चीन के दुश्मन को भारत ने सौंपा दुनिया की सबसे हाईस्पीड मिसाइल, एक मैदान में कैसे पहुंचे भारत-अमेरिका और रूस?
Brahmos Missile in Philippines: हम अकसर सुनते रहते हैं, कि कैसे पड़ोसी देशों का इस्तेमाल कर चीन, भारत को परेशान करने की कोशिश में लगा रहता है, लेकिन आज हम आपको बताने वाले हैं, कि कैसे नये भारत ने चीन को उसी की भाषा में जवाब दिया है, जिससे चीन की नाक के नीचे एक खतरनाक दुश्मन पैदा हो गया है, जो ड्रैगन को ना सोने दे रहा है और ना ही जागने दे रहा।
हम बात कर रहे हैं फिलीपींस की, जहां भारत ने दुनिया की सबसे तेज रफ्तार से चलने वाली परमाणु मिसाइल को तैनात कर दिया है। एक आइडिया के लिए बता दें, कि फिलीपींस चीन के उतने ही करीब है, जितना करीब भारत के श्रीलंका है।

जहां भारत ने ब्रह्मोस एंटी-शिप मिसाइल तैनात कर दिया है, जिसे रूस की मदद से बनाया गया है और जनवरी 2022 में भारत और फिलीपींस के बीच ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर करार हुआ था, जिसने ड्रैगन को बेचैन कर रखा है। फिलीपींस और चीन के बीच लगातार विवाद बढ़ रहा है और चीन की आक्रामकता को फिलीपींस उसी की भाषा में जवाब दे रहा है।
फिलीपींस ने अपनी नौसेना के लिए तट-आधारित एंटी-शिप मिसाइल सिस्टम परियोजना के हिस्से के रूप में भारत से क्रूज मिसाइलों की तीन बैटरियों की खरीदी हैं।
ब्रह्मोस सिस्टम को मुख्य रूप से फिलीपीन मरीन कॉर्प्स की तटीय रक्षा रेजिमेंट द्वारा संचालित की जाएगी, जिसके कर्मी मिसाइल प्रणाली के संचालन में महारत हासिल करने के लिए भारत में ट्रेनिंग ले रहे हैं। हालांकि, मनीला जरूर इससे इनकार करता है, लेकिन दुनिया की सबसे तेज़ सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल को खरीदने का उसका फैसला, स्पष्ट रूप से चीन को ही काउंटर करना है।
फिलीपींस और चीन हैं दुश्मन
चीन और फिलीपींस, दोनों ही देश दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करते हैं, जिसकी वजह से पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच का विवाद काफी ज्यादा बढ़ गया है। चीन ने दक्षिण चीन सागर में फिलीपींस की नेवी पर हमले भी किया है और माना जाता है, कि इसीलिए फिलीपींस ने भारत से ब्रह्मोस मिसाइल सिस्टम खरीदा है, जिसे डिटेक्ट करने की क्षमता चीन के पास नहीं है।
ब्रह्मोस भारत और रूस का संयुक्त उद्यम है। हालांकि, ब्रह्मोस मिसाइल को किसी तीसरे देश को बेचने के लिए भारत और रूस, दोनों ही देशों की मंजूरी होना शामिल है, फिर भी रूस ने भारत को फिलीपींस को हथियार बेचने की इजाजत दे दी, जबकि हालिया समय में रूस और चीन काफी करीब आए हैं।
इसे मोदी सरकार की बड़ी डिप्लोमेटिक जीत माना जाता है।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड में भारत के पास 50.5% की बड़ी हिस्सेदारी है, जबकि रूस के पास 49.5% की हिस्सेदारी है, जिसका मतलब यह होता है, कि मॉस्को संयुक्त उद्यम में एक छोटे भाई जैसा वित्तीय भागीदार है। लेकिन, मॉस्को, टेक्नोलॉजी के मामले में 'बड़े भाई' की हैसियत रखता है और संभावित खरीदारों पर वीटो का अधिकार रखता है।

चीन के खिलाफ रूसी मिसाइल
फिर भी, यह सवाल बना हुआ है, कि क्या मॉस्को के कट्टर सहयोगी बीजिंग ने मॉस्को को फिलीपींस को ब्रह्मोस की बिक्री का समर्थन करने से रोकने के लिए राजनयिक दबाव डाला था? लेकिन, अगर चीन ने ऐसी कोशिशें की भी होंगी, फिर भी अगर आज फिलीपींस के पास ब्रह्मोस मिसाइल हैं, तो इसका मतलब ये हुआ, कि चीनी कोशिशें नाकाम साबित हुई हैं।
