गलवान के बाद तवांग...सीमा पर बखेड़ा करता ही रहेगा चीन , तो क्या भारत भी बर्दाश्त करता रहेगा?
अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में चीन की आक्रामकता के बाद भारत को कई सीख लेने की जरूरत है। खासकर विशेषज्ञों के चीन संबंधित कई थ्योरी खारिज हो जाते हैं, जिनमें दबे स्वर में भारत को शांत रहने की सलाह दी जाती है।

China-India Conflict: पिछले महीने औली में भारत और चीन के बीच किए गये संयुक्त युद्धाभ्यास का विरोध करते हुए चीन ने भारत को 1993-1996 द्विपक्षीय सीमा समझौतों को पालन करने और एलएसली पर शांति और स्थिरता बनाए रखने का आह्वान किया गया था, लेकिन उसके ठीक 9 दिनों के बाद चीन ने अपने लक्ष्य पोस्ट को बजल दिया और अरुणाचल प्रदेश में तवांग सेक्टर में सीमा पार करने की कोशिश कर जाली। क्षेत्र में इन्फ्रास्ट्रक्टर में भारी बाधाओं के बाद भी इंडियन आर्मी ने काफी सख्त प्रतिक्रिया दी और दोनों देशों के सैनिकों के बीच संघर्ष हुआ। हालांकि, इस संघर्ष में सैनिकों को मामूली चोटें आई हैं, लेकिन सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या चीन ऐसे ही सीमा पर बखेड़ा करता रहेगा और क्या भारत ऐसे ही बर्दाश्त करता रहेगा? क्या चीन को काबू में करने का कोई उपाय नहीं है और भारत सरकार को ऐसा कौन सा कदम उठाना चाहिए, कि चीन कभी भी सीमा पर बखेड़ा खड़ा करने की हिम्मत नहीं कर पाए।

तवांग संघर्ष से पहला सबक
भारतीय सैनिकों की कड़ी प्रतिक्रया के बाद भले ही चीन के सैनिक वापस अपने क्षेत्र में लौट आए हों, लेकिन तवांग सेक्टर में सैन्य संघर्ष को लेकर कई महत्वपूर्ण सबक लिए जा सकते हैं। पहला सबक यह है, कि चीन सीमा मुद्दे को हल करने में दिलचस्पी नहीं रखता है और भारत के विकास को बाधित करने के लिए 3 हजार 488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत को उकसाने वाली कार्रवाई करता रहेगा, ताकि भारत सीमा विवाद में उलझा रहे और युद्ध के डर से हथियारों पर पैसा खर्च करता रहे। चीन का मकदस साफ है, चीन अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करना चाहता है, जिसे वो तिब्बत का एक हिस्सा मानता है और साल 1959 में तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री ने मैकमोहन लाइन को मानने से इनकार कर दिया था। तिब्बत पर चीन ने 1950 में कब्जा किया था और उसके बाद से ही चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने की कोशिश करता रहा है। लिहाजा, भारत के वो लोगो, जो सोचते हैं कि अगर भारत, चीन के बनाए लिमिट्स में रहता है, तो चीन सीमा मुद्दे को नहीं बढ़ाएगा- वो पूरी तरह से गलत हैं। तवांग घुसपैठ से पता चलता है, कि चीन अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के लिए अपनी छोटी, मध्यम और दीर्घकालिक रणनीतियों के मुताबिक गोलपोस्ट बदलता रहेगा।

तवांग संघर्ष से दूसरा सबक
भारत के कई वामपंथी पत्रकारों और विशेषज्ञों का मानना रहा है और इस बात पर अंतहीन बहस होती रही है, कि भारत को अमेरिका के बहुत करीब नहीं जाना चाहिए, क्योंकि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता है, और अमेरिका के करीब नहीं जाने से चीन शांत रह सकता है। लेकिन, वामपंथियों के इस बहस को पहले ही प्वाइंट में ये कहकर खारिज किया जा सकता है, कि भारत अपनी संप्रुभता से समझौता नहीं कर सकता है और अपनी मर्जी से, देश हित को ध्यान में रखकर अपनी मर्जी से फैसले लगा। इतना ही नहीं, कई विशेषज्ञ ये दलील भी देते हैं, कि भारत को चीन के करीब रहकर चीन के साथ दूसरी तरह की भूमिकाएं निभते हुए एक भ्रमित विदेश नीति का पालन करना चाहिए, और चीन के साथ सीमा पर शांति हासिल करनी चाहिए। ये दलील इसी बात से खत्म हो जाती है, कि चीन और रूस ने 'दोस्ती की सीमा नहीं है' का ऐलान नहीं कर चुके हैं। वहीं, भारत की जरूरत अब पश्चिमी देशों के साथ नजकीदी संबंध बनाए रखने की है।

