Explained: अल्पमत की सरकार, ग्लोबल लीडर्स से दुत्कार, जस्टिन ट्रूडो का एंटी-इंडिया स्टैंड कितना खतरनाक?
India-Canada Diplomatic Row: कनाडा के प्रधानमंत्री जिस तरह से एंटी-इंडिया मुहिम चला रहे हैं, वो जियो पॉलिटिक्स के लिहाज से दुर्लभतम घटना है, जिसमें एक प्रधानमंत्री, जो सरकार का मुखिया होता है, वो एक मित्र देश के राजदूत (उच्चायुक्त) सहित छह राजनयिकों को अवांछित घोषित करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है।
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने 14 सितंबर को भी किया था, जब उन्होंने पिछले साल खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में छह भारतीय राजनयिकों पर "हितधारक" होने का आरोप लगाया था, जो गलत तरीकों से कनाडा का नागरिक बन गया था।

और, उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनकी विदेश मंत्री मेलानी जोली ने इन छह राजनयिकों को "निष्कासित" करने की घोषणा की। उम्मीदों के मुताबिक ही, भारत ने भी कार्यवाहक उच्चायुक्त सहित नई दिल्ली में तैनात छह वरिष्ठ कनाडाई राजनयिकों को निष्कासित करके जवाबी कार्रवाई की है।
कनाडा की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को समझिए
स्थिति ये है, कि अब, दो ऐसे देशों के बीच संबंधों में लगभग पूरी तरह से खराब हो चुके हैं, जिन्हें दोस्त माना जाता है और कुछ मुद्दों पर तो सहयोगी भी कहा जाता है। जियो-पॉलिटिक्स के लिहाज से इसे अभूतपूर्व घटना कहा जा सकता है।
सिर्फ इतना ही नहीं, 45 मिनट तक चली इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में जस्टिन ट्रूडो और उनके दो कैबिनेट सहयोगी कनाडा में काफी बड़ी संख्या में मौजूद भारतीय प्रवासियों के बीच सांप्रदायिक विभाजन की कोशिश करते दिखे। उन्होंने खुलेआम सिर्फ सिखों और उनके हितों की रक्षा करने की बात कही। उन्होंने ऐसा 'भाषण' दिया, जैसे भारतीय मूल के गैर-सिखों का कोई महत्व ही नहीं है।
हैरानी की बात ये भी है, कि ट्रूडो की ओर से यह अभूतपूर्व कदम कनाडा के प्रमुख दैनिक समाचार पत्र, द ग्लोब एंड मेल में छपी खबरों के बीच आया है, जिसमें कहा गया है कि सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी के कई सांसद प्रधानमंत्री ट्रूडो से, जो अल्पमत सरकार के मुखिया हैं, "पार्टी की भलाई के लिए पद छोड़ने" का अनुरोध करते हुए हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं।
लिहाजा ट्रूडो अब एक नई चुनाव अभियान टीम बनाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि लिबरल पार्टी के चुनावी कैम्पेन डायरेक्टर जेरेमी ब्रॉडहर्स्ट ने एक महीने पहले प्रधानमंत्री से इस्तीफा देने के लिए कहते हुए अपना पद छोड़ दिया था। ट्रूडो के नेतृत्व में, लिबरल्स ने हाल ही में हुए उपचुनावों में हार का सामना किया, खासकर उन निर्वाचन क्षेत्रों में, जिसे पार्टी का गढ़ समझा जाता था।
खालिस्तानी जगमीत सिंह का रोल समझिए
नैनोस रिसर्च पोलिंग के मुताबिक, लिबरल्स अब एनडीपी (न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी) के साथ दूसरे स्थान पर हैं, जबकि कंजर्वेटिव्स 20 अंकों से आगे हैं। पिछले एक साल में ज्यादातर ओपिनियन पोल में जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी काफी पिछड़ती नजर आ रही है।
