20 साल में अमेरिका ने अफगानिस्तान में खर्च किए कितने लाख करोड़ रुपए?
वॉशिंगटन डीसी, 17 अगस्त: दो दशक में अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने लाखों करोड़ रुपये रुपये लगाए हैं। यही नहीं एक मोटी रकम अमेरिका को अभी न जाने कितने दशक और अफगानिस्तान को लेकर खर्च करने पड़ सकते हैं। लेकिन, अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था आज भी दुनिया में सबसे फिसड्डियों में शामिल है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका ने वहां जो पैसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगाए हैं, वह बेकार हो गए हैं। लेकिन, सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि उनका भविष्य क्या होगा ? ऊपर से अमेरिका के इस तरह से वहां से निकलने के बाद एक बार फिर से वहां ड्रग्स के अवैध कारोबार के फलने-फूलने की आशंका अलग बढ़ गई है। 20 वर्षों में अमेरिका ने जितनी रकम अफगानिस्तान पर खर्च किए हैं, उन्हें अगर हम भारतीय रुपयों से तुलना करें तो आपको अंदाजा लग सकता है कि अमेरिका को अपनी अफगान नीति की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है।

अमेरिका ने अपने इतिहास का सबसे लंबा युद्ध लड़ा
बीते 20 वर्षों में अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपने इतिहास का सबसे लंबा जंग लड़ा है। इन दो दशकों में उसे इस जंग की जो कीमत चुकानी पड़ी है, उसे शब्दों में समेटा मुश्किल है। उसने अपने सैनिकों की जितनी जानें गंवाई हैं, उसका कोई मोल नहीं लगा सकता। लेकिन, इतना सबकुछ लुटाने के बाद भी रविवार से काबुल की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वह खुद को सुपर पावर समझने वाले अमेरिका के लिए शर्मनाक है। अमेरिका ने जब अपने सैनिकों को अफगानिस्तान अभियान पर भेजा था, तब मोटे तौर पर उसके दो ही मकसद नजर आ रहे थे। वहां एक उदारवादी लोकतंत्र स्थापित करना चाह रहा था और उस देश को आतंकवाद की शरणस्थली नहीं बनने देना चाहता था। आज जब वह एक बेआबरू की तरह वहां से बाहर निकल रहा है तो हम यह आंकलन करने बैठे हैं कि मूल उद्देश्यों में नाकाम रहे अमेरिका के इस मिशन पर कितनी लागत आई है।
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अमेरिका ने अफगानिस्तान में खर्च किए कितने लाख करोड़ रुपए?
ब्राउन यूनिवर्सिटी ने अमेरिका के इस अराजक और अपमानजनक अंत वाले इस सैन्य अभियान में निवेश का जो हिसाब लगाया है, वह 2.26 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर बैठता है। अगर भारतीय रुपयों में गिनती करें तो यह रकम 148.64 लाख करोड़ रुपये होती है। अमेरिका ने इतनी बड़ी रकम अफगानिस्तान में किन-किन चीजों पर खर्च किए हैं, इसका ब्योरा देखने से पहले 148.64 लाख करोड़ रुपये कितनी बड़ी रकम है, उसे समझ लीजिए। 15 अगस्त को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 100 लाख करोड़ रुपये की प्रधानमंत्री गतिशक्ति- नेशनल मास्टर प्लान का ऐलान किया है। पीएम मोदी ने कहा, "सौ लाख करोड़ से भी अधिक की यह योजना लाखों नौजवानों के लिए रोजगार के नए अवसर लेकर आने वाली है। गतिशक्ति हमारे देश के लिए एक ऐसा नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान होगा जो होलिस्टिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव रखेगा। हमारी इकोनॉमी को एक इंटीग्रेटेड और होलिस्टिक पाथवे देगा।" अंदाजा लगा लीजिए कि भारत जितने बड़े देश में इस रकम से दशकों तक कायाकल्प करने की योजना है और अमेरिका ने उससे डेढ़ गुनी ज्यादा रकम अफगान में खर्च किए हैं।

रक्षा बजट पर खर्च किए 74.32 लाख करोड़ रुपये
अमेरिका ने कुल रकम में से आधी यानी 74.32 लाख करोड़ रुपये सिर्फ अफगानिस्तान के लिए रक्षा बजट पर दो दशकों में खर्च किए हैं। जबकि 530 करोड़ अमेरिकी डॉलर सिर्फ वॉर फंड पर दी गई ब्याज की रकम का अनुमान है। यह सिलसिला यहीं नहीं रुकता। अमेरिका ने इन वर्षों में रक्षा बजट के लिए 443 करोड़ अमेरिकी डॉलर अतिरिक्त खर्च किए हैं, ऊपर से 296 करोड़ अमेरिकी डॉलर रिटायर सैनिकों की स्वास्थ्य सहायता और दिव्यांगता की स्थिति में सुविधाएं देने के लिए खर्च किए हैं। वहीं 144 करोड़ अमेरिकी डॉलर से उसने इन बीते वर्षों में अफगानिस्तान का पुनर्निमाण भी कराया है।

148 रुपये से खर्च जुटाती है 90 फीसदी जनता
दुखद पहलू ये है कि लाखों करोड़ डॉलर निवेश के बावजूद अफगानिस्तान इस धरती की सबसे छोटी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। पिछले साल तत्कालीन अफगानी राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कहा था कि वहां की 90 फीसदी आबादी रोजाना महज 148 रुपये की कमाई पर ही निर्भर है। ये बात अलग है कि जब नागरिकों को उनकी किस्मत के भरोसे छोड़कर वे खुद भागने लगे तो चार कारों और हेलीकॉप्टर में भी कैश भर कर ले गए। तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद एक बार यहां की अर्थव्यवस्था में फिर से अफीम और हेरोइन के अवैध कारोबार को गति मिलने की आशंका है, जो आतंकवाद के फलने-फूलने में मददगार तो है ही, मानवता की रीढ़ तोड़ने का भी बड़ा खतरनाक हथियार है।












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