कर्ज के जाल में दुनिया को फंसाने निकला चीन खुद फंसा, BRI के देशों को देने पड़े 240 अरब डॉलर, डूबेंगें बैंक?
चीन ने छोटे देशों को बेलऑउट देने में 240 अरब डॉलर खर्च किए हैं और जिन देशों को ये कर्ज दिया गया है, वो चीनी कर्ज के बाद भी वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ से लोन के लिए बात कर रहे हैं।

China Belt & Road Study: पूरी दुनिया को इन्फ्रास्ट्रक्चर जाल में बांधकर विश्व पर वर्चस्व जमाने निकला चीन अब बुरी तरह से खुद उलझ गया है और मंगलवार को प्रकाशित एक स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है, कि चीन ने 2008 से 2021 के बीच 22 विकासशील देशों को आर्थिक संकट से उबारने के लिए 240 अरब डॉलर खर्च किए हैं और 2021 के बाद से ये राशि और भी ज्यादा बढ़ गई है, क्योंकि जिन देशों को चीन ने कर्ज बांटे हैं, उनकी आर्थिक स्थिति इतनी ज्यादा खराब हो चुकी है, कि वो 'बेल्ट एंड रोड' का कर्ज चुकाने में तो सक्षम नहीं ही हैं, ये देश अपना खर्च संभालने में भी सक्षम नहीं हैं। लिहाजा, इन देशों को डूबने से बचाने के लिए अब चीन को अरबों डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिसका असर चीन की अर्थव्यवस्था पर हो रहा है।

चीन के 240 अरब डॉलर फंसे
'बेल्ट एंड रोड' इनिशिएटिव के जरिए चीन की मंशा छोटे देशों पर आर्थिक वर्चस्व कायम करने की थी, जिसमें चीन कामयाब भी रहा है, लेकिन अब स्थिति ये है, कि ये देश अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी चीन पर निर्भर हो रहे हैं। अगर चीन ने इन्हें पैसे नहीं दिए, तो ये डूब जाएंगे और चीन का सारा कर्ज अटक जाएगा। वर्ल्ड बैंक, हार्वर्ड केनेडी स्कूल, एडडाटा और कील इंस्टीट्यूट फॉर द वर्ल्ड के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2021 के बीच चीन ने इन देशों को 240 अरब डॉलर में से करीब 80 प्रतिशत का कर्ज दिया है। जिन देशों को चीन ने बेलऑफट पैकेज बांटे हैं, उन देशों में अर्जेंटीना, मंगोलिया, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देश शामिल हैं और चीन के सामने दिक्कत ये है, कि ये देश अगले कई सालों तक चीन का उधार लौटा नहीं सकते हैं। स्टडी में कहा गया है, कि चीन ने विकासशील देशों में बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए सैकड़ों अरब डॉलर उधार दिए हैं, लेकिन 2016 के बाद से चीन ने उधार देना बंद कर दिया है, क्योंकि कई परियोजनाएं ठप पड़ गई हैं, क्योंकि उन परियोजनाओं के लिए पैसे ही नहीं बचे हैं। जिन देशों में ये परियोजनाएं हैं, उनके पास अब पैसे नहीं हैं, कि उन्हें परियोजनाओं में लगा सकें और अब कई साल लेट होने की वजह से उनकी लागत में भी भारी इजाफा हो चुका है।
फंस गये हैं चीन के बैंक
विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री और अध्ययन के लेखकों में से एक कारमेन रेनहार्ट ने कहा, कि "बीजिंग अंततः अपने ही बैंकों को बचाने की कोशिश कर रहा है"। उन्होंने कहा, कि "यही कारण है कि यह अंतरराष्ट्रीय बेलआउट ऋण देने के जोखिम भरे व्यवसाय में शामिल हो गया है"। स्टडी में पाया गया है, कि चीन ने जिन देशों को कर्ज बांटे हैं, उन देशों के ऊपर साल 2010 में सिर्फ 5 प्रतिशत कर्ज था, लेकिन चीनी कर्ज की वजह से साल 2022 में उन देशों पर 60 प्रतिशत से ज्यादा का कर्ज पोर्टफोलियो हो गया है। अर्जेंटीना के ऊपर 111.8 अरब डॉलर का कर्ज हो गया है, जबकि पाकस्तान के ऊपर 48.5 अरब डॉलर का कर्ज हो गया है। वहीं, मिस्र के ऊपर 15.6 अरब डॉलर का कर्ज हो गया है। स्थिति ये है, कि ये देश अब कर्ज को लौटाने की स्थिति में नहीं हैं। कर्ज की वजह से पाकिस्तान में जहां 46 प्रतिशत से ऊपर महंगाई दर जा चुका है, तो अर्जेंटीना का महंगाई दर 85 प्रतिशत से ऊपर है। कर्ज नहीं चुका पाने की वजह से चीनी बैंकों के ऊपर इसका सीधा असर हो रहा है और चीन अपने बैंकों को बचाने के लिए संघर्ष करने लगा है। नतीजा ये हैं, कि चीन फिलहाल श्रीलंका, पाकिस्तान, जांबिया और घाना जैसे देशों के साथ कर्ज के पुनर्गठन पर बात कर रहा है।

