मुट्ठी भर खालिस्तानी कैसे करते हैं बड़ा हंगामा.. भारत के दोस्त देशों में ही क्यों चलता है एंटी-इंडिया एजेंडा?
India-Canada-Khalistan: खालिस्तानियों को लेकर भारत और कनाडा के संबंध काफी तनावपूर्ण हो गये हैं और कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने बगैर कोई सबूत पेश किए, कनाडा में मारे गये सिख आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के लिए भारत सरकार के एजेंट्स पर आरोप लगा दिया।
इसके बाद कनाडाई विदेश मंत्रालय ने भारत सरकार के डिप्लोमेट को कनाडा से निष्कासित कर दिया, जिसका जवाब देते हुए, भारत ने ना सिर्फ जस्टिन ट्रूडो के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि भारत ने भी कनाडा को जैसे का तैसा जवाब देते हुए एक टॉप कनाडाई डिप्लोमेट को 5 दिनों के अंदर भारत छोड़ने के लिए कहा है।

जिसके बाद भारत और कनाडा के बीच डिप्लोमेटिक रिश्ते में दरार आ गई है। कुछ साल पहले तक भारत और कनाडा के बीच दोस्ताना संबंध थे, लेकिन मौजूदा प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की अलगाववादी और खालिस्तान समर्थक सोच ने दोनों देशों के रिश्तें को खराब कर दिया है।
लेकिन, सवाल ये उठ रहे हैं, कि आखिर मुट्ठी भर खालिस्तानी, इतना बड़ा हंगामा खड़ा करने में क्यों कामयाब हो जाते हैं? आइये समझते हैं।
कनाडा सरकार का खालिस्तानियों का समर्थन
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से खालिस्तानी आतंकवादियों को बाहर निकालने के लिए इंडियन आर्मी की विवादास्पद कार्रवाई ऑपरेशन ब्लूस्टार की 39वीं वर्षगांठ कनाडा में इस साल 6 जून को मनाई गई। कनाडा के ब्रैम्पटन, ओंटारियो में 4 जून को एक परेड का आयोजन किया गया।
5 किमी लंबी परेड की एक झांकी पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की हत्या का जश्न मनाया गया, जिसमें एक महिला को खून से सनी सफेद साड़ी में दिखाया गया, जिसके हाथ ऊपर थे और पगड़ीधारी लोगों ने उस पर बंदूकें तान रखी थीं। घटनास्थल के पीछे एक पोस्टर पर लिखा था, ''दरबार साहिब पर हमले का बदला''।
इस झांकी पर भारत की ओर से तीखी प्रतिक्रिया हुई, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी आपत्ति दर्ज कराई थी।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ साफ शब्दों में कहा, कि "स्पष्ट रूप से, हम वोट बैंक की राजनीति की आवश्यकताओं के अलावा, यह समझने में असमर्थ हैं कि कोई ऐसा क्यों करेगा... मुझे लगता है कि उस स्थान के बारे में एक बड़ा अंतर्निहित मुद्दा है, जो अलगाववादियों, चरमपंथियों, हिंसा की वकालत करने वाले लोगों को दिया जाता है।"
जयशंकर ने जून महीने में नई दिल्ली में संवाददाताओं से कहा था, कि ''मुझे लगता है कि यह रिश्तों के लिए अच्छा नहीं है, कनाडा के लिए अच्छा नहीं है।''
खालिस्तानियों को पालता-पोसता कनाडा
ये कोई पहली बार नहीं था, जब कनाडा में इंदिरा गांधी की हत्या का जश्न मनाया गया हो।
इससे पहले साल 2002 में, टोरंटो स्थित पंजाबी भाषा के साप्ताहिक अखबार "सांझ सवेरा" ने इंदिरा गाधी की मृत्यु की सालगिरह पर उनकी हत्या के कवर फोटो के साथ बधाई दी थी और एक शीर्षक दिया था, जिसमें पाठकों से 'पापी को मारने वाले शहीदों का सम्मान करने' का आग्रह किया गया था।
पत्रिका को सरकारी विज्ञापन मिले और अब यह कनाडा का एक प्रमुख दैनिक अखबार है।
पिछले साल ब्रैम्पटन में, जो कनाडा की सबसे बड़ी सिख आबादी का घर है, खालिस्तान समर्थक संगठन जिसे सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) के नाम से जाना जाता है, उसने खालिस्तान पर एक तथाकथित "जनमत संग्रह" आयोजित किया था। आयोजकों ने दावा किया कि खालिस्तान के समर्थन में 100,000 से ज्यादा लोग आए थे।
इस घटना के बाद भारत सरकार ने कड़ी फटकार लगाई, जिसने कनाडा से किसी भी "भारत विरोधी गतिविधियों" पर रोक लगाने का आग्रह किया था।
भारत सरकार ने कनाडा से उन सभी व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करने के लिए भी कहा, जिन्हें भारत में आतंकवादी घोषित किया गया था। एसएफजे भारत में एक गैरकानूनी संगठन है, और पिछले साल मई में मोहाली में पंजाब इंटेलिजेंस मुख्यालय पर रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड (आरपीजी) हमले से जुड़ा हुआ है।
कनाडा को लंबे समय से खालिस्तान समर्थकों और भारत में आतंकवाद के आरोपी उग्रवादी आवाजों को बढ़ावा देने के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह माना जाता है।
टेरी मिल्वस्की ने अपनी पुस्तक ब्लड फ़ॉर ब्लड: फिफ्टी इयर्स में लिखा है, "खालिस्तानी चुनौती के प्रति नरम कनाडाई प्रतिक्रिया 1982 से ही भारतीय राजनेताओं का लगातार निशाना रही थी, जब तत्कालीन भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने तत्कालीन कनाडाई प्रधान मंत्री पियरे ट्रूडो (जस्टिन ट्रूडो के पिता) से इसके बारे में शिकायत की थी।"
पियरे ट्रूडो, जो 1968 से 1979 तक और फिर 1980 से 1984 तक प्रधान मंत्री थे, कनाडा के वर्तमान नेता जस्टिन ट्रूडो के पिता थे।

