टूट गई अकड़? रूस के सामने हनक दिखाने वाला जर्मनी घुटनों पर आया, चांसलर स्कोल्ज ने क्यों मिलाया पुतिन को फोन?
Germany-Russia Relation: 24 फरवरी 2022 को यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद जर्मनी उन कुछ यूरोपीय देशों में शामिल था, जिसने राष्ट्रपति व्लादिमीर के खिलाफ जमकर जहर उगला था और उसने रूस के साथ महत्वपूर्ण नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन के काम को भी बंद कर दिया, जिसे बाद में उड़ा दिया गया। (किसने उड़ाया, इसका पता अभी तक नहीं चल पाया)
लेकिन, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के दो सालों के बाद अब लगता है, कि जर्मनी की अकड़ टूट गई है और जर्मनी के चांसलर ओलाफ स्कोल्ज ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को फोन मिलाया है। रूस और जर्मनी के नेताओं के बीच लगभग दो वर्षों में पहली बार बातचीत हुई है और ये बातचीत उस वक्त हुई है, जब अमेरिका में बाइडेन प्रशासन की विदाई हो गई है और जनवरी में ट्रंप प्रशासन सत्ता संभालने वाला है।

ट्रंप प्रशासन ने यूक्रेन युद्ध खत्म करने के संकेत दे दिए हैं और माना जा रहा है, कि पर्दे के पीछे से रूसी अधिकारियों के साथ ट्रंप प्रशासन ने बातचीत भी शुरू कर दी है।
जर्मन चांसलर ओलाफ स्कोल्ज ने शुक्रवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक फोन कॉल की शुरुआत की, जो कथित तौर पर लगभग एक घंटे तक चली और यूक्रेन युद्ध के विभिन्न पहलुओं पर केंद्रित थी।
जर्मनी की स्थिति को समझिए
स्कोल्ज, जो अपने सरकार के गठबंधन के टूटने के बाद फरवरी में अचानक चुनाव करवाने के लिए मजबूर हुए हैं, उनकी पार्टी पर चुनावी सफाये का खतरा मंडरा रहा है और जर्मन सरकार के प्रवक्ता स्टीफ़न हेबेस्ट्रेट ने एक बयान में कहा, कि स्कोल्ज ने पुतिन से यूक्रेन के साथ "न्यायपूर्ण और स्थायी शांति" प्राप्त करने के मकसद से बातचीत करने का आग्रह किया।
उन्होंने यूक्रेन के लिए "जब तक आवश्यक हो, तब तक" जर्मन समर्थन भी व्यक्त किया, यूक्रेनी बुनियादी ढांचे पर रूसी हमलों की निंदा की, और चेतावनी दी, कि कुर्स्क पर यूक्रेनी हमले से लड़ने के लिए रूसी धरती पर हजारों उत्तर कोरियाई सैनिकों की तैनाती युद्ध को आगे ले जा सकता है।
जिसपर पुतिन ने कहा, कि मौजूदा संकट नाटो की आक्रामक नीतियों का प्रत्यक्ष परिणाम है, जिसे क्रेमलिन ने "विचारों का विस्तृत और स्पष्ट आदान-प्रदान" बताया। रूसी नेता ने कहा, "संभावित समझौतों में सुरक्षा के क्षेत्र में रूसी संघ के हितों को ध्यान में रखना चाहिए, नई क्षेत्रीय वास्तविकताओं से आगे बढ़ना चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संघर्ष के मूल कारणों को खत्म करना चाहिए।"
इसके अलावा, पुतिन और स्कोल्ज ने कथित तौर पर द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा की, जिसमें पुतिन ने कहा, कि मास्को ऊर्जा व्यापार सहित "पारस्परिक रूप से लाभकारी सहयोग" के लिए तैयार है, यदि बर्लिन भी यही दृष्टिकोण रखता है।

