कैसी है अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था और तालिबान कैसे चलाएगा सरकार? US प्रतिबंध के बाद कहां से होगी कमाई?
पिछले 40 सालों से अफगानिस्तान लगातार अस्थिर है और देश की अर्थव्यवस्था कभी मजबूत नहीं रही और अब अमेरिकी प्रतिबंध ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है।
काबुल, अगस्त 20: काबुल पर भले ही तालिबान काबिज हो चुका है लेकिन अफगानिस्तान में सरकार चलाना तालिबान के लिए कतई आसान नहीं होने वाला है। खासकर तब, जब अमेरिका ने अफगानिस्तान नेशनल बैंक के खातों को फ्रीज कर दिया है और तालिबान बैंक के पैसों का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। वहीं, तालिबान को अभी तक किसी भी देश ने मान्यता नहीं दी है, ऐसे में सवाल ये उठता है कि पाई-पाई को मोहताज तालिबान भला सरकार कैसे चलाएगा? क्या आर्थिक संकट में फंसे तालिबान का सहारा चीन बनेगा?

अरबों डॉलर अमेरिका ने किए फ्रीज
अफगानिस्तान में तालिबान एक ऐसी सरकार बनाने जा रहा है, जो दुनिया के लिए अवैध है। हालांकि, चीन और पाकिस्तान से मान्यता मिलने के संकेत भले हैं, लेकिन चीन इतनी जल्दी तालिबान को मान्यता देने के मूड में भी नहीं है। लिहाजा, अमेरिका ने जैसे ही अफगानिस्तान नेशनल बैंक के खाते को फ्रीज किया। ठीक वैसे ही तालिबान के अंदर खलबली मच गई कि वो सरकार कैसे चलाएगा? तालिबान को लगने लगा कि भले ही उसने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया हो, लेकिन सरकारी खजाने पर अब भी कब्जा अमेरिका का ही है।

पहले ही अर्थव्यवस्था है पूरी तरह चौपट
पिछले 40 सालों से अफगानिस्तान लगातार अस्थिर है और देश की अर्थव्यवस्था कभी मजबूत नहीं रही। खासकर पिछले 20 सालों में अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में थोड़ा बहुत सुधार जरूर दर्ज किया गया था, लेकिन वो एक बार फिर से रसातल में समाने के लिए निकल चुकी है। अफगानिस्तान में तमाम राज काज बंद हैं। सरकार नाम की कोई चीज नहीं है, सरकारी कर्मचारियों में खौफ है और बैंक में अफगानिस्तान सरकार का जमा 9.5 अरब डॉलर के फंड को अमेरिका रोक चुका है। इसके साथ ही आएमएफ ने भी अफगानिस्तान में राहत और बचाव फंड पर रोक लगा दी है। यानि, अफगानिस्तान के पास अब इनकम का एक भी साधन नहीं बचा है।

कैसी है अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था?
लगातार युद्धग्रस्त देश बने रहने की वजह से अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में कभी सुधार नहीं आया है। बात अर्थव्यवस्था की करें तो अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) इस वक्त करीब 19.8 अरब डॉलर है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था में 75 प्रतिशत बजट अंतर्राष्ट्रीय दान-दाताओं से ही मिलता है और अब जबकि तालिबान ने देश पर कब्जा कर लिया है तो अंतर्राष्ट्रीय दान मिलना अब बंद हो गया है। और अमेरिका पहले ही 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति को सीज कर चुका है, यानि अफगानिस्तान भयानक आर्थिक संकट में फंस चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि तालिबान के लिए सरकार चलाना नामुमकिन हो जाएगा।

कैसे सरकार चलाएगा तालिबान?
अमेरिका ने ना सिर्फ अफगानिस्तान की अमेरिका स्थिति संपत्ति को सीज किया है, इसके साथ ही अमेरिका ने अफगानिस्तान जा रही नकदी शिपमेंट पर भी रोक लगा दी है। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष यानि आईएमएफ और दूसरे वाणिज्यिक संस्थानों में अफगानिस्तान को दी जाने वाली हर प्रकार की मदद रोक दी है। इसका मकसद तालिबान के हाथों में पैसों को जाने से रोकना है। वहीं, अफगानिस्तान के केन्द्रीय बैंक के गवर्नर अमजद अहमदी भी देश से जा चुके हैं और अब बैंक कौन चला रहा है, बैंक के फैसले कौन ले रहा है, इसे देखने वाला भी कोई नहीं है। ऐसे में अफगानिस्तान का बैंकिंग सिस्टम भी टूटने के कगार पर पहुंच गया है और कैश की किल्लत काफी ज्यादा बढ़ने वाली है। इसके अलावा अफगानिस्तान में काफी तेजी से महंगाई बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है। यानि, तालिबान बंदूक से भले ही ना मारे, भूख से जरूर आदमी मरेंगे।

