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सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले देश में मस्जिदों पर क्यों लग सकती है बड़ी पाबंदी ? जानिए

जकार्ता, 23 नवंबर: इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। यहां मस्जिदों की संख्या 6 लाख से भी ज्यादा हैं। लेकिन, अब वहां मस्जिदों को ध्वनि प्रदूषण का कारण माना जा रहा है और लाउडस्पीकरों से अजान की आवाज को लेकर खूब विवाद हो रहा है। अब वहां की सबसे बड़ी मुस्लिम उलेमा काउंसिल ने इसमें दखल दिया है और पहले से जारी गाइडलाइंस पर पुनर्विचार का फरमान जारी कर दिया है। वैसे वहां मस्जिदों के लाउडस्पीकरों की आवाज को ठीक करने का काम पहले से ही चल रहा है, लेकिन हाल के समय में बहुत ज्यादा शिकायतें मिलने लगी हैं, जिसके बाद इस तरह का कदम उठाया जा रहा है।

मस्जिदों पर क्यों लग सकती है बड़ी पाबंदी ?

मस्जिदों पर क्यों लग सकती है बड़ी पाबंदी ?

इंडोनेशिया की सर्वोच्च मुस्लिम उलेमा काउंसिल ने मस्जिदों में लाउडस्पिकर के इस्तेमाल की गाइडलाइंस पर पुनर्विचार का फैसला किया है। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश में लोगों ने लाउडस्पीकरों को लेकर काफी चिंताएं जताई हैं और शिकायतें की हैं, उसके बाद उलेमा काउंसिल ने इसमें दखल दिया है। इंडोनेशिया की आबादी 27 करोड़ है, जिसमें 80 फीसदी लोग मुसलमान हैं और वहां मस्जिदों की संख्या करीब 6,25,000 है। इनमें से अधिकतर मस्जिदों में अजान के समय बड़े-बड़े लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल होता है। लेकिन, खराब स्पीकरों और तेज आवाज की वजह से ध्वनि प्रदूषण की शिकायतें बढ़ने लगी हैं।

उलेमा काउंसिल ने जारी किया है फतवा

उलेमा काउंसिल ने जारी किया है फतवा

इंडोनेशिया के धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने 1978 में एक फरमान जारी किया था, जिसमें मस्जिदों में लाउडस्पीकरों के उपयोग को लेकर गाइडलाइंस तय की गई थी। इस महीने इंडोनेशनिया उलेमा काउंसिल ने एक फतवा जारी कर कहा है कि मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए और मतभेदों को रोकने के लिए उस गाइडलाइंस को 'संशोधित' करने की जरूरत है। वहां के धार्मिक मामलों के मंत्री याकूत चोलिल कोउमास ने फतवे का स्वागत करते हुए कहा है, 'लाउडस्पीकरों का समझदारी से उपयोग करने के लिए मस्जिद प्रबंधन को ज्यादा जानकारी उपलब्ध कराना बहुत महत्वपूर्ण है।'

अकेले जकार्ता में 7,000 से ज्यादा मस्जिदें हैं

अकेले जकार्ता में 7,000 से ज्यादा मस्जिदें हैं

काउंसिल के एक नेता और इंडोनेशिया के उपराष्ट्रपति मारूफ अमीन के प्रवक्ता मास्दुकी बैदलोवी ने अरब न्यूज से कहा है कि धार्मिक विद्वानों ने पाया है कि मस्जिदों में लाउडस्पीकरों के अनियंत्रित इस्तेमाल से जनता की परेशानी बढ़ रही है। उन्होंने कहा है कि 'हमने पाया है कि यह एक समस्या बन गई है, खासकर शहरी इलाकों में।' उन्होंने ये भी कहा है कि गाइडलाइंस पहले से ही मौजूद हैं, लेकिन उसपर सही तरीके से अमल नहीं हो रहा है। अकेले जकार्ता में ही करीब 7,000 मस्जिदें हैं। यहां 661.5 वर्ग किलोमीटर के इलाके में 1.10 करोड़ लोग रहते हैं, जिनमें से लगभग 20 फीसदी गैर-मुस्लिम हैं।(दूसरी और तीसरी तस्वीर-एएफपी न्यूज के वीडियो ग्रैब )

'मनमर्जी नहीं करने दे सकते'

'मनमर्जी नहीं करने दे सकते'

काउंसिल के फतवा कमीशन के सेक्रेटरी मिफ्ताहुल हूदा ने अरब न्यूज से कहा है, 'हमें सही ढंग (लाउडस्पीकरों का) से इस्तेमाल करना होगा, हम मनमर्जी नहीं करने दे सकते। ' उन्होंने कहा कि 'भले ही इरादा अच्छा हो, लेकिन, यह परेशान करने वाला हो सकता है और हम नहीं चाहते कि ऐसा हो।' इंडोनेशिया के पूर्व राष्ट्रपति जुसुफ कल्ला ने लगातार लाउडस्पीकरों की आवाज का मुद्दा उठाया है, जो कि इंडोनेशिया मस्जिद काउंसिल के चेयरमैन भी हैं। 2017 से 2022 तक के लिए काउंसिल ने अपने जो मुख्य कार्यक्रम तय किए हैं, उनमें मस्जिदों के लाउडस्पीकरों की आवाज को ठीक करना शामिल है। 52,000 से ज्यादा मस्जिदों में ऐसे बेसुरे लाउडस्पीकरों को ठीक भी किया जा चुका है।

अजान को लेकर होते रहे हैं विवाद

अजान को लेकर होते रहे हैं विवाद

मस्जिदों से लाउडस्पीकरों की तेज आवाज और सुबह के समय अजान से भी पहले उनके इस्तेमाल को लेकर वहां कई विवाद भी हो चुके हैं। एक्ट्रेस जास्किया मेक्का ने इस साल अप्रैल में इंस्टाग्राम पर मस्जिदों के लाउडस्पीकर्स को लेकर सवाल उठाए थे, जिसके बाद उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा था। 2018 के अगस्त में उत्तरी सुमात्रा में एक बौद्ध महिला पर ईशनिंदा का आरोप लगा था और उसे 18 महीने जेल की सजा हुई थी, क्योंकि उसने एक नजदीकी मस्जिद में अजान के समय आवाज को लेकर शिकायत की थी। मई, 2019 में उन्हें पैरोल पर रिहा कर दिया गया था।

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