क्यों घुटनों पर आ गया है जर्मनी?
यूक्रेन युद्ध से पहले जर्मनी के रूस के साथ अच्छे रिश्ते थे और पूर्व चांसलर एंजला मर्केल और राष्ट्रपति पुतिन के बीच काफी घनिष्ठ संबंध हुआ करते थे, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद जर्मनी ने अमेरिका और अपने यूरोपीय सहयोगियों के सुर में सुर मिलाए और रूस के खिलाफ लगाए गये प्रतिबंधों में शामिल हो गया।
जर्मनी ने रूस से तेल और गैस खरीदना बंद कर दिया, जबकि जर्मनी के लिए रूसी गैस काफी ज्यादा महत्वपूर्ण था, क्योंकि जर्मनी में काफी ठंढ पड़ती है और अपने घरों को गर्म रखने के लिए लोग गैस का इस्तेमाल करते हैं। वहीं, जर्मनी की अर्थव्यवस्था काफी खराब हो रही है और उसे यूरोप का 'बीमारू देश' कहा जाने लगा है। देश की राजनीति में उथल पुथल मची है और माना जा रहा है, कि सियासी हालात और खराब होंगे, और इस बीच व्हाइट हाउस में ट्रंप की एंट्री ने देश के लिए मुश्किलें और भी ज्यादा बढ़ा दी हैं।
ट्रंप के आने के बाद टैरिफ लगने से अमेरिका में बिकने वाले जर्मन सामान महंगे हो जाएंगे, वहीं टैरिफ की वजह से चीनी सामानों के महंगे होने से जर्मनी में बिकने वाले चीनी सामान भी महंगे हो जाएंगे और जर्मनी में फिलहाल इतनी हिम्मत नहीं हैं, कि वो महंगाई झेल सके।
जर्मनी की स्थिति कितनी विकराल हो चुकी है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि कार कंपनी वोक्सवैगन को मजबूर होकर जर्मनी में अपनी तीन फैक्ट्रियां बंद करनी पड़ी हैं और उसने भारी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी की घोषणा भी की है।

यूक्रेन को पसंद नहीं आया स्कोल्ज-पुतिन की बातचीत
ओलाफ स्कोल्ज और व्लादिमीर पुतिन के बीच टेलीफोन पर हुई ये बातचीत यूक्रेन को बिल्कुल भी पसंद नहीं आई है, क्योंकि रूसी सेना पूर्वी यूक्रेन के कई इलाकों में आगे बढ़ रही है। डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में फिर से चुने जाने से कीव को अमेरिकी सहायता के भविष्य पर भी सवाल उठते हैं।
यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने कहा है, कि इस कॉल ने रूसी नेता को अलग-थलग करने के प्रयासों को कमजोर करके "पेंडोरा का पिटारा" खोल दिया है। उन्होंने कहा, कि "अब अन्य बातचीत, अन्य कॉल हो सकते हैं। बस बहुत सारे शब्द। और यह वही है, जो पुतिन लंबे समय से चाहते थे: उनके लिए अपने अलगाव को कम करना बेहद महत्वपूर्ण है।"
पुतिन के साथ कॉल से पहले और बाद में स्कोल्ज ने ज़ेलेंस्की से भी बात की।
इस फोन कॉल को मुख्य रूप से ट्रंप के फिर से चुने जाने और जर्मनी में आगामी चुनाव के संबंध में देखा जा रहा है।
जर्मनी में 100 दिनों में संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं और यूक्रेन युद्ध ने जर्मनी की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया है और जर्मनी, खासकर पूर्वी जर्मनी के लिए यूक्रेन युद्ध को खत्म होते हुए देखना चाहते हैं। इसके अलावा, देश की एक बड़ी आबादी में यूक्रेन को दिए जाने वाले जर्मनी फंड और हथियारों की सप्लाई को लेकर काफी नाराजगी है और इसका असर ओलाफ स्कोल्ज के चुनावी नतीजों पर होने की संभावना है।
यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिकी की स्थिति फिलहाल कनफ्यूज करने वाली है। जर्मनी में कार्यभार संभालने वाले ट्रंप प्रशासन ने जहां युद्ध खत्म करने की बात कही है, वहीं बाइडेन प्रशासन ने यूक्रेन की मदद को बढ़ाने की घोषणा कर दी है।
ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि जर्मनी आने वाले समय में एक बार फिर से रूस के साथ अपने कारोबार को शुरू करने का फैसला करे और यूरोपीय प्रतिबंधों से बाहर निकल आए। ये यूरोप और अमेरिका के रूस के खिलाफ शुरू किए गये आर्थिक युद्ध के लिए बहुत बड़ा झटका होगा और पश्चिमी गठबंधन का टूटना माना जाएगा। जर्मन चांसलर का फोन कॉल, पुतिन के लिए एक जीत की तरह है, क्योंकि जर्मनी जी7 का सदस्य है और जी7 सदस्य देशों ने रूस का बहिष्कार कर रखा है। ऐसे में माना जा सकता है, कि पश्चिमी गठबंधन दरक सकता है, जो यूरोप के लिए बहुत बड़ा झटका साबित हो सकता है।












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