Explainer: अमेरिका में नहीं गली पाकिस्तानी सेना प्रमुख की दाल, भारत के प्लान-2026 से फेल हुई 'कश्मीर नीति'
Pakistan Kashmir India: कश्मीर पर इस्लामाबाद के रुख के लिए अमेरिका का समर्थन हासिल करने की पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर की कोशिश बुरी तरह फेल हो गई है, क्योंकि बाइडेन प्रशासन ने इस "द्विपक्षीय" मुद्दे पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख के तर्कों का समर्थन करने से इनकार कर दिया है।
अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों से ऐसे किसी भी मुद्दे (जम्मू-कश्मीर) पर चर्चा नहीं करने को कहा, जिसे द्विपक्षीय रूप से हल किया जाना है। द संडे गार्जियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी आर्मी चीफ मुनीर की अमेरिकी यात्रा पर करीबी नजर रखने वाले राजनयिकों ने बताया है, कि अमेरिका ने उनसे उन आतंकी तत्वों के खिलाफ कड़ी और विश्वसनीय कार्रवाई करने के लिए कहा है, जो अभी भी पाकिस्तान की धरती और क्षेत्र के अन्य हिस्सों में सक्रिय हैं।
पाकिस्तान सेना प्रमुख के रूप में अमेरिका की अपनी पहली आधिकारिक यात्रा में, जनरल असीम मुनीर ने अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी जे ब्लिंकन और रक्षा सचिव जनरल लॉयड जे ऑस्टिन सहित शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात की है।

पाकिस्तान को अमेरिका में बड़ा झटका
सूत्रों ने कहा है, अमेरिकी विदेश मंत्री के साथ बातचीत में पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल मुनीर ने कश्मीर मुद्दा उठाने की कोशिश की, लेकिन इस पर उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। सूत्रों ने कहा, कि "जब मुनीर ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बरकरार रखने के नतीजों पर चर्चा करने की मांग की, तो अमेरिकी अधिकारियों ने उनकी बात नहीं सुनी। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाया जाना, जो पाकिस्तान के लिए एक झटका है, जनरल मुनीर उसे लेकर बात करना चाहते थे।"
एक अधिकारी ने कहा, कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख एक निजी बातचीत में कश्मीर मामले पर सचिव ब्लिंकन से अनुकूल प्रतिक्रिया चाहते थे, ताकि वह इसका इस्तेमाल कुछ ब्राउनी प्वाइंट हासिल करने के लिए कर सकें।
द संडे गार्जियन की एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है, कि "बाइडेन प्रशासन ने वही दोहराया, जो भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने हाल ही में कहा था। अमेरिकी दूत ने कहा था, कि कश्मीर विवाद को भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय रूप से हल किया जाना चाहिए, न कि अमेरिका सहित किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के माध्यम से।"
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने न केवल कश्मीर मुद्दे पर मुनीर को नजरअंदाज किया, बल्कि उन्हें आतंकवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के लिए भी कहा है और इसका श्रेय भारतीय राजनयिक प्रतिष्ठान को जाता है, जिसने आतंकवाद के खिलाफ भारत की "शून्य सहिष्णुता" नीति को काफी सख्ती से अपनाया है।
मोदी सरकार की 'ज़ीरो टेरर नीति'
6 दिसंबर को राज्यसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं को समाप्त करने के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की "जीरो टेरर" नीति का अनावरण किया, जिससे राजनयिकों को आतंकवाद के खिलाफ स्क्रिप्ट तैयार करने और अमेरिका सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान केंद्रित करने में मदद मिली।
