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पाकिस्तानी पायलट ने कैसे मार गिराया था इजराइली फाइटर जेट, 1974 की वो खतरनाक कहानी जानिए

How Pakistani Pilot Shot Down Israeli Fighter Jet: सैन्य इतिहास की कई कहानियां ऐसी होती हैं, जिनका जिक्र सालों बाद भी किया जाता है, भले ही वो कहानी, किसी दुश्मन मुल्क के किसी लड़ाकू योद्धा की ही क्यों ना हो।

ऐसी ही एक घटना आधी सदी पहले 26 अप्रैल 1974 को घटी थी, जब पाकिस्तान के पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट सत्तार अल्वी ने सीरियाई वायु सेना के लिए मिग विमान उड़ाते हुए एक इजरायली लड़ाकू जेट को मार गिराकर एक दुर्लभ उपलब्धि हासिल की थी।

How Pakistani Pilot Shot Down Israeli Fighter Jet

कैसे गिराया था इजराइल का लड़ाकू विमान?

पाकिस्तान के किसी पायलट की इजराइली सेना के साथ हुई ये दुर्लभ मुठभेड़ 1967 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद की है। उस संघर्ष में इजराइल ने फौरन ही कम के कम पांच मुस्लिम देशों को धूल चटाकर मिडिल ईस्ट और दुनिया की राजनीति को बदल दिया था। इस युद्ध के बाद ही इस्लामिक देशों ने ये कबूल कर लिया, कि वो कभी भी युद्ध के मैदान में इजराइल को परास्त नहीं कर सकते हैं।

लेकिन, इजराइल से बुरी तरह शिकस्त ने इस्लामिक देशों को अपमानित कर दिया था और उन्हें ये हार पच नहीं पा रही थी।

हालांकि, युद्ध तो चंद दिनों में ही खत्म हो गया, लेकिन तनाव बना रहा और छह साल बाद, 1973 के योम किप्पुर युद्ध के दौरान यह क्षेत्रीय संघर्ष एक बार फिर जंग के मैदान में तब्दील होने की स्थिति में आ गया। इजराइल ने खुद को मिस्र और सीरिया के नेतृत्व वाले अरब राज्यों के गठबंधन के खिलाफ तीव्र लड़ाई में उलझा हुआ पाया, जिसमें पाकिस्तान भी अप्रत्याशित रूप से शामिल हो गया।

जब ये तनाल भड़क उठा, तो सत्तार अल्वी सहित कई पाकिस्तानी वायु सेना के पायलटों ने युद्ध में शामिल होने के लिए स्वेच्छा से भाग लिया, हालांकि पाकिस्तान ने सीधे तौर पर इस जंग में उलझने से दूर रहा। लेकिन, कई पाकिस्तानी पायलट्स इस युद्ध में भाग लेने के लिए चले गये।

उस वक्त पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो थे, जिन्होंने पाकिस्तानी पायलटों को मध्य पूर्व में भेजने के निर्णय का समर्थन किया था, जिसका मकसद अरब देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना था।

एक इंटरव्यू में पायलट अल्वी ने बताया, कि कैसे सीरिया के राष्ट्रपति हाफिज अल-असद के साथ पाकिस्तानी वायु सेना प्रमुख की बातचीत ने युद्ध प्रयास में उनकी भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया था।

उन्होंने कहा, "मैंने अपना एक सलवार कमीज और फ्लाइंग गियर लिया और जब हम पेशावर पहुंचे तो हमें पता चला, कि 14 और लोगों ने भी स्वेच्छा से जंग में जाने का फैसला किया है। हमें चीफ के फोकर जहाज पर बिठाया गया और थोड़ी देर बाद चीफ भी आ गये। हमें कोई अंदाजा नहीं था, कि हम कहां जा रहे हैं।"

पाकिस्तानी पायलटों को एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा गया था, जिसमें कहा गया था, कि विदेश में युद्ध के दौरान यदि उनकी मौत हो जाती है, या वो पकड़े जाते हैं, तो न तो पाकिस्तान सरकार और न ही पाकिस्तानी वायु सेना उनकी ज़िम्मेदारी लेगी।

सत्तार अल्वी के मुताबिक, दस्तावेज पर साइन करने के बाद उन्हें जंग में जाने की इजाजत दे दी गई।

इसके बाद, पायलटों को C-130 विमान के जरिए कराची और फिर बगदाद पहुंचाया गया। बगदाद से, सत्तार अल्वी और उनके साथी सड़क मार्ग से जॉर्डन और अंत में सीरिया के दमिश्क की की तरफ बढ़े।

16 पाकिस्तानी पायलटों में से आठ पायलटों को मिस्र भेज दिया गया, जबकि बाकी आठ को सीरिया में रहने का निर्देश दिया गया। सत्तार अल्वी उन लोगों में से थे, जिन्हें सीरिया में रहने का निर्देश दिया गया था।

