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चीन और पाकिस्तान... दो मोर्चों की लड़ाई के लिए भारत की रणनीति क्या है?

भारत की सुरक्षा की दीवार पूरी तरह से रूस पर निर्भर है और भारतीय सेना के पास हथियारों का जो जखीरा है, उसमें से करीब 60 प्रतिशत हथियार रूस से खरीदे हुए हैं।

नई दिल्ली, जून 04: यूक्रेन पर रूस का हमला... और विश्व का यूक्रेन की मदद के नाम पर खामोश हो जाना...इस बड़ी अंतर्राष्ट्रीय घटना ने कुछ ऐसे कारकों को जन्म दिया है, जो भारत की सुरक्षा के लिए प्रासंगिक हैं और तीनों सैन्य डोमेन, यानि थल सेना, वायु सेना और नौसेना की रूस पर अत्यधित निर्भरता को लेकर एक सुरक्षित विकल्प खोजने की जरूरत है। भारत के दो पड़ोसी देश, चीन और पाकिस्तान... लगातार भारत की सुरक्षा के लिए चुनौती पेश करते रहते हैं, लिहाजा भारत को दो मोर्चों पर लड़ाई की तैयारी करने की जरूरत है। भारत के पूर्व राजदूत प्रीत मलिक, जो म्यांमार में भारत के राजदूत रह चुके हैं, उन्होंने भारत की सुरक्षा के लिए चीन और पाकिस्तान को बड़ा खतरा बताया है और उन्होंने चाणक्य फोरम के लिए लिखे एक लेख में बताया है, कि भारत को किस तरह से दो मोर्चों की लड़ाई के लिए तैयारी करने की जरूरत है।

रूस पर हद से ज्यादा निर्भरता

रूस पर हद से ज्यादा निर्भरता

भारत की सुरक्षा की दीवार पूरी तरह से रूस पर निर्भर है और भारतीय सेना के पास हथियारों का जो जखीरा है, उसमें से करीब 60 प्रतिशत हथियार रूस से खरीदे हुए हैं। इसके साथ ही रूस और भारत के बीच पनडुब्बी प्रोजेक्ट पर भी काम चल रहा है। प्रीत मलिक ने अपने लेख में लिखा है, भारत के सामने वास्तविकता यह है, कि भारत के पास चीन और पाकिस्तान के तौर पर दो ऐसे पड़ोसी देश हैं, जो दोनों भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं और पाकिस्तान जिस तरह से आर्थिक और सामरिक तरीके से चीन पर निर्भर हो गया है और चीन ने जिस तरह से पाकिस्तान की सरकार और पाकिस्तान की नीतियों को कंट्रोल किया है और दोनों देशों ने जिस तरह से 'सभी मौसम के साथी' के तौर पर खुद को प्रस्तुत किया है, उसने भारत के ऊपर खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है।

चीन पर बढ़ी रूस की निर्भरता

चीन पर बढ़ी रूस की निर्भरता

पाकिस्तान के अलावा रूस की निर्भरता जिस तरह से चीन पर बढ़ी है, वो भी भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाला है। खासकर यूक्रेन पर हमले के बाद यूरोप, अमेरिका और सहयोगी देशों ने जिस तरह से रूस को अलग-थलग किया है, उसने रूस को पूरी तरह से चीन का 'छोटा भाई' बना दिया है, लिहाजा अब भारत को रणनीतिक दुविधा का सामना करना पड़ रहा है, कि उसे तत्काल समाधान खोजना होगा और स्थाई के साथ साथ भारत को दीर्घकालिक समधान खोजने की तरफ आगे बढ़ना होगा। वहीं, यहां यह समझना भी महत्वपूर्ण है, कि लोकतांत्रिक भारत और तत्कालीन सोवियत संघ के सत्तावादी कम्युनिस्ट राज्य के बीच जो घनिष्ठ रक्षा और राजनीतिक समझ विकसित हुई थी, वह शीत युद्ध और वाशिंगटन और इस्लामाबाद के बीच घनिष्ठ रक्षा और सुरक्षा संबंधों के कारण थी। पाकिस्तान ने अपने निर्माण से ही भारत के लिए एक सुरक्षा खतरा स्थापित कर दिया था, लिहाजा उस वक्त भारत ने गुटनिरपेक्ष रहकर भी रूस की मदद ली, लेकिन अब स्थितियां पूरी तरह से बदल गई हैं। चीन पाकिस्तान के संबंध ऐतिहासिक स्तर पर खराब हो चुके हैं और रूस अब एक आर्थिक तौर पर बीमार देश बनने वाला है।

रूस कैसे बना भारत का विकल्प?

