अफगानिस्तान में रोटी के लिए बेटी और किडनी बेचने पर मजबूर लोग, अफगान मांओं की रूलाने वाली कहानी
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, अफगानिस्तान में रहने वाले लाखों लोग पूरी तरह से हताश हो चुके हैं और भूख का सामना कर रहे हैं। वहीं, 5 साल से कम उम्र के 32 लाख से ज्यादा बच्चे तीव्र कुपोषण के शिकार बन चुके हैं।
काबुल, जनवरी 29: दो वक्त की रोटी चाहिए और उसे पाने के लिए अब आखिरी सहारा या तो डिकनी बेचना रह गया है या घर की छोटी-छोटी बेटियों का आखिरी रास्ता। अफगानिस्तान की माएं मजबूर हो चुकी हैं और अपनी तकदीर को कोस रही हैं, कि उनकी कोख से बेटियों ने क्यों जन्म लिया है। माएं अपनी तकदीर पर आंसू बहा रही हैं और पूछ रही हैं, कि क्या बेटियों ने सिर्फ इसलिए जन्म लिया था, कि उसे 3 साल, पांच साल या 12 साल की उम्र में 60 साल के बूढ़े के हाथों मरने के लिए बेच दिया जाए, ताकि मां और बार दो वक्त की रोटी हलक के नीचे उतार सके। ये अफगानिस्तान की कहानी है...

किडनी बेचकर मिलता है खाना
अफगानिस्तान में मानवीय संकट सभी सीमाओं को पार कर चुका है और दर्जनों लोग अपने परिवार को खाना खिला पाएं, इसके लिए किडनी बेचने पर मजबूर हैं।
एक अफगान परिवार, जिसमें तीन भाई और दो बहनें शामिल हैं, सभी की सर्जरी की गई है और सभी बच्चों के अंग निकाले गये हैं, ताकि उनके घर के लोगों को खाना मिल सके। डेलीमेल की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब सवा लाख रुपये में सभी बच्चों के अंगों को बेच दिया गया है। इनके परिवार के लोग अपनी किडनियां पहले ही बेच चुके हैं। यानि, बारी बारी से परिवार के अलग अलग सदस्य अपनी किडनी बेच रहे हैं, ताकि पेट में अनाज के दो दाने गिर सकें और अब बच्चों के अंगों को बेचा जा रहा है, क्योंकि अब घर के बड़े लोगों के पास बेचने को कुछ नहीं रहा।

घर में 8 बच्चे, क्या करे मां-बाप?
डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, एक और अफगानिस्तान का परिवार, जिसमें पति और पत्नी के अलावा आठ बच्चे हैं, उन्हें खिलाने के लिए पति और पत्नी अपनी किडनियों को बेच चुके हैं और अब वो गुमनाम रहकर अपने एक बच्चे को बेचने की कोशिश में हैं, ताकि पूरे परिवार का पेट पल सके। अफगानिस्तान के हेरात शहर में रहने वाली 25 साल की एक मां रोती हुई स्काई न्यूज को बताती है, कि 'छह महीने पहले मेरे तीन साल के बेटे की भूख से मौत हो गई थी। मैं अब बाकी बच्चों को दम तोड़ते नहीं देख सकती हूं... कम से कम किडनी बेचकर तो उन्हें खिला ही सकती हूं''। अभी तक परिवार ने तय नहीं किया है, कि किस बच्चे को बेचना है, लेकिन परिवार का कहना है कि, वो पूरी तरह से हताश हो चुके हैं और अपने छोटे बच्चों की किडनी भी किसी भी कीमत पर बेचने के लिए तैयार हैं, क्योंकि अब उनके पास बेचने के लिए कुछ नहीं बचा है। पिता ने कहा कि, बच्चे रात में भूख से रोते हैं और कोई ग्राहक मिले तो 20 हजार अफगान रुपये में अपने किसी बच्चे को बेचने के लिए वो तैयार हैं।

