G20 Summit: कैसे जी20 शिखर सम्मलेन के केंद्र में रही भारत की प्राचीन और समृद्ध विरासत?
G20 Summit: जी20 शिखर सम्मेलन भारत के लिए कई मामलों में अद्वितीय रहा है। इसकी सफलता की सराहना पूरी दुनिया कर रही है। लेकिन, आम भारतीयों के लिए गर्व का एक विषय ये भी है कि इसके माध्यम से हमने जिस तरह से प्राचीन भारत की समृद्धि से वैश्विक नेताओं को रूबरू करवाया है, वह अपने देश के प्रति देखने का दुनिया का नजरिया बदल सकता है।
जी20 शिखर सम्मेलन स्थल भारत मंडपम में भारत का समृद्ध स्थापत्य विरासत इसके केंद्र में रहा। यहां दुनिया भर के प्रभावी देशों के नेताओं को एक साथ ही 13वीं सदी के ओडिशा में स्थित भव्य कोणार्क सूर्य मंदिर की झलक देखने को मिली तो प्राचीन काल में विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से भी परिचित होने का अवसर मिल गया।

भारत की प्राचीन और समृद्ध विरासत से परिचय
शनिवार रात को विभिन्न देशों के मेहमान राष्ट्राध्यक्ष और अन्य वैश्विक नेता अपनी जीवन संगनियों के साथ औपचारिक डिनर के लिए भारत मंडपम पहुंचे थे। वहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां इन मेहमानों का स्वागत कर रहे थे, उसके बैकग्राउंड में यूनेस्को विश्व धरोहर प्राचीन नालंदा महाविहार की प्रतिकृत बनी हुई थी।
नालंदा महाविहार वसुधैव कुटुंबकम के विचार के अनुरूप
यह दुनिया के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालयों में शामिल है, जिसे विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने तबाह कर दिया था। अब उसके अवशेष मात्र बचे हुए हैं। तस्वीरों में दिख रहा है कि पीएम मोदी मेहमानों का स्वागत करने के साथ जी20 नेताओं को इस प्राचीन विश्वविद्यालय की अहमियत के बारे में भी बता रहे थे, जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और ब्रिटिश पीएम ऋषि सुनक भी शामिल हैं।
अधिकारियों ने इसके बारे में जानकारी दी है कि नालंदा विश्वविद्यालय विविधता, योग्यता, विचार की आजादी, सामूहिक शासन, स्वायत्तता और एक-दूसरे के ज्ञान को आपस में साझा का प्रतिनिधित्व करता है, जो कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के मुताबिक हैं।
उनके मुताबिक नालंदा शिक्षा की बेहतर से बेहतर खोज को लेकर भारत की स्थायी भावना और इसके जी20 प्रेसीडेंसी की थीम, वसुधैव कुटुंबकम के अनुरूप एक सामंजस्यपूर्ण विश्व समुदाय तैयार करने के प्रति इसकी प्रतिबद्धता का एक जीवित प्रमाण है।
कोणार्क का कालचक्र मुख्य भूमिका में....
शनिवार शाम में रात्रि भोज के दौरान अगर नालंदा विश्वविद्यालय फोकस में रहा तो सुबह के समय कोणार्क सूर्य मंदिर के विशाल पहिए की तस्वीर से बेहतर जगह विदेशी मेहमानों के स्वागत के लिए क्या हो सकती थी। इसी जगह पर पीएम मोदी ने शिखर सम्मेलन की शुरुआत से पहले विदेशी आगंतुकों का भारत मंडपम में स्वागत किया।
ओडिशा के प्राचीन कोणार्क सूर्य मंदिर का निर्माण 13वीं सदी में राजा नरसिंहदेव प्रथम के कार्यकाल में किया गया था। यह भी यूनेस्को की ओर से विश्व धरोहर घोषित है। यह प्राचीन मंदिर भारत की पौराणिक ज्ञान, उन्नत सभ्यता और वास्तुशिल्प कला में उत्कृष्टता का सुंदर प्रतीक है।
बंगाल की खाड़ी से सटे इस मंदिर को उगते सूर्य के आधार पर बनाया गया है, जो सूर्य देवता को समर्पित है। यूनेस्को की वेबसाइट के मुताबिक इसके 24 पहिए प्रतीकात्मक तरीके से सजाए गए हैं और सूर्य देवता के रथ को 6 घोड़े खींचते हुए प्रतीत होते हैं। कोणार्क के चक्रों की घूमती गति, समय के 'कालचक्र' के साथ-साथ प्रगति और निरंतर परिवर्तन का प्रतीक है।
अधिकारियों के मुताबिक ये पहिए शक्तिशाली लोकतंत्र की पहचान हैं, जो लोकतांत्रिक विचारधारा को प्रदर्शित करते हैं और समाज की प्रगति के प्रति प्रतिबद्धता जताते हैं। शनिवार को माइगॉव इंडिया ने X पर पीएम मोदी की ओर से विश्व नेताओं के अभिनंदन का एक वीडियो शेयर किया, जिसका शीर्षक था 'जी20 का प्रतिष्ठित अभिवादन- कोणार्क का कालचक्र मुख्य भूमिका में....'
कल्चरल कॉरिडोर में भी दिखी प्राचीन भारत की भव्यता की झलक
खुद भारत मंडपम में भी सूर्य द्वार स्थापित किया गया था, जिसमें सूर्य देव के कल्पित घोड़ों को दिखाया गया था। यही नहीं संस्कृति मंत्रालय की ओर से इसके अलावा भी जी20 सदस्य राष्ट्रों के लिए कल्चरल कॉरिडोर तैयार किया गया, जिसके माध्यम से उन्हें प्रतिकृति या डिजिटल रूप में भारत के भव्य और समृद्ध धरोहरों से परिचत कराया गया।
मसलन, पाणिनी के व्याकरण ग्रंथ 'अष्टाध्यायी', ऋग्वेद के शिलालेख और मध्य प्रदेश के भीमभेटका गुफा चित्रों की डिजिटल तस्वीरें भी पेश की गईं जो लगभग 30,000 साल पुरानी हैं। इनके अलावा भारत मंडपम कॉम्पलेक्स के बाहर लगाई गई 27 फुट ऊंची नटराज की प्रतिमा को तो दुनिया ही देख चुकी है। संस्कृत मंत्रालय ने X पर एक पोस्ट में लिखा है, 'यह महामंडपम हमारी महान सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासतों को प्रदर्शित करता है।'(इनपुट-पीटीआई)












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