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RELOS: इंडियन नेवी का आर्कटिक में सदाबहार एंट्री का सपना टूटा! मोदी-पुतिन नहीं कर पाए समझौता, जानें क्या है?

India-Russia RELOS Deal: अमेरिका के साथ गहरे होते स्ट्रैटजिक समझौते और इंडो-पैसिफिक में बढ़ते सहयोग के बीच भारत, अमेरिका और रूस के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश करने के लिए सालों से मास्को के साथ सैन्य रसद समझौते पर हस्ताक्षर करने की तैयारी कर रहा था, लेकिन ये समझौता नाकाम हो गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब रूस गए, और जिस तरह से राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया, उससे उम्मीद बंधी थी, कि पीएम मोदी की इस यात्रा के दौरान, लंबे समय से प्रतीक्षित Reciprocal Exchange of Logistics Agreement (रसद आदान-प्रदान समझौते यानि RELOS) पर हस्ताक्षर हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

relos agreement

RELOS समझौते के में सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण, बंदरगाह कॉल, मानवीय सहायता और आपदा राहत प्रयासों सहित सैन्य अभियानों के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट शामिल हैं।

रूस और भारत के बीच लंबे समय से रक्षा संबंध रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद, भारत ने 2016 में अमेरिका के साथ इसी तरह का समझौता किया था। इस समझौते के तहत, अगर RELOS समझौते पर हस्ताक्षर किए जाते हैं, तो ये समझौता पांच सालों के लिए वैध होगा, जबतक कि कोई भी देश इसे खत्म करने का फैसला नहीं लेता और अगर कोई देश समझौते से बाहर नहीं आता, तो ये डील ऑटोमेटिक रिन्यू हो जाएगा।

भारत क्यों करना चाहता था RELOS समझौता?

अगर रूस के साथ RELOS समझौता होता, तो इसका सबसे बड़ा फायदा भारतीय नौसेना को होता और इस डील के फाइनल होने के बाद इंडियन नेवी को आर्कटिक में रूसी सैन्य सुविधाओं तक पहुंच प्राप्त हो जाती।

भारत की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर खेती पर निर्भर है और भारत, आर्कटिक के आसपास होने वाले जलवायु परिवर्तन, बढ़ते समुद्री जल स्तर और मानसून पैटर्न से प्रभावित होता है। और पिछले कुछ सालों से आर्कटिक में समुद्र का जल स्तर प्रति दशक 13 प्रतिशत के हिसाब से घट रहा है, लिहाजा भारत चाहता है, कि आर्कटिक में लगातार निगरानी की जाए, ताकि खेती पर पड़ने वाले प्रभाव से निपटने के लिए पहले से ही तैयारी कर ली जाए।

इसके अलावा, आर्कटिक की बर्फ पिघलने से जहाजों की आवाजाही के नये रास्ते खुलेंगे और वैश्विक समुद्री व्यापार का नया नक्सा तैयार होगा। वहीं, भारत रूस के साथ अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर (INSTC) विकसित करना चाहता है, और इसे आर्कटिक से जोड़कर ट्रांस-आर्कटिक शिपिंग मार्ग बनाना चाहता है, ताकि शिपिंग लागत को कम किया जा सके।

जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है, कि RELOS दोनों देशों के लिए फायदेमंद है और उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में एक-दूसरे की मौजूदगी को प्रोत्साहित करना चाहिए। RELOS हिंद महासागर क्षेत्र में काम करने वाली रूसी नौसेना और आर्कटिक में भारतीय नौसेना की मदद करेगा।

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RELOS से भारतीय नौसेना को सामरिक फायदा

यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में भारतीय नौसेना के अनुभवी पनडुब्बी चालक कैप्टन अनुराग बिसेन (रिटायर्ड) ने कहा है, कि "इससे (RELOS) दोनों नौसेनाओं के बीच रूस के व्लादिवोस्तोक में मुख्यालय वाले रूसी प्रशांत बेड़े और विशाखापत्तनम में स्थित भारत के पूर्वी बेड़े के बीच संस्थागत सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।"

उन्होंने कहा, कि "दोनों देश इस समझौते के तहत एक-दूसरे के मुख्यालय में संपर्क अधिकारी (Los) तैनात करके जानकारियों का फायदा उठा सकते हैं।"

रिटायर्ड कैप्टन अनुराग बिसेन ने कहा, कि ये कुछ ऐसे हो सकता है, जैसे भारतीय नौसेना ने अमेरिका के हवाई वाले मुख्यालय INDOPACOM और बहरीन में अमेरिकी नेतृत्व वाली बहुराष्ट्रीय समुद्री सेना, संयुक्त समुद्री सेना (CMF) में LOs तैनात किए हैं और इससे दोनों ही देश फायदा उठाते हैं।"

रिटायर्ड कैप्टन अनुराग बिसेन वो अधिकारी हैं, जिन्होंने मार्च 2022 में भारत सरकार द्वारा जारी भारत की आर्कटिक पॉलिसी की अनुमोदन प्रक्रिया का मसौदा तैयार करने और कॉर्डिनेट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

रिटायर्ड कैप्टन बिसेन के मुताबिक, "इस समझौते से भारतीय नौसेना और रूसी नौसेना को व्हाइट शिपिंग इन्फॉर्मेशन शेयरिंग समझौते पर हस्ताक्षर करने में भी मदद मिलेगी, जैसा कि भारतीय नौसेना ने 36 अन्य नौसेनाओं के साथ किया है। RELOS पर हस्ताक्षर करने से भारतीय नौसेना को चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे (CVMC) की सुरक्षा में भी मदद मिलेगी, जब यह पूरी तरह से चालू हो जाएगा।"

लेकिन, भारत और रूस के बीच हुए शिखर सम्मेलन में इस समझौते पर सहमति नहीं बन पाई और दोनों देशों के बीच ये महत्वपूर्ण समझौता नहीं हो पाया।

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