ढह रही है अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था
तालिबान ने पिछले साल 15 अगस्त को अफगानिस्तान पर कब्जा किया था और उसके बाद से वो आपस में ही लड़ रहे हैं। बंदूक के दम पर लोगों की आवाज को दबाकर रखा गया है, लेकिन इस आतंकवादी समूह के बूते देश चलाना संभव नहीं है। पिछले 6 महीने में तालिबान के अंदर कई गुट बन चुके हैं और देश के कई हिस्सों में तालिबानियों के बीच आपस में ही संघर्ष शुरू हो चुका है। लेकिन, उन बेसहारा परिवारों की देखरेख करने वाला कोई नहीं है। अफगानिस्तान को मिलने वाली अंतर्राष्ट्रीय मदद रोक दी गई है और इसका सीधा असर देश के लोगों पर पड़ रहा है। लोगों के पास रुपये नहीं हैं, कि वो बुनियादी सामान भी खरीद सके। हेरात प्रांत के बाहर बसा एक गांव, जो ईरान की सीमा के नजदीक है, उस गांव के दर्जनों महिलाओं, बच्चों और लोगों ने अपनी किडनी बेची है, ताकि वो अपना पेट पाल सकें।
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ईरान में अंग बेचते लोग
ईरान की सीमा के पास बसे अफगानिस्तान के गावों में रहने वाले लोग ईरान की सीमा पार कर जाते हैं, और वहां अपने अंग बेचते हैं। एक लड़का, जिसकी मां ने कुछ दिन पहले अपना अंग बेचा था, उसने स्काई न्यूज को बताया कि, लोगों के पास कोई विकल्प नहीं बचा है। वहीं, एक परिवार ने कहा कि, 'हम अपने बच्चों को बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं'। वहीं, ईरान की सीमा पर बसे एक अफगानिस्तान के गांव में रहने वाले एक बुजुर्ग ने रोते हुए दुनिया से अपील की है, कि उन्हें इस हालत में नहीं छोड़ा जाए। बुजुर्ग शख्स ने कहा कि, लोग अपना अंग बेच रहे हैं, बच्चों को बेच रहे हैं और ये हमारे लिए एक त्रासदी है और दुनिया को हमारी मदद के लिए सामने आना चाहिए।

अस्पतालों में नहीं होता इलाज
अफगानिस्तान का आर्थिक पतन हो चुका है और अंतर्राष्ट्रीय मदद नहीं मिलने की वजह से अब देश के लोग पूरी तरह से बेसहारे हो चुके हैं। वगीं, देश के सैकड़ों अस्पतालों में अब इलाज बंद हो चुका है, क्योंकि मरीजों का इलाज किस तरह से किया जाए, कोई संसाधन नहीं बचे हैं और ना ही दवाई बचे हैं। हेरात शहर के हेरात क्षेत्रीय अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टर, डॉ मोहम्मद अकेल हलीमी बताते हैं कि, अस्पताल के बर्न वार्ड में मरहम बट्टी करने के लिए ना दवा है और ना पट्टियां बची हैं। पर्याप्त ड्रेसिंग वहीं होने से जो मरीज आते हैं, उनमें खतरनाक इन्फेक्शन हो जाता है। उनके परिवार, जो अपने परिवार के लिए भोजन खरीदने में असमर्थ हैं, वो भला दवाएं कहां से खरीद पाएंगे। लिहाजा मरीजों को मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है। डॉ अकेल ने स्काई न्यूज से कहा कि, डॉक्टरों के पास इलाज करने की क्षमता है, लेकिन बगैर दवा के मरीज कैसे ठीक हों?

32 लाख बच्चे मरने के कगार पर
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, अफगानिस्तान में रहने वाले लाखों लोग पूरी तरह से हताश हो चुके हैं और भूख का सामना कर रहे हैं। वहीं, 5 साल से कम उम्र के 32 लाख से ज्यादा बच्चे तीव्र कुपोषण के शिकार बन चुके हैं और अब उनके पास मदद पहुंचाने का भी वक्त खत्म होता जा रहा है। अफगानिस्तान के लिए वर्ल्ड विजन के राष्ट्रीय निदेशक चार्ल्स ने कहा कि, मानवीय सहायता कोष की सख्त जरूरत है। दूसरी तरफ तालिबान के पास ना देश चलाने के लिए कोई एक्शन प्लान है और ना ही पैसा है। तालिबान के पास सिर्फ बंदूके हैं, जिसकी बदौलत उसने अभी तक देश के लोगों को मुंह बंद रखने पर मजबूर कर रखा है।
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