Rafale Vs Eurofighter: भारत का दिल जीतने राफेल और यूरोफाइटर में 'जंग', कौन जीतेगा अरबों डॉलर की डील?
Rafale Vs Eurofighter: जर्मनी के रामस्टीन एयरबेस का आसमान 6 जून को जेट इंजनों की गड़गड़ाहट से चौंधिया रहा था, क्योंकि तीन दर्जन से ज्यादा NATO लड़ाकू विमान एक दिलचस्प अभ्यास में लगे हुए थे। ये जंग थी, कि कौन किसपर भारी पड़ रहा है, क्योंकि जीतने वाला जेट, अरबों डॉलर की डील हासिल कर सकता है।
आसमान का बादशाह बनने की जंग में यूरोफाइटर टाइफून और डसॉल्ट राफेल भी शामिल थे और ये दोनों ही 4.5 जेनरेशन के फाइटर जेट हैं, जिन्होंने युद्ध के मैदान में अपने झंडे गाड़े हैं। इस अभ्यास में 37 विमानों ने भाग लिया था, जिसमें चौथी और पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान शामिल थे।

जर्मनी में फाइटर जेट्स की दिलचस्प जंग
टाइफून और राफेल ने 10,000 फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर एक दूसरे के करीब 'युद्ध' किया, एक ऐसी लड़ाई, जिसको लेकर माना जाता है, कि उसपर भारत की नजर रही होगी। यह बेसिक लड़ाकू युद्धाभ्यास, इन फाइटर जेट्स की क्षमताओं का परीक्षण करने औऱ उनकी दुर्जेय शक्ति को परखने के लिए था। ये दोनों ही फाइटर जेट आसमानी लड़ाई में माहिर हैं।
यूरोफाइटर टाइफून और राफेल के अलावा, इस सैन्य अभ्यास में अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड और नॉर्वे के F-35 शामिल थे। इन पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की मौजूदगी ने यूरोपीय डिफेंस में F-35 के बढ़ते महत्व को दर्शाया है, जिसको लेकर योजना है, कि यूरोपीय क्षेत्र में इस दशक के अंत तक कम से कम 600 लड़ाकू विमान तैनात किए जाएं।
यह सैन्य अभ्यास शीत युद्ध के युग की याद दिलाता है, जिसमें अलग-अलग प्रशिक्षणों में सैकड़ों फाइटर जेट्स उड़ान भरते थे और अपनी ताकत का प्रदर्शन करने की कोशिश करते थे। NATO एलाइड एयर कमांड के वरिष्ठ जर्मन राष्ट्रीय प्रतिनिधि कर्नल माइकल "टी-मैन" ट्रॉटरमैन ने कहा, कि "यह कुछ ऐसा है, जो सीखने का अनुभव है, जो ऐसा मैंने कई सालों में नहीं देखा है।"
यह घटना रामस्टीन एयर बेस और उसके कर्मचारियों के लिए ऐतिहासिक थी। अमेरिकी सैन्य एयरलिफ्ट क्षमताओं के केंद्र के रूप में जाना जाता है और लैंडस्टहल में अमेरिकी सैन्य अस्पताल भी है। रामस्टीन में भारी संख्या में अमेरिकी डिफेंस सर्विस के अधिकारी भी रहते हैं, जो यूरोप और अमेरिका के बीच की सेना का कॉर्डिनेशन करते हैं।
यह नकली युद्ध जर्मनी का रामस्टीन एयरबेस पर 50-बाई-70-मील के हवाई क्षेत्र में हुआ, जिसे चार हिस्सों में बांटा गया था। जिनमें से प्रत्येक में अपनी-अपनी हवाई लड़ाई थी। प्रत्येक लड़ाकू विमान को अपने नकली दुश्मन पर जीत हासिल करने की चुनौती थी और नकली दुश्मन को मार गिराने के लिए हर एक पायलट को 30 मिनट का समय दिया गया था। हालांकि, लड़ाकू पायलटों के प्रोफेशनल होने के बाद भी हवाई सुरक्षा सुनिश्चित करने और अभ्यास को अत्यधिक आक्रामक होने से रोकने के लिए सख्त उपाय लागू किए गए थे। इस अभ्यास में कोई ट्रॉफी नहीं थी, लेकिन अपनी क्षमता का प्रदर्शन करना था।

