्योंकि तालिबान के मुकाबले हमारे पास क्या लाभ हैं?" शर्मा ने कहा कि इस बैठक की भारत से ज्यादा तालिबान को जरूरत थी। तालिबान के पाकिस्तान के साथ लड़ाइयां हो रही हैं और वो दिखाना चाहता है, कि उसके पास विकल्पों का व्यापक दायरा उपलब्ध है।
उन्होंने कहा, "वे (तालिबान) खास तौर पर पाकिस्तान को (स्वायत्तता) दिखाना चाहते हैं। लेकिन इससे उन्हें इस बड़े प्रोपेगेंडा के खिलाफ खेलने में भी मदद मिलती है, कि उनके पास कोई रणनीतिक स्वायत्तता नहीं है, उनके पास कोई एजेंसी नहीं है और वे केवल पाकिस्तान के पिट्ठू हैं।"
तालिबान को लेकर भारत सावधान या कोई रणनीति नहीं है?
भारत के तालिबान के साथ आगे बढ़ने में ज्यादा दिलचस्पी ना होने के और भी कई कारण हो सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है, कि करीबी संबंध "दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र" को नैतिक दलदल में डाल सकते हैं।
शर्मा ने पूछा, कि "भारत ने लंबे समय से खुद को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में पेश करने और स्थापित करने की कोशिश की है, लेकिन उसने अफगानिस्तान में लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध लगाने की निंदा नहीं की है। महिलाओं के मुद्दों पर पूरी तरह से चुप्पी रही है। तो हम अपने देश की आबादी को क्या संकेत दे रहे हैं?"
भारत ने अफगानिस्तान में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी है और 2001 में तालिबान के पतन के बाद राजनयिक मिशन भेजने वाले पहले देशों में से एक था। लेकिन इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण हितों के बावजूद, भारत के पास देश पर एक नीति का अभाव है।
शर्मा ने कहा, "भारत जो भी पैंतरेबाजी करना चाहता था, उसने हमेशा उन अन्य शक्तियों के साथ तालमेल बिठाकर किया है, जिनके साथ हमें हितों का साथ मिला है। अतीत में यह मुख्य रूप से ईरान और रूस और फिर अमेरिका रहा है। लेकिन अमेरिका समर्थित गणतंत्र सरकार के पतन के बाद, भारत ने खुद को एक नई स्थिति में पाया।"
एक हकीकत ये भी है, कि अमेरिका भी ISIS के खतरों से निपटने के लिए तालिबान के साथ मिलकर काम कर रहा है और भारत भी सतर्क है, कि अफगानिस्तान की धरती उसके लिए इस्तेमाल ना हो और तालिबान ने बहुत हद तक भारत को वचन भी दिया है।
वहीं, ईरान जैसे देश, जिन्होंने तालिबान की मदद की और उसे सुविधाजनक बनाया, यहां तक कि पाकिस्तान ने भी विपक्ष के लिए संचार के चैनल खुले रखे हैं। ईरान में इस्माइल खान जैसे विपक्षी नेता मौजूद हैं, जो तालिबान से बात करते हैं। ताजिक सरकार, जो शुरू में तालिबान की बहुत आलोचना करती थी, अब वैसी नहीं रही बल्कि अब वो तालिबान नेताओं की मेजबानी करती है।
'अपने सारे अंडे तालिबान की टोकरी में डाल रहे हैं'
हालांकि, अब एक्सपर्ट्स आकलन कर रहे हैं, कि ट्रंप प्रशासन के आने के बाद अफगानिस्तान को लेकर उनकी नीति क्या हो सकती है? तनेजा ने कहा, "अफगानिस्तान वाशिंगटन, डीसी में राजनीतिक चेतना से गायब हो गया है।" हालांकि यह देश सुरक्षा के मोर्चे पर प्रासंगिक बना हुआ है, लेकिन यह "गाजा, ईरान और यूक्रेन जैसे अधिक तात्कालिक मुद्दों को पीछे नहीं छोड़ेगा"।
