अफगानिस्तान में खाद्यान्न संकट मचा सकता है तबाही, UN रिपोर्ट में एक करोड़ से ज्यादा लोगों के मरने का डर

रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब 1 करोड़ 40 लाख से ज्यादा लोग पूरी तरह से भूखे रह सकते हैं और खाद्यान्न संकट से निपटने का रास्ता सरकार के पास नहीं है।

काबुल, अगस्त 21: संयुक्त राष्ट्र ने अफगानिस्तान को लेकर बहुत बड़ी चेतावनी जारी कते हुए कहा है कि काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान में करीब एक करोड़ 40 लाख से ज्यादा लोग भूख की वजह से अपनी जान गंवा सकते हैं। यूनाइटेड नेशंस की खाद्य एजेंसी ने साफ तौर पर कहा है कि अफगानिस्तान में खाद्यान्न संकट की वजह से भीषण स्तर पर मानवीय संकट पैदा हो सकता है।

भूख मचाएगा बड़ी तबाही

भूख मचाएगा बड़ी तबाही

यूनाइटेड नेशंस के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की कंट्री डायरेक्टर मैरी एलेन मैकग्रार्टी ने बुधवार को काबुल से संयुक्त राष्ट्र के संवाददाताओं को एक वीडियो ब्रीफिंग में कहा कि, अफगानिस्तान में स्थिति नाजुक होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि पिछले तीन साल में दूसरी बार देश में भीषण सूखा पड़ने की आशंका है, वहीं कोविड-19 महामारी का अभी अंत नहीं हुआ है, जिसमें पहले से ही विकट स्थिति को "तबाही" में तब्दील कर दिया है। एलेन मैकग्रॉर्टी ने कहा कि, 40% से ज्यादा फसलें अफगानिस्तान में नष्ट हो गई हैं और सूखे से पशुधन तबाह हो गया है, । वहीं तालिबान के देश पर कब्जा होने के दौरान पिछले कुछ महीनों में लाखों किसान विस्थापित हो गये हैं, जिससे लाखों लोगों के भूख से मरने की आशंका बन गई है।

फौरन मदद की मांग

फौरन मदद की मांग

यूनाइटेड नेशंस की वर्ल्ड फूड प्रोग्राम की कंट्री डायरेक्टर मैकग्रार्टी ने अफगानिस्तान में जल्द से जल्द संघर्ष को रोकने का आह्वान करते हुए दानदाताओं से आग्रह किया है, कि वो अफगानिस्तान को फौरन खाद्यान्न के लिए बेहद जरूरी 200 मिलियन डॉलर प्रदान करें, वो भी सर्दियों से पहले, नहीं तो तबाही को कोई नहीं रोक सकता है। उन्होंने कहा कि सर्दियों के दौरान गांव-गांव कर खाद्यान्न पहुंचाना आसान नहीं होगा, ऐसे में लोगों से सामने भूखे मरने की नौबत आ सकती है। यूनाइटेड नेशंस ने भले ही दुनिया के देशों से अफगानिस्तान को दान देने की अपील की है, लेकिन स्थिति ये है कि तालिबान के कब्जे के बाद से अमेरिका ने अफगानिस्तान की सरकारी बैक के खाते को सीज कर दिया है, वहीं कई देशों ने अफगानिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद पर रोक लगा दी है, ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले वक्त में भूखमरी संकट काफी भयावह हो सकता है।

चौपट है अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था

चौपट है अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था

लगातार युद्ध के दंश झेलने वाले अफगानिस्तान की आर्थिक स्थिति कभी मजबूत नहीं रही है, लेकिन पिछले 40 सालों के दौरान स्थिति खराब ही होती गई है। खासकर पिछले 20 सालों में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में थोड़ा बहुत सुधार जरूर दर्ज किया गया था, लेकिन तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान में लोगों का पेट कैसे भरेगा, ये बड़ा सवाल है। इस वक्त अफगानिस्तान में तमाम राज काज बंद हैं। सरकार नाम की कोई चीज नहीं है, सरकारी कर्मचारियों में खौफ है और बैंक में अफगानिस्तान सरकार का जमा 9.5 अरब डॉलर के फंड को अमेरिका रोक चुका है। इसके साथ ही आएमएफ ने भी अफगानिस्तान में राहत और बचाव फंड पर रोक लगा दी है। यानि, अफगानिस्तान के पास अब इनकम का एक भी साधन नहीं बचा है। ऐसे में खाद्यान्न संकट से कैसे छुटकारा मिलेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

अफगानिस्तान के दरवाजे पर आर्थिक संकट

अफगानिस्तान के दरवाजे पर आर्थिक संकट

लगातार युद्धग्रस्त देश बने रहने की वजह से अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में कभी सुधार नहीं आया है। बात अर्थव्यवस्था की करें तो अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) इस वक्त करीब 19.8 अरब डॉलर है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में 75 प्रतिशत बजट अंतर्राष्ट्रीय दान-दाताओं से ही मिलता है और अब जबकि तालिबान ने देश पर कब्जा कर लिया है तो अंतर्राष्ट्रीय दान मिलना अब बंद हो गया है। और अमेरिका पहले ही 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति को सीज कर चुका है, यानि अफगानिस्तान भयानक आर्थिक संकट में फंस चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान के लिए सरकार चलाना नामुमकिन हो जाएगा।

कैसे सरकार चलाएगा तालिबान?

कैसे सरकार चलाएगा तालिबान?

अमेरिका ने ना सिर्फ अफगानिस्तान की अमेरिका स्थिति संपत्ति को सीज किया है, इसके साथ ही अमेरिका ने अफगानिस्तान जा रही नकदी शिपमेंट पर भी रोक लगा दी है। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानि आईएमएफ और दूसरे वाणिज्यिक संस्थानों में अफगानिस्तान को दी जाने वाली हर प्रकार की मदद रोक दी है। इसका मकसद तालिबान के हाथों में पैसों को जाने से रोकना है। वहीं, अफगानिस्तान के केन्द्रीय बैंक के गवर्नर अमजद अहमदी भी देश से जा चुके हैं और अब बैंक कौन चला रहा है, बैंक के फैसले कौन ले रहा है, इसे देखने वाला भी कोई नहीं है। ऐसे में अफगानिस्तान का बैंकिंग सिस्टम भी टूटने के कगार पर पहुंच गया है और कैश की किल्लत काफी ज्यादा बढ़ने वाली है। इसके अलावा अफगानिस्तान में काफी तेजी से महंगाई बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है। यानि, तालिबान बंदूक से भले ही ना मारे, भूख से जरूर आदमी मरेंगे।

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