इसके अलावा, एनडीपी ने ट्रूडो सरकार को अपना औपचारिक समर्थन खत्म कर दिया है, और अब समय-समय पर सिर्फ मुद्दों पर आधारित समर्थन दे रही है। ऐसे में काफी आसानी से समझ में आता है, कि जस्टिन ट्रूडो की अल्पमत सरकार, एनडीपी के समर्थन पर निर्भर है, जिसका नेतृत्व जगमीत सिंह धालीवाल कर रहे हैं।
जगमीत सिंह धालीवाल खालिस्तान समर्थक हैं, जिनका वीजा 2013 में भारत सरकार ने खारिज कर दिया था।
जगमीत सिंह, जो भारतीय मूल के एक सिख हैं, उन्होंने अपना अधिकांश राजनीतिक जीवन ओंटारियो में सांसद के रूप में बिताया है, जहां उन्होंने प्रांत में भारत के 1984 के सिख विरोधी दंगों को नरसंहार के कृत्य के रूप में मान्यता देने के लिए पैरवी की।
ट्रूडो की लिबरल पार्टी के पास देश की संसद में बहुमत से 13 सीटें कम हैं। न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी ब्रिटिश कोलंबिया पर भी शासन कर रही है, जो कनाडा में सिख आबादी का सबसे अधिक ज्यादा वाला प्रांत है, और प्रमुख सिख आबादी वाले प्रांतों अल्बर्टा, ओंटारियो, मैनिटोबा और सस्केचेवान में प्रमुख विपक्षी पार्टी है। लेकिन फिर, यह अजीबोगरीब चुनावी कानूनों ("पे टू प्ले" नामांकन प्रणाली) के तहत है, जिसने कनाडा में सिखों को उनकी संख्या के अनुपात में चुनावी परिणाम हासिल करने में मदद की है।
इन कानूनों के तहत, किसी उम्मीदवार को नामांकित होने के लिए वास्तविक मतदाताओं से बड़ी संख्या में पत्र लाने होते हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे सिख समुदाय के लोग अच्छी तरह से मैनेज करते हैं, जबकि अन्य अल्पसंख्यकों की संख्या निर्वाचन क्षेत्र में सिखों से ज्यादा है, फिर भी वो जीत नहीं पाते हैं। इसलिए, एनडीपी ने हाल के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन किया है (2019 के आम चुनावों में इसने 24 सीटें जीतीं)।
जो भी हो, जब कोई कनाडा में भारतीय प्रवासियों की बात करता है, तो निश्चित तौर पर उनमें सिख सबसे बड़े हैं। कनाडा में भारत के बाहर सबसे बड़ी सिख आबादी है, जो लगभग 800,000 लोग हैं, या देश की आबादी का लगभग 2.1 प्रतिशत है।
लेकिन जब कोई कनाडा में भारतीय मूल के लोगों की बात करता है, तो अगर भारतीय मूल के अन्य लोगों को ध्यान में रखा जाए तो सिखों की संख्या अभी भी कम है। भारतीय कनाडाई लोगों की अनुमानित आबादी लगभग 19 लाख बताई जाती है।
इसके अलावा, सभी कनाडाई सिख खालिस्तान समर्थक नहीं हैं। कनाडा में सिख प्रवासियों में से ज्यादातर के लिए, खालिस्तान कोई "गर्म" मुद्दा नहीं है। टेरी मिल्वस्की, जिन्होंने "ब्लड फॉर ब्लड: फिफ्टी इयर्स ऑफ द ग्लोबल खालिस्तान प्रोजेक्ट (2021)" नामक पुस्तक लिखी है, उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में प्रवासी समुदायों के बीच खालिस्तान के लिए समर्थन काफी कम हो गया है।
यूरो टाइम्स की एक रिपोर्ट में, मिल्वस्की कहते हैं, कि "एक छोटा सा अल्पसंख्यक वर्ग है जो अतीत से चिपका हुआ है, और वह छोटा सा अल्पसंख्यक वर्ग लोकप्रिय समर्थन के कारण महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसलिए है, क्योंकि वे वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों ही तरह के विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। वे समर्थकों को बड़े पैमाने पर लामबंद कर सकते हैं, जो उन राजनेताओं को वोट देंगे जो उनके धुन में गीत गा सकते हैं।"

भारत-कनाडा विवाद पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?