पाकिस्तान की फिल्डिंग नाकाम
तालिबान ने जैसे ही अफगानिस्तान पर कब्जा किया, ठीक उसके बाद से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान वैश्विक समुदाय से अफगानिस्तान को आर्थिक मदद देने की अपील कर रहे हैं। इमरान खान समझ गये थे कि अमेरिका सबसे पहले अफगानिस्तान पर प्रतिबंध लगाएगा, लिहाजा उन्होंने जर्मनी और ब्रिटेन से भी बात की, लेकिन यूरोपीयन देशों ने रिफ्यूजी को अपने यहां शरण देने की बात तो मान ली, लेकिन आर्थिक मदद देने की बात से इनकार कर दिया। बात चीन की करें, तो चीन ने अभी तक पाकिस्तान को एक रुपये चंदा नहीं दिया है तो वो तालिबान राज में अफगानिस्तान को क्यों देगा। चीन सिर्फ व्यापार जानता है, जो करने के लिए वो तैयार है। यानि, तालिबान के पास पैसे जमा करने के कुछ ही रास्ते हैं।

अफीम की खेती बढ़ाए
बात तालिबान की आर्थिक स्थिति की करें तो वो एक पैसों वाला संगठन है, लेकिन तालिबान के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो देश चला सके। जून 2021 में यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट में कहा गया कि तालिबान को हर साल 1.6 अरब डॉलर की आमदनी होती है, जिसका मुख्य स्रोत ड्रग्स तस्करी, अफीम की खेती, अपहरण, एक्सटॉर्शन, खनिजों का अवैध दोहन के अलावा अपने कब्जे वाले इलाकों में रहने वाले लोगों और कारोबारियों से फिरौती वसूलना था। इसके अलावा दुनिया के कई देशों से तालिबान को हवाला के जरिए चंदा भी मिलता रहा है, जिससे तालिबान को अच्छी खासी कमाई होती रही है, लेकिन संगठन चलाना और देश चलाने में काफी अंतर होता है। लिहाजा माना जा रहा है कि तालिबान सबसे पहला काम टैक्स दर बढ़ाने के साथ साथ काफी सख्ती के साथ टैक्स वसूली पर ध्यान देगा।

सख्ती के साथ टैक्स वसूली
तालिबान के लिए सबसे बड़ी राहत की बात अब ये है कि वो अब पूरे देश से टैक्स वसूल सकता है। इसके साथ ही अफगानिस्तान की तमाम सीमाओं से गुजरने वाली गाड़ियों से जो टैक्स मिलेगा, वो भी तालिबान की जेब में ही जाएगा। इसके साथ ही अफगानिस्तान के तमाम बैंक्स और दूसरे वित्तीय संस्थानों पर भी तालिबान का अधिकार होगा, वहीं बताया जा रहा है कि हवाला कारोबार पर टैक्स थोपकर उससे तालिबान काफी कमाई कर सकता है। यानि, अफगानिस्तान आने वाले वक्त में हवाला कारोबारियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन सकता है। तालिबान पैसे कमाने के लिए अफीम के कारोबार को भी कानूनी कर सकता है।

माइनिंग पर तालिबान का कब्जा
रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान के 34 प्रांतों को मिलाकर कुल 704 माइनिंग क्षेत्र हैं, जिनपर अब तालिबान का पूरी तरह से नियंत्रण है। दुर्लभ खनिजों के नजरिए से देखें तो अफगानिस्तान में इसकी कोई कमी नहीं है। अमेरिका ने जब अफगानिस्तान के दुर्लभ खनिजों को लेकर आखिरी रिपोर्ट 2017 में दी थी, उस वक्त अनुमान लगाया गया था कि अफगानिस्तान में करीब 3 लाख डॉलर के दुर्लभ खनिज हो सकते हैं। अब ये सभी तालिबान के नियंत्रण में हैं, लेकिन दिक्कत ये है कि ये खनिज ऐसे ही तो धरती से बाहर नहीं आ जाएंगे। इन्हें निकालने के लिए अगर चीन जैसा देश अपनी पूरी ताकत झोंक भी दे, फिर भी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के साथ साथ इन दुर्लभ खनिजों को बाहर निकालने, उसकी सफाई और उसके दोहन में कम से कम 10 सालों का वक्त लग सकता है। यानि, इन खनिजों से तालिबान को फिलहाल आर्थिक मदद मिलने वाली नहीं है।

अमेरिकी हथियार बेचेगा तालिबान?
तालिबान के लिए फौरन कमाई करने का सबसे बड़ा जरिया अमेरिकी हथियार हैं। माना जा रहा है कि अमेरिका ने अफगानिस्तान में अरबों रुपये के हथियार छोड़ दिए हैं, जिन्हें तालिबान दूसरे आतंकी संगठनों को बेचने के साथ साथ कुछ छोटे देशों को बेच सकता है। कोई दूसरा देश तालिबान से अमेरिकी हथियार इसलिए नहीं खरीदेगा, क्योंकि ऐसा करने पर उसे अमेरिकी प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है, लिहाजा तालिबान उन हथियारों को दूसरे आतंकी संगठनो को बेच सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि किसी दूसरे आतंकी संगठन के हाथ में अत्याधुनिक अमेरिकी हथियार देने का मतलब तालिबान का अपने ही हाथों अपने लिए दुश्मन बनाना होगा, लिहाजा इस बात की उम्मीद ना के बराबर है कि तालिबान अमेरिकी हथियारों को बेचेगा। ऐसे में अब तालिबान कहां से कमाई करेगा और कैसे देश चलाएगा, ये देखना दिलचस्प होगा।












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