कनाडा क्यों देता है खालिस्तान को बढ़ावा?
यह अक्सर भारतीयों की तरफ से पूछा जाने वाला प्रश्न है, कि कनाडाई राजनेता सिख चरमपंथियों को बढ़ावा क्यों देते हैं?
संक्षिप्त उत्तर यह है, कि वैशाखी दिवस पर 100,000 की भीड़ को देखना आसान नहीं है, यह जानते हुए कि यदि आप अपना मुंह बंद रखेंगे, तो वे आपको वोट दे सकते हैं।
टेरी मिल्वस्की ने अपनी किताब में लिखा है, कि "अगर आप अपना मुंह बंद रखते हैं, तो फिर आपको उनका वोट मिल सकता है, लिहाजा फैसला करना काफी आसान है।"
2021 की कनाडाई जनगणना के अनुसार, कनाडा की आबादी में सिखों की हिस्सेदारी 2.1 प्रतिशत है, और यह देश का सबसे तेजी से बढ़ने वाला धार्मिक समूह है। भारत के बाद, कनाडा दुनिया में सिखों की सबसे बड़ी आबादी का घर है।
आज, सिख सांसद और सिख अधिकारी कनाडा सरकार में सभी स्तरों पर काम करते हैं, और उनकी बढ़ती आबादी देश में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है। 2017 में, 39 साल के जगमीत सिंह, किसी प्रमुख कनाडाई राजनीतिक दल के पहले सिख नेता बने, जब उन्होंने वामपंथी झुकाव वाली न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) की कमान संभाली थी।
हालांकि, ऐसा नहीं है, कि सभी कनाडाई सिख खालिस्तान समर्थक हैं। कनाडा में रहने वाले ज्यादातर सिखों के लिए खालिस्तान कोई "गर्म" मुद्दा नहीं है।
मिलेवस्की ने पिछले साल डीडब्ल्यू को बताया था, कि "कनाडाई नेता सिख वोट खोना नहीं चाहते हैं, लेकिन वे गलत सोचते हैं, कि खालिस्तानियों के साथ अल्पसंख्यक सिख समुदाय के सभी लोग जुड़े हुए हैं।"
लेकिन, कनाडा के जस्टिन ट्रूडो जैसे नेता और भारत विरोधी कनाडाई मीडिया, लगातार खालिस्तानियों की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित करते रहते हैं, जिसका मकसद भारत के खिलाफ एक अभियान को छड़ने होता है।
गोरों के देश में ज्यादा समर्थन
खालिस्तानियों को गोरों के देश में काफी समर्थन मिलता है और इसके पीछे की वजह साफ है, कि गोरों के मन में भारतियों कों लेकर घृणा।
एक अलग सिख राज्य की पहली घोषणा संयुक्त राज्य अमेरिका में की गई थी। 12 अक्टूबर 1971 को न्यूयॉर्क टाइम्स में एक विज्ञापन में खालिस्तान के जन्म की घोषणा की गई थी। इसमें कहा गया था, कि "आज हम जीत हासिल होने तक अंतिम धर्मयुद्ध शुरू कर रहे हैं... हम अपने आप में एक राष्ट्र हैं।"
पंजाब में उग्रवाद के चरम पर, पाकिस्तान और चीन अक्सर खालिस्तानी आतंकवादियों को सामग्री सहायता प्रदान करने में शामिल थे। भारतीय सेना ने पाया कि स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों के पास चीनी निर्मित आरपीजी थे, और उन्होंने ऑपरेशन में टैंकों के उपयोग का कारण इन आरपीजी के उपयोग को बताया था।
हालांकि, आज, खालिस्तान आंदोलन को भारत के भीतर सिख आबादी में नहीं के बराबर आवाज मिलती है, लेकिन यह कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में सिख प्रवासी के कुछ हिस्सों में जीवित है। मिलेव्स्की ने प्रवासी भारतीयों के भीतर खालिस्तान के लिए समर्थन को पंजाब की जमीनी हकीकतों से जुड़ाव की कमी के कारण पाया।
मिलेवस्की ने कहा, "(आज) खालिस्तान आंदोलन लोकप्रिय समर्थन के बारे में नहीं है... यह भू-राजनीति के बारे में है। चीन और पाकिस्तान जैसे देश खालिस्तान आंदोलन को इस आधार पर अच्छी तरह बर्दाश्त कर सकते हैं, सब्सिडी दे सकते हैं और विभिन्न तरीकों से सहायता कर सकते हैं, क्योंकि इससे भारत को असहज किया जा सकता है।"












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