सिर्फ 1 सेकंड में आएगा नतीजा, जानिए क्या है कोरोना की जांच का नया तरीका- New Study
नई दिल्ली, 25 मई: भारत समेत दुनिया के कई देशों में इस समय कोविड मरीजों की भरमार है। रोजाना लाखों नए संक्रमण के मामले आ रहे हैं। कई देशों में हेल्थ सिस्टम दम तोड़ रहा है। ऐसे में कोरोना की जांच की नई-नई तकनीक हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर से बोझ कम करने में मदद कर सकती है। हाल ही में भारत में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने खुद से जांच करने वाले एक ऐसी कोविड टेस्टिंग किट की मंजूरी दी है, जो सिर्फ 15 मिनट में घर बैठके इंफेक्शन की जानकारी देती है। ऐसे में यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा और ताइवान के नेशनल चियाओ तुंग यूनिवर्सिटी ने एक कोविड-19 की टेस्टिंग का एक ऐसा तरीका ईजाद किया है, जो सिर्फ 1 सेकंड में नतीजा दे सकता है।

सिर्फ 1 सेकंड में आएगी कोरोना की रिपोर्ट
अगर सब कुछ उम्मीदों के मुताबिक रहा तो आने वाले दिनों में कोरोना की जांच का तरीका बहुत ही आसान हो जाएगा और टेस्टिंग के नतीजे लगभग उसी समय मिलने शुरू हो जाएंगे, जिस समय सैंपल लिए गए हों। इसके लिए यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा और ताइवान के नेशनल चियाओ तुंग यूनिवर्सिटी ने एक तेजी से करने वाला और संवेदनशील टेस्टिंग तरीका विकसित किया है। इस कोविड-19 जांच में बायोमार्कर्स के लिए सेंसर सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे सिर्फ 1 सेकंड में ही कोरोना वायरस का पता चल जाता है। इस सिस्टम के बारे में एक स्टडी जर्नल ऑफ वैक्यूम साइंस एंड टेक्नोलॉजी बी में जानकारी दी गई है। इस शोध के लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा में शोधकर्ता मिंघन शियान ने कहा है, 'यह कोविड-19 की धीमी टेस्टिंग के मुद्दे को पूरी तरह से बदल कर रख सकता है।' इस जर्नल का प्रकाशन अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स करता है और उसी की ओर से जारी प्रेस रिलीज में मिंघन के हवाले से इस गेमचेंजर जांच के बारे में बताया गया है।

बायोसेंसर स्ट्रिप का होता है इस्तेमाल
वायरस की मौजूदगी का पता लगाने के लिए बायोमार्कर (जैसे कोविड-19 की सबसे प्रचलित आरटी-पीसीआर जांच में वायरल आरएनए की कॉपी बढ़ाई जाती है) की संख्या बढ़ाने की जरूरत पड़ती है या फिर टारगेट बायोमार्कर के लिए अनिवार्य संकेतों को बढ़ाना होता है। नई स्टडी में शोधकर्ताओं के ग्रुप ने दूसरी तकनीक का इस्तेमाल किया है। इस टेस्ट में बायोसेंसर स्ट्रिप का इस्तेमाल किया जाता है जो कि बाजार में उपलब्ध ग्लूकोज टेस्ट स्ट्रिप्स के जैसा है। इसके सिरे पर एक छोटा सा माइक्रोफ्लूइडिक चैनल है, जहां पर टेस्ट वाला सैंपल (फ्लूइड) डाला जाता है। शियान के मुताबिक, 'माइक्रोफ्लूइडिक चैनल के अंदर कुछ इलेक्ट्रोड्स फ्लूइड से संपर्क में आते हैं। एक पर सोने की लेप चढ़ी होती है, और रासायनिक तरीके के माध्यम से कोविड से संबंधित एंटीबॉडी सोने की लेप से जुड़े होते हैं। '

कोविड जांच के नतीजे इतनी जल्दी कैसे मिलते हैं ?
जब जांच की प्रक्रिया चल रही होती है तो सेंसर के स्ट्रिप्स को एक कनेक्टर के जरिए एक सर्किट बोर्ड से जोड़ा जाता है और कोविड एंटीबॉडी से जुड़े सोने की परत वाले इलेक्ट्रोड के अलावा एक और सहायक इलेक्ट्रोड के बीच एक छोटे इलेक्ट्रिकल टेस्ट सिग्नल पहुंचाए जाते हैं। इसके बाद इस सिग्नल को वापस सर्किट बोर्ड में विश्लेषण के लिए भेजा जाता है। इस टेस्ट के बाद सिस्टम के सेंसर स्ट्रिप्स को निश्चित रूप से हटा देना होता है, जबकि सर्किट बोर्ड का दोबारा से उपयोग किया जा सकता है। इसका मतलब ये है कि इस इलेक्ट्रिकल सिग्नल के जरिए न सिर्फ 1 सेकंड में सैंपल पॉजिटिव या निगेटिव होने का पता चलता है, बल्कि इस टेस्ट की कीमत भी बहुत कम हो सकती है।

घर में जांच करने वाली टेस्टिंग किट को मंजूरी
इधर भारत में भी आईसीएमआर ने हाल ही में एक सेल्फ-टेस्टिंग किट को मंजूरी दी है, जिसके जरिए लोग अपने घर में ही नाक से कोरोना जांच के लिए सैंपल लेकर परीक्षण कर सकते हैं। यह टेस्टिंग सिर्फ सिम्पटोमेटिक मरीजों के लिए होगी। इस बीच दवा कंपनी सिप्ला ने भी मंगलवार से 'वीराजेन' नाम से एक आरटी-पीसीआर टेस्ट किट बाजार में लॉन्च किया है। बायोस्पेक्ट्रम मैगजीन की वेबसाइट के मुताबिक 'यह स्टैंडर्ड आईसीएमआर टेस्ट की तुलना में 98.6 फीसदी संवेदनशील और 98.8 फीसदी विशिष्ट है.....'












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