राफेल और टायफून पर भारत का फोकस
इस सैन्य अभ्यास में यूरोफाइटर टाइफून और राफेल में से किसन बाजी मारी, इस 'लड़ाई' का नतीजा अभी तक गोपनीय रखा गया है, लेकिन इन दो यूरोपीय लड़ाकू विमानों के बीच प्रतिस्पर्धा हमेशा से ही कड़ी रही है। राफेल और टाइफून, दोनों ही अपने शुरुआती विकास और आवश्यकताओं को निर्धारित करने के लिए एक बैकग्राउंड शेयर करते हैं। पहले फ्रांस भी यूरोफाइटर के निर्माण में शामिल था, लेकिन बाद में राफेल को स्वतंत्र रूप से विकसित करने के लिए फ्रांस ने यूरोफाइटर कंसोर्टियम को छोड़ दिया।
हालांकि, जब ये दोनों फाइटर जेट बाजार में पहली बार आए, तो यूरोफाइटर ने अपने एडवांस ऑर्डर की वजह से लंबी छलांग लगाई, जबकि राफेल को शुरूआती दौर में कोई खरीददार नहीं मिला। इसीलिए इसे 'शापित विमान' कहा गया।
लेकिन, जैसे ही भारत ने राफेल के लिए फ्रांस के साथ करार किया, राफेल की किस्मत बदल गई और आज की तारीख में, राफेल सबसे ज्यादा बिकने वाला फाइटर बन गया। भारत ने आखिरी स्टेज में यूरोफाइटर को छोड़ दिया और राफेल खरीदने का फैसला किया।
लेकिन, हाल ही में, यूरोफाइटर टाइफून ने फिर से ध्यान आकर्षित किया, जब भारतीय वायु सेना के प्रमुख मार्शल वी.आर. चौधरी ने जर्मनी का दौरा किया और जर्मन एयरबेस पर टाइफून में उड़ान भरी।
जिसके बाद अटकलें शुरू हो गई है, कि क्या भारत अपने 'MMRCA 2.0' प्रोजेक्च के लिए यूरोफाइटर पर विचार कर रहा है?
दरअसल, भारत सरकार 114 लड़ाकू विमान खरीदने की योजना बना रही है और इसके लिए अलग अलग फाइटर जेट कंपनियों की तरफ से भारत को ऑफर आ रहे हैं। हालांकि, भारत के डिफेंस एक्सपर्ट्स 'परीक्षित और भरोसेमेद' राफेल को ही वोट कर रहे हैं, लेकिन राफेल के अलावा भी भारत किसी और जेट की तरफ जा सकता है, उस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।

यूरोफाइटर टाइफून बनाम डसॉल्ट राफेल
राफेल और यूरोफाइटर.. इन दोनों ही फाइटर जेट्स को कामयाब प्रोजेक्ट्स माना जाता और आज की तारीख में ये दुनिया के सबसे बेहतरीन लड़ाकू विमानों में शामिल हैं। हालांकि ये कुछ हद तक पुराने 4.5-पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका के 5वीं पीढ़ी के F-35 और F-22 लड़ाकू विमानों से मेल नहीं खा सकते हैं, फिर भी ये आधुनिक युद्ध में विश्वसनीय बने हुए हैं।
फ्रांस भी पहले यूरोफाइटर के डेवलपमेंट में शामिल था, लेकिन बाद में राफेल बनाने के लिए फ्रांस इस प्रोजेक्ट से बाहर निकल आया था, जिसके बाद यूके, जर्मनी, इटली और स्पेन ने मिलकर यूरोफाइटर का निर्माण किया।
लेकिन, राफेल को फ्रांस ने इस आधार पर डिजाइन किया है, कि वो कम स्पीड में भी उड़ान भरने में सक्षम हो और भारी हथियार लेकर उड़ान भरने की इसमें क्षमता हो। इसके अलावा, यूरोफाइटर के विपरीत, राफेल को शुरू से ही न्यूक्लियर डिलीवरी सिस्टम के रूप में डिजाइन किया गया था। और ये डिजाइन ही राफेल को आखिरी प्वाइंट पर किसी अन्य विमान की तुलना में बढ़त देते हैं।
राफेल बहुत कम गति पर भारी हथियार ले जाने और असाधारण हैंडलिंग पर जोर देता है, जबकि टाइफून ऊंचाई पर मैक्सिमम प्रदर्शन और ट्रांसोनिक और सुपरसोनिक रफ्तार से कलाबाजी करते हुए उड़ान भरने में सक्षम है।
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट के रिसर्च फेलो जस्टिन ब्रोंक ने राफेल और यूरोफाइटर टाइफून की तुलना को लेकर कहा, कि राफेल अपने परिपक्व आरबीई2 रडार सिस्टम की वजह से यूरोफाइटर की तुलना में आगे निकल जाता है।
इसके अलावा, राफेल F3R लोड-कैरिंग क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक काउंटरमेजर्स (ECM), सबसोनिक चपलता, कम और मध्यम ऊंचाई पर प्रदर्शन और अपनी कीमत की वजह से भी टाइफून पर भारी पड़ता है।
वहीं, RAF मानक ट्रैंच 3 टाइफून दृश्य सीमा से परे (BVR) प्रदर्शन, इंटरसेप्टर मिशन में राफेल से बेहतर प्रदर्शन करता है। इसके अलावा, टाइफून इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेज़र (ESM), टर्मिनल काउंटरमेजर्स और टर्मिनल काउंटरमेजर स्ट्राइक क्षमताओं में बेहतर प्रदर्शन दिखाता है।
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