दूसरी सबसे हैरानी की बात ये है, कि फिलीपींस, अमेरिका का सबसे बड़ा डिफेंस पार्टनर है और अमेरिका और रूस के बीच की दुश्मनी जगजाहिर है। फिर भी, रूस ने फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल बेचने की इजाजत भारत को दे दी और ये एक विचित्र डिप्लोमेटिक समीकरण लग सकता है।
अमेरिका-फिलीपींस के बीच किस हद तक रक्षा समझौते हैं, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, फिलीपींस ने अपने देश में एक सैन्य अड्डा अमेरिका को दे दिया है। और फिलीपींस ने ये अड्डा इसलिए अमेरिका को दिया, क्योंकि अक्टूबर 2023 में चीनी कोस्ट गार्ड जहाजों ने फिलीपींस के जहाजों को दक्षिण चीन सागर में टक्कर मारी थीं। चीन ने ऐसा फिलीपींस को डराने-धमकाने के लिए किया था।
वहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1951 की आपसी रक्षा संधि के प्रावधानों का हवाला देते हुए, सशस्त्र हमले की स्थिति में अपने सहयोगी फिलीपींस की रक्षा करने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
फिलीपींस में ब्रह्मोस का पहला बैच
भारत और रूस के बीच मिसाइल बनाने के लिए 1998 में उस वक्त समझौता किया गया था, जब रूसी डिजाइन ब्यूरो आर्थिक संकट का सामना कर रही थी और उसे अपने ऑपरेशन को जारी रखने के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत थी।
"ब्रह्मोस" नाम भारत में ब्रह्मपुत्र नदी और रूस में मोस्कवा नदी के नाम को मिलाकर लिया गया है, जो दोनों देशों के बीच साझेदारी का प्रतीक है।
ब्रह्मोस मिसाइल को एक दुर्जेय हथियार प्रणाली माना जाता है, जिसे मुख्य रूप से जहाज-रोधी अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। ब्रह्मोस मिसाइल को समुद्र से जमीन पर, समुद्र से समुदग्र में, पानी के नीचे, हवा से समुद्र में, जमीन से हवा में, हवा से जमीन पर दागा जा सकता है। इसके अलावा, ब्रह्मोस मिसाइल को किसी ऐसे प्लेटफॉर्म से भी लांच किया जा सकता है, जो घूम रहा हो, यानि किसी ट्रेन या फिरी किसी टैंक से।
फिलीपींस में भारत के राजदूत शंभु कुमारन ने कहा, कि फिलीपींस ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की अपनी पहली खेप प्राप्त करने के कगार पर है।
राजदूत कुमारन ने मकाती शहर में भारतीय दूतावास के 75वें गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए कहा, कि जल्द से जल्द ब्रह्मोस मिसाइलों की डिलीवरी होने वाली है।
वहीं, 25 जनवरी को इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में डीआरडीओ के एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है, कि अगले 10 दिनों में फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइलों की डिलीवरी शुरू कर दी जाएगा और मार्च तक मनीला में फिलीपींस की पहली खेप पूरी तरह से पहुंच जाएगी। हालांकि, राजदूत कुमारन ने इस रिपोर्ट की पुष्टि नहीं की है।
लेकिन, फिलीपींस के जरिए भारत चीन को उसी तरह से घेर रहा है, जैसा चीन भारत के पड़ोसी देशों, खासकर पाकिस्तान और नये नवेले मालदीव के जरिए कर रहा है। इसके अलावा, भारत इंडोनेशिया और वियतनाम को भी ब्रह्मोस मिसाइल बेचने वाला है, लेकिन फिलीपींस के तेवर इन देशों के मुकाबले काफी ज्यादा आक्रामक होते हैं और फिलीपींस को ब्रह्मोस की आपूर्ति से समझा जा सकता है, कि भारत की विदेश नीति अब कितनी आक्रामक हो चुकी है।
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