रूस कैसे बना भारत का विकल्प?

आजादी के समय और उसके बाद कुछ सालों तक भारत हथियारों के मामले पर यूनाइटेड किंगडम पर निर्भर था, लेकिन जब पाकिस्तान और अमेरिका के बीच कई रक्षा समझौते हुए और अमेरिका के साथ भारत के संबंध काफी जटिल हो गये, तो भारत ने अपनी सुरक्षा चुनौतियों को कम करने के लिए रूस के साथ दोस्ती बढ़ाई। नई दिल्ली ने अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने के लिए उपकरण और टेक्नोलॉजी के लिए मास्को का रुख किया। वहीं, रूस ने भारत को ना सिर्फ टेक्नोलॉजी से मदद की, बल्कि भारत में कई औद्योगिक संयंत्र की स्थापना रूस ने ही की और आज के भारत के विकास में रूस का बड़ा योगदान रहा है। वहीं, जब साल 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया और तिब्बत के साथ भारत के लद्दाख की सीमा के अक्साई चिन सेक्टर को हथिया लिया, तो साफ हो गया, चीन के मंसूबे क्या होने वाले हैं।

चीन का ‘ऑपरेशन लाल किला’

चीन का ‘ऑपरेशन लाल किला’

तिब्बत पर कब्जा करने के बाद चीनी सेना के पूर्वी कमान के सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल थोराट ने 'लाल किला' शब्द के साथ एक महत्वपूर्ण सैन्य अभ्यास किया था, जिसने न केवल इस तथ्य को रेखांकित किया था, बल्कि ये भी खतरा बन गया था, कि तिब्बत पर अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद चीन भारत पर हमला करेगा। वहीं, ऑपरेशन लाल किला के बाद ये साफ हो गया था, कि भारत को फौरन युद्ध से बचाव की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए और उन उपकरणों की कमी पर फौरन ध्यान दिया जाना चाहिए, जिनके जरिए चीन का मुकाबला किया जा सके। लेकिन, तत्कालीन भारतीय रक्षा मंत्री बीएल. कौल ने चीन की इस रणनीति को बेकार बताते हुए उसे कचरे के ढेर में फेंक दिया। साल 1962 में हार के बाद सैन्य और राजनीतिक, दोनों क्षेत्रों में भारत को जो नुकसान हुआ, वो चीन की अच्छी तरह से तैयार की रणनीति की अनदेखी करने का परिणाम था।

अब फिर चुनौती दे रहा है ड्रैगन

अब फिर चुनौती दे रहा है ड्रैगन

भारत के दरवाजे पर खड़ा होकर ड्रैगन एक बार फिर से भारत के सामने चुनौती पेश कर रहा है और तिब्बत के साथ अपनी सीमाओं पर तेजी से शत्रुतापूर्ण और आक्रामक चीन का सामना कर रहा है। चीन अपनी चाल का विस्तार कर रहा है और एलएसी के पार कदम बढ़ाकर भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है। इस प्रक्रिया में यह लद्दाख सेक्टर में आक्रामक हो गया है जहां अभी भी चीनी और भारतीय सशस्त्र बलों के बीच आमने-सामने का टकराव हो रहा है। यह एक चीन है जो खुद को भारतीय राज्यों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में एक खिलाड़ी के रूप में देखता है और अब यह तय हो चुका है कि, कि चीन नाम का ये खतरा टलने वाला नहीं है।

तो क्या रूस के साथ भारत बदले रणनीति?

तो क्या रूस के साथ भारत बदले रणनीति?

