श्रीलंका में ड्रैगन के ‘जहाज’ को डुबोया, छीन लिया मेगा प्रोजेक्ट, फिर भी जाफना में क्यों फंस गया भारत?
तमिल टाइगर्स की वजह से जाफना प्रांत हमेशा से भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है और इसीलिए चीन को यहां से हटाना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि भी है। लेकिन, प्रोजेक्ट हासिल करने के बाद भी भारत के लिए यहां का रास्ता आसान नहीं है
जाफना, अप्रैल 19: श्रीलंका के उत्तरी हिस्से में स्थिति जाफना प्रायद्वीप में चीन को बहुत बड़ा झटका देते हुए भारत ने रणनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माने जाने वाले मेगा प्रोजेक्ट को अपने पाले में कर लिया है और श्रीलंका की सरकार के साथ भारत ने जाफना प्रांत में अक्षय ऊर्जा परियोजना के लिए समझौता कर लिया है। जाफना प्रांत से चीन को बेदखल करना भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि चीन आने वाले वक्त में इस जगह से भारत के लिए बड़ी मुसीबतें पैदा कर सकता था।

जाफना प्रांत में है प्रोजेक्ट
तमिल टाइगर्स की वजह से जाफना प्रांत हमेशा से भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है और इसीलिए चीन को यहां से हटाना भारत के लिए बड़ी उपलब्धि भी है। लेकिन, प्रोजेक्ट हासिल करने के बाद भी भारत के लिए यहां का रास्ता आसान नहीं है। जिस क्षेत्र में भारत अक्षय ऊर्जा प्लांट बनाने वाला है, उस क्षेत्र में करीब 5 हजार लोग रहते हैं, जो पेशे से मछुआरे हैं। लेकिन अपने क्षेत्र में होने वाली इतनी बड़ी हलचल और दो बड़ी शक्तियों के बीच एक प्रोजेक्ट को लेकर हुई खींचतान से ये आबादी पूरी तरह से अनजान है। जिन जगह पर ये प्रोजेक्ट बनना है, उनके नाम नैनाथीवु और अनालथीवु है और नई दिल्ली ने कामयाबी के साथ यहां पर बीजिंग प्रभाव को पूरी तरह से खत्म कर दिया है।

छोटे क्षेत्र में बड़ी भू-राजनीतिक हलचल
ये दोनों छोटे छोटे क्षेत्र भू-राजनीति के लिए इतने ज्यादा अहम है, यहां के मछुआरों को ये बात नहीं पता। वे जो जानते हैं, वह यह है, कि उन्हें तमिलनाडु के भारतीय मछुआरों से निपटना पड़ता है जो सप्ताह में तीन दिन जाफना के आसपास के पानी में मछलियां पकड़ने के लिए उतरते हैं और स्थानीय लोगों के मछली पकड़ने के जाल को नष्ट करते हैं, और खुद "इरेटाई माडी" या डबल-फोल्ड जाल का उपयोग नीचे तक करते हैं, ताकि समुद्र की काफी गहराई में जाकर मछलियां पकड़ सके। इस परियोजान पर दोनों देशों के बीच हस्ताक्षर पिछले महीने मार्च में हुआ था, जब भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर श्रीलंका के दौरे पर गये थे और भारत ने श्रीलंका की मदद के लिए हाथ बढ़ाते हुए 2.4 अरब डॉलर की सहायता दी थी।

जाफना की दिक्कतें
जाफना में रहने वाले मछुआरे लंबे वक्त से मछली पकड़ने के संकट को हल करने का आग्रह भारत से करते आए हैं और इस वक्त भी, जब भारत लगातार आर्थिक संकट में फंसे श्रीलंका की मजबूती के साथ मदद कर रहा था, उस वक्त भी चाहिए, कि इस मुद्दो को भारत बनाम चीन लेंस के माध्यम से नहीं, बल्कि लोगों के लिए अनुकूल परियोजनाओं के साथ श्रीलंका के साथ अपने जुड़ाव को फिर से स्थापित करने के अवसर के रूप में देखा जाए, जिसमें तमिल क्षेत्रों में शामिल हैं।