भारत ने इस दौरान अमेरिका और दुनिया को समझाया है, कि क्षेत्र में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का खतरा कितना ज्यादा बढ़ा हुआ है।
गृह मंत्री का बयान, जनरल मुनीर की अमेरिका यात्रा से कुछ दिन पहले ही आया है। गृह मंत्री अमित शाह का संदेश, कि कैसे मोदी सरकार जम्मू-कश्मीर और पूरे क्षेत्र को, पाकिस्तान द्वारा भेजे जा रहे आतंकवादियों से छुटकारा दिलाने की नीति पर गंभीरता से काम कर रही है, अमेरिकी प्रशासन में अच्छी तरह से स्वीकार किया गया है, क्योंकि भारतीय राजनयिकों ने इसे प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
वाशिंगटन में राजनयिक कम्युनिकेशन और चैनलों के एक सूत्र ने कहा, कि "पाकिस्तान की सीमा पार से आतंकवादियों द्वारा घुसपैठ की हालिया घटनाओं के सबूत भी बाइडेन प्रशासन के अधिकारियों के साथ साझा किए गए थे।"
जम्मू-कश्मीर में तीन साल में आतंकी घटनाओं की संख्या शून्य तक करने की योजना पर तेजी से काम चल रहा है और यह 2026 तक पूरी तरह सफल हो जाएगी। अधिकारियों ने कहा, कि "यह मुद्दा इतना महत्वपूर्ण था, कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अपने राजनयिक नेटवर्क के माध्यम से इस पर बारीकी से नजर रख रहा है।" उन्होंने कहा, "इससे राजनयिकों को अमेरिका सहित विभिन्न प्लेटफार्मों पर संदेश को सुचारू रूप से फैलाने में मदद मिली है।"
जब मुनीर अभी भी अमेरिका में थे, तो संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ने संयुक्त राष्ट्र से आतंकवादी समूहों और उनके प्रायोजकों (पाकिस्तान) के खिलाफ शून्य सहिष्णुता बरतने का आह्वान किया।

भारत का लक्ष्य 2026 क्या है?
यह संदेश संयुक्त राष्ट्र के मंच से अमेरिका के लिए भी था, जो सीमा पार आतंकवाद को एक प्रमुख मुद्दे के रूप में उजागर करने की भारत की रणनीति का हिस्सा है, जिसे वैश्विक समुदाय को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। भारत के "जीरो टेरर पॉलिसी" के पूर्ण कार्यान्वयन के लिए 2026 के लक्ष्य ने पाकिस्तान को परेशान कर दिया है।
अमेरिका में कश्मीर मुद्दे को उठाने की मुनीर की कोशिश इस्लामाबाद की इस मुद्दे पर चल रही निराशा का नतीजा थी।
इस्लामाबाद की हताशा को दर्शाने वाले एक अन्य उदाहरण में, पाकिस्तान इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के उस बयान के पीछे था, जिसने इस सप्ताह के शुरू में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए संसद के विवेक को बरकरार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की थी। भारत ने इस बयान को तुरंत खारिज कर दिया।
पाकिस्तान के ख़िलाफ़ परोक्ष हमला करते हुए, नई दिल्ली ने आरोप लगाया है, कि ओआईसी का बयान "मानवाधिकारों के सिलसिलेवार उल्लंघनकर्ता और सीमा पार आतंकवाद के एक बेपरवाह प्रमोटर" के इशारे पर जारी किया गया था।
सूत्रों का कहना है, कि "पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है, कि भारत की नजर अब पीओके पर है क्योंकि यह आतंकी शिविरों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बना हुआ है। पाकिस्तान को शायद यह लग रहा है, कि भारत की जीरो टेरर नीति में पीओके के खिलाफ कुछ कार्रवाई शामिल हो सकती है।"
लिहाजा, अचानक पाकिस्तान के कई बड़े नेताओं ने कश्मीर का मुद्दा तेजी से उठाना शुरू कर दिया है। पाकिस्तान के अंतरिम प्रधानमंत्री अनवरूल हक काकर भी पिछले एक हफ्ते में कम से कम तीन बार कश्मीर राग अलाप चुके हैं और ऐसा भारत की ज़ीरो टेरर पॉलिसी की वजह से हो रहा है।
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