यूरो टाइम्स की रिपोर्ट में ओटावा विश्वविद्यालय में नस्ल संबंधों में विशेषज्ञता रखने वाली अपराध विज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर बलजीत नागरा, मिल्वस्की के विचार से सहमत हैं। उनका कहना है, कि समुदाय का केवल एक छोटा हिस्सा खालिस्तान का समर्थन करता है।
इस बैकग्राउंड में ट्रूडो के आलोचकों का कहना है, कि प्रधानमंत्री कनाडा में भारतीय प्रवासियों को समग्र रूप से देखने के बजाय सिखों के एक चुनिंदा समूह के माध्यम से अपने लिए दीर्घकालिक राजनीतिक लाभ के बारे में नहीं सोच रहे हैं।
स्वाभाविक रूप से, भारत चिंतित है। जैसा कि भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में बताया, ट्रूडो सरकार ने सिख अलगाववादियों के हिंसक कृत्यों को "कनाडा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सामान्य बना दिया है"। उन्होंने कहा, "हमें नहीं लगता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब हिंसा भड़काना है; यह स्वतंत्रता का दुरुपयोग है; यह स्वतंत्रता की रक्षा नहीं है।"
विक्टोरिया विश्वविद्यालय में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर नीलेश बोस के अनुसार - भारत, अलगाववादी आंदोलन में शामिल लोगों द्वारा कभी-कभी प्रदर्शित हिंसक प्रतीकवाद पर सवाल उठाता है। उदाहरण के लिए, भारत के विदेश मंत्री ने जून में ब्रैम्पटन, ओंटारियो में आयोजित एक परेड में एक झांकी को लेकर कनाडा की आलोचना की, जिसमें 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या का महिमामंडन किया गया था।
ट्रूडो के नेतृत्व में कनाडा ने खालिस्तान समर्थक संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) को कनाडा में कई अनौपचारिक जनमत संग्रह कराने की अनुमति दी है, जिसे भारत ने आतंकवादी समूह घोषित किया है। इस समूह ने हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की है और न केवल कनाडा में तैनात भारतीय राजनयिकों को, बल्कि कनाडा के हिंदू राजनेताओं और सांसदों को भी धमकाया है।

कुछ समय पहले, हाउस ऑफ कॉमन्स में नेपियन से संसद सदस्य चंद्र आर्य ने अपने एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट में खुलासा किया था, कि सिख फॉर जस्टिस के अलगाववादी गुरपतवंत सिंह पन्नून ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें धमकी दी गई थी, कि आर्य और उनके हिंदू-कनाडाई दोस्त भारत वापस चले जाएं, क्योंकि उन्होंने (आर्य ने) कनाडा में खालिस्तान समर्थकों द्वारा हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ और अन्य घृणा और हिंसा के कृत्यों की निंदा की थी।
आर्य ने लिखा, कि "हम हिंदू दुनिया के सभी हिस्सों से अपने अद्भुत देश कनाडा में आए हैं। दक्षिण एशिया के हर देश, अफ्रीका और कैरिबियन के कई देशों और दुनिया के कई अन्य हिस्सों से हम यहां आए हैं और कनाडा हमारी भूमि है।"
आर्य लिखते हैं, कि "हमारी भूमि खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा प्रदूषित की जा रही है, जो हमारे कनाडाई चार्टर ऑफ राइट्स द्वारा गारंटीकृत हमारी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर रहे हैं"।
संयोग से, आर्य कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी के ही सांसद हैं।
कनाडा के एक प्रमुख और वैश्विक उद्यमी आदित्य झा, जो ऑर्डर ऑफ कनाडा (देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान) के विशेषाधिकार प्राप्त सदस्य हैं, उन्होंने यूरेशियन टाइम्स को बताया, कि उन्हें मौजूदा घटनाक्रम पर बहुत दुख हो रहा है।
उन्होंने कहा, कि "जस्टिन ट्रूडो को जियो-पॉलिटिक्स में काफी हल्का माना जाता है और उनका अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, सऊदी, भारत और कई विश्व नेताओं की तरफ से बार बार अपमान किया जाता है। भारत और कनाडा के बीच मौजूदा विवाद को परिपक्व, मौन कूटनीति के माध्यम से और अमेरिका और कनाडा के अन्य भागीदारों पर दबाव डालकर संभाला जा सकता था। इसके बजाय, ट्रूडो ने एक सस्ता, राजनीतिक रूप से लाभकारी रास्ता अपनाया और सिर्फ आरोपों के आधार पर भारत को शर्मिंदा करने के लिए सार्वजनिक रूप से सामने आए और कनाडा में अपने चरमपंथी निर्वाचन क्षेत्र को बढ़ावा दिया। उनकी बचकानी कूटनीति की वजह से कनाडा और भारत, दोनों को अरबों डॉलर का नुकसान होगा और चीन के वैश्विक खतरे को रोकने के लिए कनाडा का स्वागत नहीं किया जाएगा।
वहीं, जब कोई भारत को नाराज करके भू-राजनीति की बात करता है, तो ट्रूडो वास्तव में अपनी सरकार की "इंडो-पैसिफिक रणनीति" को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जो इंडो-पैसिफिक में भारत के बढ़ते सामरिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय महत्व को पहचानती है और भारत को कनाडा का एक महत्वपूर्ण भागीदार बनाने की बात करती है।
कनाडा की "इंडो-पैसिफिक रणनीति" कहती है, कि "भारत का सामरिक महत्व और नेतृत्व - पूरे क्षेत्र में और वैश्विक स्तर पर - सिर्फ बढ़ेगा क्योंकि भारत - दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र - दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा और अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाना जारी रखेगा। कनाडा सुरक्षा सहित साझा हितों और मूल्यों के क्षेत्रों में साझेदारी और संवाद में शामिल होने के नए अवसरों की तलाश करेगा।"
लेकिन, अब राजनयिकों के निष्कासन की इस घटना से और भारत के गृहमंत्री तक को 'आरोपी' बनाकर जस्टिन ट्रूडो ने शायद अगले कई सालों के लिए भारत और कनाडा के बीच के डिप्लोमेटिक रास्तो को ब्लॉक कर दिया है।












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