बाद में, अल्वी और उनके साथी पायलटों को दमिश्क से लगभग 30 मिनट की दूरी पर स्थित दामिर हवाई अड्डे पर भेज दिया दगया, जहां उन्हें 67ए इकाई के रूप में नामित किया गया था।

पाकिस्तानी पायलटों के सामने बड़ी चुनौती

जब वे पहुंचे, तब तक मिस्र और इजराइल पहले ही युद्धविराम समझौते पर पहुंच चुके थे, जिससे सीरिया इजराइल के साथ युद्ध में अकेला रह हया। फिर भी, पाकिस्तानी पायलटों ने जंग में बने रहने का फैसला किया। लेकिन, पाकिस्तानी पायलटों के लिए सीरिया की भाषा समझना काफी मुश्किल था।

सत्तार अली को रूसी निर्मित मिग-21 विमान को उड़ाने का काम सौंपा गया था, उसमें रूसी भाषा में फाइटर जेट को लेकर जानकारियां थीं, जबकि रडार और हवाई यातायात नियंत्रण के साथ कम्युनिकेश की भाषा अरबी थी।

लिहाजा, भाषा की समस्या को दूर करने के लिए पायलटों ने एक कागज पर वो तमाम जरूरी बातें लिखी, जो उन्हें फ्लाइट के ऑपरेशन के दौरान बोलनी थी। और उन्हें अपने फ्लाइंग सूट में एक कागज के टुकड़े पर रख लिया। इससे हम एक सप्ताह के भीतर वो जरूरी अरबी भाषा को समझने में सक्षम हो गए। पाकिस्तान के पायलटों को सीरियाई हवाई क्षेत्र का उल्लंघन करने वाले इजराइली विमानों को रोकने की जिम्मेदारी सौंपी गई। मिस्र और इजराइल के बीच युद्धविराम के बावजूद, गोलान हाइट्स क्षेत्र में संघर्ष जारी था।

वहीं, पाकिस्तानी पायलटों ने तय किया, कि चाहे वे इजराइली विमान को मार गिराने में सफल हों या नहीं, लेकिन कोई भी पाकिस्तानी पायलट पकड़ा न जाए। और यह निर्णय उनकी हवाई रणनीति का आधार बना।

इजराइली जेट को कैसे मार गिराया?

26 अप्रैल 1974 को सत्तार अल्वी, जो फ़्लाइट लेफ्टिनेंट के रूप में सेवारत थे, उन्होंने एक SAF मिग-21F-13 (सीरियल नंबर 1863) को ऑपरेट किया, जब वह डुमायर एयर में तैनात नंबर 67A स्क्वाड्रन, सीरियाई वायु सेना (SAF) के दूसरे बेस पर मौजूद थे।

सत्तार अल्वी सहित आठ पाकिस्तानी पायलटों ने लेबनान पर एक खतरनाक हवाई मुठभेड़ के दौरान शाहबाज़ 8 का गठन किया। अल्वी ने याद किया, कि कैसे संचार खोने से कुछ क्षण पहले फॉर्मेशन कमांडर ने उन्हें इजरायली विमान के आने के बारे में बताया था।

सत्तार अल्वी ने कहा, कि उन्होंने एक चमकती हुई वस्तु को पृथ्वी की ओर उतरते हुए देखा, जिसे उन्होंने इजरायली मिराज युद्धपोत के रूप में पहचाना।

सत्तार अल्वी ने कहा, कि उस इजराइली जेट में तेल खत्म होने वाला था और वो तेजी से आगे बढ़ रहा था, जबकि कुछ और इजराइली जेट उसे फॉलो कर रहे थे। उनके पास समय काफी कम था। और जैसे ही इजरायली पायलट ने बचने की कोशिश की, मौका देखकर सत्तार अल्वी ने अपनी रूसी निर्मित मिसाइल दाग दी। लेकिन, वो मिसाइल चली ही नहीं। हालांकि, उन्होंने जब फिर से फायर की, तो मिसाइल इजराइसी जेट से टकरा गई और इजराइली मिसाइल नीचे गिर गई।

जिसके बाद, अल्वी को उनकी वीरतापूर्ण कार्रवाई के लिए सीरियाई सरकार का सर्वोच्च सम्मान मिला। इस घटना में इजराइली पायलट बुरी तरह से घायल हो गये थे, जिनकी इलाज के दौरान मौत हो गई।

हालांकि, अपने इस मिशन को लेकर सत्तार अल्वी सालों तक चुप रहे, लेकिन जब पाकिस्तान सरकार ने खुद इसका खुलासा किया और उन्हें स्टार ऑफ़ करेज से सम्मानित किया, उसके बाद उन्होंने इस मुठभेड़ की कहानी सुनाई। हालांकि, इस घटना का कहीं कोई जिक्र नहीं है और इजराइल की रिपोर्ट्स में भी इस तरह के किसी मुठभेड़ का कोई जिक्र नहीं है और नाही उस पायलट के कहीं मारे जाने का ही जिक्र है, जिसका नाम सत्तार अल्वी ने कैप्टन लुत्ज बताया था।

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