रामेश्वरम से सिर्फ 45 किमी की दूरी
50 वर्गकिमी में के इस जेल्फ्ट का तमिल नाम नेदुन्थीवु है और ये Palk Strait में स्थिति है। जाफना जेट्टी से एक घंटे की नाव की सवारी के बाद यहां तक पहुंचा जा सकता है और इस जगह की भारतीय क्षेत्र रामेश्वरम से दूरी सिर्फ 45 किलोमीटर है। बीच में कच्चातीवू जगह भी है, जिसे भारत ने 1974 में श्रीलंका को सौंप दिया था। इस पूरे क्षेत्र में श्रीलंका का क्षेत्रीय जल भारतीय और श्रीलंकाई मछुआरों के बीच गंभीर विवाद का विषय है। 42 वर्षीय रेगेस्वरन ने किनारे से दूर एक समुद्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि, 'वो सोमवार, बुधवार और शनिवार की रात को इन क्षेत्र में आते हैं। उनके पास करीब 300 से 500 नावें होती हैं और ये तीनों दिन वो मछली पकड़ते हैं और वो हमारे क्षेत्र के काफी करीब आ जाते हैं।' श्रीलंका के Palk Strait में तीन छोटे छोटे प्रायद्वीप हैं, एक जेल्फ्ट, दूसरा नैनाथीवु और तीसरा अनालथीवु, जहां तमिल बहुल लोग रहते हैं।

भारत के लिए जब बजी खतने की घंटी...
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय मछुआरे बताते हैं कि, जब द्वीप पर तैनात श्रीलंकाई नौसेना इकाई भारतीय मछुआरों को इन पानी में घुसपैठ करने से गिरफ्तार करती है, तो "उन्हें कोलंबो में बड़े लोगों से उनकी रिहाई का आदेश देने के लिए फोन आने लगते हैं"। भारत और श्रीलंका लगभग दो दशकों से मछुआरों के मुद्दे पर लगे हुए हैं, लेकिन इस मामले को सुलझा नहीं पाए हैं। लेकिन, जब पिछले साल अचानक इस क्षेत्र में भारत के खिलाफ खतरे की घंटी बजी, तो भारत सरकार भी नींद से जागी। हुआ ये, कि पिछले साल श्रीलंका ने कोलंबो पोर्ट पर पूर्वी कंटेनर टर्मिनल विकसित करने के लिए भारत और जापान के साथ हुए समझौते को एकतरफा रद्द कर दिया और इस समझौते को रद्द करने से पहले श्रीलंका ने जाफना के नैनाथीवु और एनालाथीवु क्षेत्र में अक्षय ऊर्जा प्रोजेक्ट एक चीन की कंपनी को सौंप दिया। ये प्रोजेक्ट 12 अरब डॉलर का है और प्रोजेक्ट चीन की एक कंपनी सिनोसोअर-एटेकविन को सौंपी गई। श्रीलंका के इस फैसले ने भारत को हिला कर रख दिया, क्योंकि ये क्षेत्र भारत से सिर्फ 45 किलोमीटर की दूरी पर है।

चीन के साथ क्या था करार...
चीनी कंपनी और श्रीलंका के बीच अक्षय ऊर्जा प्रोजेक्ट के लिए जो करार किया गया, उसके मुताबिक श्रीलंका सरकार की सपोर्टिंग कंपनी सीलोन इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड और चीन की कंपनी सिनोसोअर-एटेकविन को मिलक प्रोजेक्ट का विकास करना था। इस प्रोजेक्ट को इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई रिलायबिलिटी इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट के तहत बनाया जाना था और श्रीलंकन कंपनी को इस प्रोजेक्ट के लिए एशियाई विकास बैंक से ऋण मिलना था। लेकिन, भारत ने इस परियोजना पर अपनी सुरक्षा चिंताओं को सामने रखते हुए श्रीलंका के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया। भारत की चिंता ये थी, कि यह स्थान भारतीय समुद्र तट के सिर्फ 45 किलोमीटर करीब है और इन तीन द्वीपों में से डेल्फ़्ट तमिलनाडु के सबसे नज़दीक है।

