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Explained: भारत में चल रही अंटार्कटिक संसद की बैठक क्या है? जानिए इस बार के एजेंडे क्या हैं?

Antarctic Parliament meets: भारत इस वक्त अंटार्कटिक संसद की बैठक की मेजबानी कर रहा है, जो 20 मई को शुरू हुआ है और 30 मई तक कोच्चि में चलेगा। भारत इस साल 46वीं अंटार्कटिक संधि परामर्श बैठक (ATCM 46) की मेजबानी कर रहा है, जिसे अंटार्कटिक संसद के रूप में भी जाना जाता है।

भारत के नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओसियिन रिसर्च गोवा ने इस साल मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंस के साथ मिलकर अंटार्कटिक संसद की बैठक का आयोजन किया है, जिसमें अंटार्कटिक संधि से जुड़े 56 सदस्य देश हिस्सा ले रहे हैं। भारत ने इससे पहले, आखिरी बार 2007 में नई दिल्ली में एटीसीएम की मेजबानी की थी।

Antarctic Parliament meets

अंटार्कटिक संधि क्या है?

अंटार्कटिक संधि पर सबसे पहले 12 देशों ने, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, चिली, फ्रांस, जापान, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, यूएसएसआर, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1 दिसंबर 1959 को हस्ताक्षर किए गए थे और यह संधि 1961 में लागू हुई थी। जिसके बाद से अभी तक इसमें कुल 56 देश शामिल हुए हैं। वहीं, भारत साल 1983 में इसका सदस्य बना था।

अंटार्कटिक संधि, जिस पर शीत युद्ध के दौरान हस्ताक्षर किए गए थे, उसने प्रभावी रूप से अंटार्कटिका को अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की सीमा के बाहर "नो मैन्स लैंड" के रूप में नामित किया था। लिहाजा, इस संधि में कई जरूरी तत्व शामिल किए गये थे।

* अंटार्कटिका का उपयोग सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा, और किसी भी इस क्षेत्र में सैन्यीकरण करने या किलेबंदी की इजाजत नहीं दी जाएगी।

* सभी हस्ताक्षरकर्ताओं को वैज्ञानिक जांच करने की स्वतंत्रता होगी, और उन्हें वैज्ञानिक कार्यक्रमों के लिए योजनाएं साझा करनी चाहिए, आवश्यक सहयोग देना होगा और जमा किए गए डेटा को स्वतंत्र रूप से उपलब्ध कराना चाहिए।

* अंटार्कटिका में कहीं भी परमाणु परीक्षण या रेडियोधर्मी अपशिष्ट पदार्थों का निपटान प्रतिबंधित होगा।

आज, यह संधि इस धरती पर पांचवें सबसे बड़े महाद्वीप अंटार्कटिका में सभी शासन और गतिविधियों का आधार बनती है। जिसका मकसद अंटार्कटिका की रक्षा करना और वैज्ञानिक रिसर्च करना है।

अंटार्कटिका संधि में भारत

साल 1983 से भारत, अंटार्कटिक संधि का एक सलाहकार पक्ष रहा है। और इस क्षमता के आधार पर भारत, अंटार्कटिका के संबंध में सभी प्रमुख निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में मतदान करता है और भाग लेता है। अंटार्कटिक संधि में शामिल 56 देशों में से 29 को सलाहकार दल का दर्जा प्राप्त है।

भारत ने 1981 से अंटार्कटिका में वैज्ञानिक रिसर्च शुरू किया था, जो अभी भी चलता रहता है। पहला भारतीय अंटार्कटिका रिसर्चट स्टेशन, जिसका नाम दक्षिण गंगोत्री है, उसे 1983 में क्वीन मौड लैंड में, दक्षिणी ध्रुव से लगभग 2,500 किमी दूर स्थापित किया गया था। यह स्टेशन 1990 तक संचालित हुआ।

1989 में भारत ने अपना दूसरा अंटार्कटिका रिसर्च स्टेशन स्थापित किया, जिसका नाम मैत्री था, वो शिरमाचेर ओएसिस में, जो 100 से ज्यादा मीठे पानी की झीलों वाला 3 किमी चौड़ा बर्फ मुक्त पठार है, वहां स्थित है। ये रिसर्च सेंटर अभी भी चालू है और रूस के नोवोलाज़ारेव्स्काया स्टेशन से लगभग 5 किमी और दक्षिण गंगोत्री से 90 किमी दूर स्थित है। नेशनल सेंटर फॉर पोलर एंड ओशन रिसर्च के मुताबिक, मैत्री में गर्मियों में 65 और सर्दियों में 25 लोग रह सकते हैं।

साल 2012 में भारत ने अपने तीसरे अंटार्कटिका रिसर्च स्टेशन भारती का उद्घाटन किया था, जो मैत्री से लगभग 3,000 किमी पूर्व में प्रिड्ज़ खाड़ी तट पर स्थित है। हालांकि, यह स्टेशन समुद्र विज्ञान और भूवैज्ञानिक अध्ययन पर केंद्रित है और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इसका उपयोग भारतीय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट (आईआरएस) डेटा प्राप्त करने के लिए करता है। यह स्टेशन गर्मियों के दौरान 72 व्यक्तियों और सर्दियों में 47 व्यक्तियों को रखने में सक्षम है।

वहीं, अब भारत अपने पुराने मैत्री स्टेशन से कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक नया स्टेशन मैत्री II खोलने की योजना बना रहा है और इसका संचालन 2029 तक शुरू होने की उम्मीद है। 2022 में, भारत ने अंटार्कटिक संधि के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करते हुए, अंटार्कटिक अधिनियम लागू किया था।

अंटार्कटिक संधि की बैठक का एजेंडा क्या है?

ATCM यानि अंटार्कटिक संसद की बैठक का मकसद अंटार्कटिका में कानून व्यवस्था, रसद, शासन, विज्ञान, पर्यटन और दक्षिणी महाद्वीप के अन्य पहलुओं पर वैश्विक बातचीत की सुविधा प्रदान करना है।

इस सम्मेलन के दौरान, भारत अंटार्कटिका में शांतिपूर्ण शासन के विचार को बढ़ावा देने की कोशिश करेगा और इस बात पर जोर देगा, कि दुनिया में कहीं और भू-राजनीतिक तनाव महाद्वीप और उसके संसाधनों की सुरक्षा में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। MoES के सचिव डॉ. एम रविचंद्रन ने द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में कहा है, कि भारत महाद्वीप पर पर्यटन को विनियमित करने के लिए एक नया कार्य समूह भी पेश करेगा।

रविचंद्रन ने कहा, "हालांकि भारत ने 2016 से अंटार्कटिका में पर्यटन संबंधी गतिविधियों के बारे में चिंता व्यक्त की है, लेकिन यह पहली बार है, कि पर्यटक गतिविधियों पर नजर रखने और नियम बनाने के लिए काम करेगा।"

नीदरलैंड, नॉर्वे और कुछ अन्य यूरोपीय देश, जो अंटार्कटिका में पर्यटन के लिए नियम बनाने पर भारत के समर्थन में हैं, वो इस कार्य समूह का हिस्सा हैं। ऐसी उम्मीद है, कि पर्यटन को लेकर एक आम सहमति बन जाएगी। कोच्चि बैठक के दौरान भारत, आधिकारिक तौर पर सदस्यों के सामने मैत्री II के निर्माण की अपनी योजना भी पेश करेगा। अंटार्कटिका में किसी भी नए निर्माण या पहल के लिए एटीसीएम की मंजूरी की आवश्यकता होती है।

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