उन्होंने कहा, कि आगे क्या होगा, यह कहना मुश्किल है। ट्रंप की रणनीतियां दैनिक आधार पर मौसम की भविष्यवाणी करने के समान हैं। हालांकि, ताकत हासिल करने की कोशिश कर रहे तालिबान के किसी भी विरोधी को ट्रंप के शासन में बाइडेन के शासन की तुलना में ज्यादा सुलभ सुनवाई मिल सकती है।
आखिरकार, क्षेत्र में सबसे मजबूत शक्ति होने के बावजूद, भारत अफगानिस्तान में विविध खिलाड़ियों के साथ जुड़ने में नाकाम रहा है, जिससे लंबे समय में उसके हित अलग-थलग पड़ गए हैं। तनेजा ने कहा, कि "शुरू में, हमने अपने सभी अंडे (हामिद) करजई (पूर्व अफगान राष्ट्रपति) की टोकरी में और फिर (अशरफ) गनी की टोकरी में डालने की गलती की। हमने बांग्लादेश में भी यही किया और शेख हसीना को अपना पूरा समर्थन दिया।"
शर्मा ने कहा, कि इसे सुधारने में समय लग सकता है क्योंकि भारत में अफगान समाज की महत्वपूर्ण समझ की कमी हो सकती है।
तालिबान-भारत दोस्ती पर क्या कह रहे पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स?
वहीं, भारत और तालिबान के बीच बढ़ती नजदीकी को लेकर पाकिस्तानी एक्सपर्ट्स चिंता जता रहे हैं, कि भारत एक बार फिर से अफगानिस्तान में अपना पांव जमा सकता है।
बीबीसी के मुताबिक, पाकिस्तान के डिफेंस एक्सपर्ट आयशा सिद्धीकी ने नया दौर टीवी से कहा, कि "भारत ने तालिबान से बातचीत अफगानिस्तान में पाकिस्तान के असर को कम करने के लिए उठाया है। क्योंकि, जब काबुल पर तालिबान का कब्जा हुआ था, उससे पहले तक भारत ने कभी तालिबान से कोई बात ही नहीं की थी।"
उनका कहना है, कि "अफगानिस्तान में भारत ने भारी-भरकम निवेश किया हुआ है। भारत ने वहां डैम बनाए हैं, सड़कें बनाए हैं, इसलिए दोनों की बातचीत मुफीद बैठेगी। साथ ही, भारत के लिए अफगानिस्तान मध्य एशिया तक पहुंचने का रास्ता भी है और भारत इस संभावना को तलाशने की कोशिश कर रहा है।"
वहीं, पॉलिटिकल एक्सपर्ट नजम सेठी का मानना है, कि "तालिबान और पाकिस्तान के बीच जो संबंध खराब हुए हैं, उसमें भारत को लोहा गरम लग रहा है। लिहाजा, भारत तालिबान से संबंध मजबूत कर रहा है।" उन्होंने कहा, कि "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, भारत और तालिबान इसी नीति पर चल रहे हैं और इसीलिए पूरी तरह से बेफिक्र होकर तालिबान, भारत से रिश्ते बनाने में लगा हुआ है।"
नजम सेठी के मुताबिक, "अफगानिस्तान में अब ग्रेट गेम की तैयारी शुरू हो चुकी है।"
कुल मिलाकर पाकिस्तान में भारत और तालिबान के बीच बढ़ती मुलाकातों को लेकर काफी बातें की जा रही हैं और टीवी पर डिबेट्स हो रहे हैं। पाकिस्तान का मानना है, कि अफगानिस्तान को 'पांचवा राज्य' बनाने का उसका सपना टूट चुका है और तालिबान के साथ उसकी दुश्मनी का भारत जमकर फायदा उठाएगा।












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