श्रीलंका का माइंडगेम...
भारत को किसी भी हाल में चीन की कंपनी को इस क्षेत्र से बाहर करना था। लिहाजा, नई दिल्ली ने श्रीलंका के सामने एक खास प्रस्ताव रखा। नई दिल्ली ने परियोजना लागत के 75 प्रतिशत अनुदान के साथ अपनी परियोजना की पेशकश श्रीलंका के सामने की। श्रीलंका के लिए ये एक सुनहरा मौका था और कोलंबो ने चीन के साथ समझौता रद्द कर दिया, लेकिन, श्रीलंका ने माइंडगेम खेलते हुए भारत को भी कोई जवाब नहीं दिया। इस दौरान भारत और चीन...दोनों महाशक्तियां अपनी अपनी परियोजनाओं को लेकर अपना प्रस्ताव श्रीलंका के सामने रख रहे थे। चीन भी इस प्रोजेक्ट को छोड़ना नहीं चाहता था, क्योंकि ऐसा करने पर वो इस क्षेत्र से हिंद महासागर पर नजर रख सकता था।

भारत की झोली में कैसे आया प्रोजेक्ट
श्रीलंका अपने इस क्षेत्र का महत्व जानता था, लिहाजा वो माइंडगेम खेल रहा था। इसी बीच पिछले साल 3 दिसंबर को श्रीलंका के पूर्व वित्त मंत्री बेसिल राजपक्षे नई दिल्ली का दौरा खत्म कर वापस कोलंबो पहुंचे। भारत में बेसिल राजपक्षे और भारत सरकार के बीच इस प्रोजेक्ट को लेकर बात हुई थी, जिसको लेकर श्रीलंका में चीन के राजदूत ने सवाल उठा दिया। श्रीलंका में चीनी राजदूत क्यूई जेनहोंग ने ट्वीट करते हुए लिखा कि, एक "तीसरे पक्ष" की वजह से "सुरक्षा चिंताओं" ने जन्म लिया है, इसीलीए इस प्रोजेक्ट को "सस्पंड" किया जाता है। चीन के राजदूत ने यह भी घोषणा कर दी, कि चीन की कंपनी सिनोसोअर मालदीव में एक सौर-डीजल बिजली संयंत्र स्थापित कर रहा है। चीन के राजदूत के इस ट्वीट के साथ ही श्रीलंका की पलकें झपक गईं। पवन और जल विद्युत उत्पादन परियोजनाओं के विकास राज्य मंत्री डुमिंडा दिसानायके ने दिसंबर 2021 में श्रीलंकाई मीडिया को बताया कि, चूंकी भारत सरकार ने 75 प्रतिशत अनुदान की पेशकश की है, इसीलिए हम चीन के साथ करार को रद्द करते हैं।

मार्च में भारत-श्रीलंका में समझौता
आखिरकार मार्च महीने में भारत और श्रीलंका ने अंततः "तीन द्वीपों पर एक हाईब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना के कार्यान्वयन के लिए एक समझौता ज्ञापन" पर हस्ताक्षर किए। जाफना प्रांत में स्थिति तीन द्विपों में एक द्विप का नाम डेल्फ्ट है और इसका डेल्फ्ट नाम श्रीलंका पर शासन करने वाले डच ओपनिवेशक शासकों ने दिया था। इस क्षेत्र का ज्यादातर इलाका बंजर है और श्रीलंका में जब गृहयुद्ध चल रहा था, उस दौरान यहां के कई लोग भारत भाग गए थे। पीने के पानी के साथ-साथ ईंधन भी जाफना से लाना पड़ता है। कुछ जिज्ञासु पर्यटक डेल्फ़्ट पोनीज़ को देखने के लिए आते हैं, जो डच शासकों के घोड़ों से जंगली घोड़ों का एक प्रकार है। द्वीप में किलेबंदी के अवशेष भी हैं। अफ्रीका के मूल निवासी एक अकेला बाओबाब पेड़ भी औपनिवेशिक क्रॉस-धाराओं की गवाही देता है जो डेल्फ़्ट पर उड़ाए गए थे। पलमायरा के पेड़ मुख्य वनस्पति हैं। ( सभी तस्वीर-फाइल)












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