भारत को चाहिए पश्चिम का साथ
चीन चाहता है, भारत सिर्फ एक बाजार बना रहे और आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भारत हासिल नहीं कर पाए। लेकिन, भारत निवेश चाहता है और इसके लिए भारत को पश्चिम की जरूरत है। भारत को अब अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों से भारी निवेश की जरूरत है, जो हो भी रहा है। वहीं, यह भी याद रखे जाने की जरूरत है, कि साल 2002 में जब वॉशिंगटन ने भारत को असैन्य परमाणु समझौते की पेशकश की थी, उसके बाद चीन ने फौरन सिक्किम को भारतीय हिस्से के तौर पर मान्यता दी थी। यानि, अमेरिका के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध चीन के हित में नहीं हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के हितों की पूर्ति कमजोर भारत से ही हो सकती है, न कि QUAD भागीदारों द्वारा। वहीं, भारत के पास आत्मनिर्भर बनने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं है, क्योंकि 1962 की लड़ाई में भारत की मदद ना तो अमेरिका ने और ना ही रूस ने की थी। हालांकि, 1971 के युद्ध में रूस ने भारत की मदद की थी, लेकिन उसकी वजह बदली हुई वैश्विक परिस्थितियां थीं और रूस, भारत के बहाने अमेरिका को आंख दिखाना चाहता था।

तवांग संघर्ष से तीसरा सबक
तवांग संघर्ष से तीसरा सबक यह है, कि कई विशेषज्ञों का मानना है कि, अगर भारत, चीन को सैन्य रूप से उत्तेजित नहीं करना चाहता है, तो उसे QUAD गेम से बाहर रहना चाहिए। क्योंकि यह इंडो-पैसिफिक की अमेरिकी रणनीति के अनुकूल है, और भारत को चाहिए, कि वो खुद को अपने पड़ोस और हिंद महासागर तक ही सीमित रखे। इस सलाह में निहित यह बात है, कि भारत चीन के लिए सैन्य रूप से कमजोर है, और चीन की वैश्विक भूमिका की तुलना में भारत की एक क्षेत्रीय भूमिका है। यह सलाह मूल रूप से ही त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि पीएलए नौसेना आने वाले वर्षों में हिंद महासागर में गश्त करेगी, भले ही भारत भारत-प्रशांत से दूर रहे। चीन को सीमित करने का एकमात्र तरीका यही है, कि ऑस्ट्रेलिया, जापान, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे सहयोगियों के साथ हिंद महासागर और प्रशांत महासागर दोनों जगहों पर पीएलए का मुकाबला किया जाए। चीन हिंद महासागर में लगाकार अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश में है, लिहाजा भारत को अब हिंद महासागर के लिए रूरी ताकत के साथ जुट जाना चाहिए।

तवांग संघर्ष से चौथा सबक
भारत के लिए चौथा सबक यह है, कि भारत के पास फ्रांस और अमेरिका जैसे सहयोगियों की मदद से अपनी स्वदेशी उच्च तकनीक वाली सैन्य क्षमता का निर्माण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। ऐसा इसलिए, क्योंकि एलएसी के पार उसे एक दुर्जेय दुश्मन का सामना करना है। भारत को अब निश्चित तौर पर एक आत्मनिर्भर सैन्य शक्ति बनना ही होगा, ताकि घर में ही बाजार बनाकर उसका दोतरफा लाभ लिया जा सके। भारत ने यह काम शुरू कर दिया है। वहीं, अब भारत को चीन के साथ लगती सीमा के पास तेजी के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास करना ही होगा और भारत को किसी भी चीनी घुसपैठ को रोकने के लिए एक हार्डवेयर प्लेटफॉर्म होना चाहिए। यह सुनने में जितना मुश्किल लगता है, उतना मुश्किल असल में नहीं है, लेकिन इसमें एकमात्र बाधा सैन्य-असैनिक नौकरशाही है, जो हिमाचल में शिंकू ला के तहत सुरंग बनाने या संसोमा-मुर्गो अक्ष में सासेर ला के तहत सुरंग बनाने जैसी सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर फाइल पर कुंडली मारकर बैठी रहती है। जबकि, पीएलए काफी तेजी से इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रहा है।

भारत के लिए पांचवां सबक
भारत के लिए पांचवां सबक यह है, कि भारत को चीन में अपनी खुफिया जानकारी को अपग्रेड करना चाहिए, ताकि उसे एलएसी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में पीएलए के इरादों की अग्रिम चेतावनी मिल सके। चीन के जासूस पूरी दुनिया में फैले हुए हैं, लिहाजा अब भारत को भी चीन में अपना खुफिया नेतृत्व का विकास करनी चाहिए। पिछले दशकों में, भारतीय खुफिया तंत्र ने चीन या कम्युनिस्ट पार्टी में प्रवेश नहीं किया है। वहीं, भारत में एक बड़े पैमाने पर निर्वासित तिब्बती समुदाय होने और पूरे हिमालयी क्षेत्र में तिब्बती बौद्ध धर्म मौजूद होने के बावजूद, भारतीय खुफिया विभाग अतीत में एलएसी पर चीन और उसकी सैन्य गतिविधियों से कतराता रहा है। भारत, चीन को उकसाने से इतना डरा हुआ था, कि साल 1950 के दशख में गठित स्पेशल फ्रंटियर फोर्स को भी मोदी सरकार ने साल 2020 में जाकर दक्षिण पैंगोंग त्सो अभियानों में शामिल किया है। हालांकि, पहले के मुकाबले अब खुफिया स्थिति बेहतर बदली जरूर है, लेकिन इसमें सुधार की बहुत बड़ी गुंजाइश है। वरना तवांग जैसे हालात बार-बार दोहराए जाएंगे।












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