मौजूदा स्थिति ये है कि, चीन और रूस के काफी मजबूत संबंध हो चुके हैं और परिस्थितिवश अब रूस के लिए चीन से दूर जाना संभव नहीं है। वहीं, चीन, रूस से न केवल उपकरण आयात करता है, बल्कि महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियां भी आयात करता हैं, जिन पर आगे रिसर्च कर सके। इसके अलावा, जैसे-जैसे रूस का चीन का आर्थिक और रणनीतिक संबंध आगे बढ़ता है, भारत अब वादा किए गए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, महत्वपूर्ण पुर्जों की समय पर आपूर्ति के मामले में रूस पर पूरी तरह से निर्भर नहीं रह सकता है, खासकर अगर भारत पर एक और युद्ध जैसी स्थिति थोपी जाती है। लिहाजा, ये सीधे तौर पर भारत की रक्षा क्षमता के लिए बड़ी चुनौती है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता है, कि चीन और भारत के बीच तनाव बढ़ने पर अब रूस पूरी तरह से न्यूट्रल ना हो जाए। वहीं, कई एक्सपर्ट्स ये भी दावा करते हैं, कि जैसे जैसे रूस की चीन पर निर्भरता बढ़ेगी, वो आगे जाकर रूस पर भारत की मदद नहीं करने का भी दबाव बना सकता है।

यूक्रेन में रूसी हथियार नाकामयाब

यूक्रेन में रूसी हथियार नाकामयाब

यूक्रेन की जंग में दोनों देशों की सेनाओं का भारी नुकसान हो रहा है, लेकिन युद्ध जितने दिनों तक खिंचता जा रहा है, और जिस तरह से यूक्रेनी हथियार ध्वस्त हो रहे है, उसने भारत की चिंताओं को बढ़ाना शुरू कर दिया है। युद्ध में देखने को मिल रहा है, कि अमेरिका की जेवलिन मिसाइलों के जरिए बेहद आसानी से रूसी टैंकों को ध्वस्त किया जा रहा है, तो फिर सवाल ये उठता है कि, भारतीय सेना के पास भी रूसी हथियारों की भरमार है। तो क्या चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन देशों से घिरे भारत के लिए रूसी हथियारो का गाजर-मूली की तरह तबाह होना... क्या चिंता की बात नहीं है? रूस के मुकाबले बेहद कमजोर माने जाने वाले यूक्रेन ने जिस तरीके से रूसी सेना को पानी पिलाई है, उससे भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के कान खड़े हो गये हैं, क्योंकि भारत ने अभी तक करीब 70 अरब डॉलर के हथियार रूस से खरीदे हैं। भारत ने पिछले साल ही रूस के साथ एक-203 असॉल्ट राइफल खरीदने के लिए रूसी हथियार कंपनी के साथ सौदा किया है और दोनों देशों के बीच ये करार 5 हजार करोड़ का है। रूसी कंपनी ने भारत के उत्तर प्रदेश में फैक्ट्री बनाकर 70 हजार राइफल बनाने का कॉन्ट्रैक्ट किया है।

दो मोर्चे की लड़ाई की तैयारी

दो मोर्चे की लड़ाई की तैयारी

इस सब में जो स्पष्ट है वह यह है कि भारत को चीन-पाक गठबंधन द्वारा पेश किए जाने वाले दोहरे खतरे का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार रहना होगा। पूर्व राजदूत प्रीत मलिक का मानना है कि, भारत को अब रिएक्टिव रिस्पांस नीति का पालन करना चाहिए और दीर्घकालिक एजेंडे पर तेजी से काम करना चाहिए। प्रीत मलिक के मुताबिक, सामरिक रूप से, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के बीच क्वाड डेवलपमेंट एक स्वागत योग्य बात है और बिना किसी हिचकिचाहट के उनका पालन किया जाना चाहिए, वहीं, फ्रांस, जर्मनी और इज़राइल के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफरके लिए स्पष्ट रूप से लाइनें स्थापित होनी चाहिए। यूके हमेशा ऐसे मामलों में वाशिंगटन द्वारा उठाए गए नेतृत्व का पालन करेगा, लिहाजा इन कारकों को ध्यान में रखते हुए यूनाइटेड किंगडम को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि, सामरिक रूप से रूस के लिए दरवाजे खुले रखे जाने चाहिए और उन्हें भारत को एक प्रमुख भागीदार के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि रूस को पूरी तरह से चीनी खेमे में रखना भारत के रणनीतिक हित में नहीं है।

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