चीन पर भारी पड़ सकता है कर्ज देने की नीति
चीन ने अमेरिकी वर्चस्व को कुंद करने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया और एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में उसने अरबों डॉलर के कर्ज बांटे। लेकिन, अब स्थिति ये है, कि उन छोटे देशों के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स सफेद हाथी की तरह साबित हुए। जैसे श्रीलंका के लिए हंबनटोटा प्रोजेक्ट, जिसे बाद में चीन ने श्रीलंका से 99 सालों की लीज पर ले लिया। चीन सरकार के स्वामित्व वाले एक बैंक, पीपुल्स बैंक ऑफ चायना (POBC) ने 170 अरब डॉलर के कर्ज बाटें हैं। अस बैंक ने सूरीनाम, श्रीलंका और मिस्र जैसे देशों को लोन दिया है, जिनमें श्रीलंका दिवालिया हो चुका है और मिस्र अगले कुछ महीनों में दिवालिया हो जाएगा। लिहाजा, चीनी बैंक का पैसा फंस गया है। वहीं, चीनी बैंकों ने ब्रिज लोन और बैलेंस ऑफ पेमेंट के तहत 70 अरब डॉलर बांटे हैं और ये रकम भी फंस चुका है।

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शिकारी खुद क्यों बन गया शिकार?
संयुक्त राज्य अमेरिका में विलियम एंड मैरी कॉलेज में एक शोध प्रयोगशाला, रिपोर्ट के लेखकों में से एक और एडडाटा के निदेशक ब्रैड पार्क्स ने कहा, कि चीन का बेलऑउट पैकेज "अपारदर्शी और असंगठित" है। रिपोर्ट में कहा गया है, कि बेलआउट पैकेज कर्ज मुख्य रूप से मध्यम आय वाले देशों में केंद्रित हैं, जो चीनी बैंकों की बैलेंस शीट को खतरे में डाल रहे हैं। चीनी बैंकों के बैलेंस सीट का चार से पांचवां हिस्सा चीन के द्वारा दिए गये कर्ज के पैकेज हैं और अब छोटे देशों के पास पैसे ही नहीं हैं, कि वो चीनी बैंकों का उधार चुका सकें, जबकि उन देशों के ऊपर कर्ज की मैच्योरिटी पूरी हो चुकी है। श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों की स्थिति तो इस हद तक बुरी हो चुकी है, कि चीनी बेलऑउट से इनकी आर्थिक स्थिति में सुधार पर कोई असर नहीं पड़ा, लिहाजा ये देश लोन के लिए आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक से भी बात कर रहे हैं। आईएमएफ ने श्रीलंका के लिए बेलऑउट पैकेज जारी कर दिया है, जबकि पाकिस्तान और आईएमएफ के बीच बात नहीं बनी है। लिहाजा, आशंका जताई जा रही है, कि आने वाले वक्त में चीन के बैंकों के लिए इन झटकों से उबर पाना काफी मुश्किल साबित होगा, क्योंकि चीन ने जो कर्ज बांटे हैं, उसके डूबने की संभावना सबसे ज्यादा है।












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