बाइडन के फ़ैसले से बढ़ेगा अमेरिका पर कर्ज़, आ सकती हैं मुश्किलें

बाइडन
Reuters
बाइडन

20 जनवरी बुधवार को 78 वर्षीय जोसेफ़ रॉबनेट बाइडन जूनियर विश्व के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति बन जाएंगे. राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों के हमले के डर के कारण राजधानी वाशिंगटन डीसी में सुरक्षा के बंदोबस्त तगड़े होंगे. कहा जा रहा है कि इराक़ या अफ़ग़ानिस्तान में भी अमेरिकी सैनिकों की संख्या उतनी नहीं होगी जितनी इस अवसर पर वाशिंगटन डीसी में होगी.

हालाँकि इस बार शपथ समारोह सुरक्षा और महामारी के कारण फीका रहेगा, लेकिन इसके बावजूद इस बार भी 20 जनवरी को समारोह के दौरान दुनिया अमेरिका की परंपरागत चमक-दमक और रौनक देखेगी. ये समारोह अमेरिका की कामयाबी और खुशहाली को शो-केस करने का भी एक अवसर होता है.

लेकिन इन समारोहों को देखकर कौन कहेगा कि अमेरिका सिर से पैर तक कर्ज़ में डूबा हुआ है और इसकी आने वाली दो पीढ़ियाँ कर्ज़ चुकाने में गुज़ार देंगी.

ऐसे में जो बाइडन ने अपने कार्यकाल की शुरुआत से पहले ऐसा कदम उठाने की बात कही है जिससे अमेरिका पर कर्ज़ और बढ़ जाएगा.

गुरुवार को बाइडन ने लगभग 2 खरब डॉलर के एक आर्थिक पैकेज की घोषणा की, जिसका उद्देश्य महामारी से लड़ना, नागरिकों को टीका लगवाना, कम आय वालों की नगदी से सहायता करना, छोटे व्यापारियों की मदद करना और पूरी अर्थव्यवस्था को गति देना है. इसे फ़ेडरल बैंक फाइनेंस करेगा.

क़र्ज़ में डूबा अमेरिका

गुरुवार को किये गए पैकेज के ऐलान से पहले, पिछले नौ महीनों में दिए गए आर्थिक पैकेज में से सरकार 3.5 खरब डॉलर ख़र्च चुकी है. महामारी की रोकथाम और बड़े पैकेज के रोल आउट करने के बावजूद विकास दर कमज़ोर है और महामारी तेज़ी से फैल रही है. गुरुवार तक 3,75,000 अमेरिकी इस बीमारी से अपनी जान गंवा चुके हैं और हर दिन औसतन 4,000 लोग इसका शिकार हो रहे हैं.

ग़रीब जनता परेशान है. छोटे व्यापारी निराश हैं. बेरोज़गारी एक बार फिर से बढ़ रही है. इस लिहाज़ से इस पैकेज की लोगों को सख़्त ज़रुरत है. ये एक ऐसी कड़वी दवा है जिसे पीना देश के लिए ज़रूरी है, इस आशा में कि देश की सेहत बहाल हो जाएगी. लेकिन इसका उल्टा असर भी हो सकता है.

बाइडन
Reuters
बाइडन

प्रोफेसर स्टीव हैंकि जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में एप्लाइड अर्थशास्त्र के एक प्रसिद्ध शिक्षक हैं और राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रह चुके हैं. उन्होंने जो बाइडन के नए आर्थिक पैकेज पर अमेरिका से बीबीसी को ईमेल द्वारा बताया कि इससे सरकार का क़र्ज़ और भी बढ़ेगा. वो कहते हैं, "अमेरिकी सरकार को खर्च में वृद्धि की क़ीमत चुकानी पड़ेगी. राष्ट्रीय ऋण में वृद्धि कर ख़र्च को फ़ाइनैंस किया जाएगा"

पिछले साल दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका का सकल घरेलू उत्पाद 21. 44 खरब डॉलर था लेकिन इसका राष्ट्रीय ऋण 27 खरब डॉलर था. अगर ये क़र्ज़ देश की 32 करोड़ आबादी में बाँट दिया जाए तो हर नागरिक के नाम 23,500 डॉलर का क़र्ज़ होगा. इसका अर्थ ये हुआ कि अमेरिका ने अगर अपनी पूरी अर्थव्यवस्था बेच दी, तब भी वो अपने पूरे क़र्ज़ को अदा नहीं कर पाएगा.

कौन है इसका ज़िम्मेदार?

अमेरिकी आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के बढ़ते क़र्ज़ के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ज़िम्मेदार हैं. उनके अनुसार ट्रंप ने सत्ता में आने से पहले क़र्ज़ को कम करने का वादा किया था लेकिन इसे पूरा नहीं किया गया.

राष्ट्रपति ट्रंप के चार साल में देश का क़र्ज़ 7.8 ख़रब डॉलर के हिसाब से बढ़ा. जब राष्ट्रपति ने 2016 में चुनाव जीता था तो उस समय प्रशासन का क़र्ज़ 19.95 ट्रिलियन डॉलर था. 31 दिसंबर, 2020 तक, राष्ट्रीय ऋण 27.75 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया

ट्रंप
Reuters
ट्रंप

प्रो पुब्लिका नाम की एक पत्रिका में पिछले हफ़्ते छपे एक लेख के अनुसार ट्रंप के कार्यकाल के दौरान संघीय वित्त महामारी के आने से पहले भी गंभीर स्तिथि में था. ये एक ऐसे समय में हुआ जब अर्थव्यवस्था में उछाल आ रहा था और बेरोज़गारी ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर पर थी. ट्रंप प्रशासन के स्वयं के विवरण के अनुसार महामारी के पहले ही राष्ट्रीय ऋण का स्तर "संकट" में था.

इस संकट की वजह थी ट्रंप द्वारा टैक्स में कटौती और सरकारी खर्च में रोक न लगाना, जैसा कि वॉशिंगटन पोस्ट अख़बार ने हाल में लिखा, "ट्रंप ने 2017 में टैक्स में भारी कटौती की और गंभीर खर्च पर कोई संयम नहीं बरता जिसके कारण राष्ट्रीय ऋण में ज़रुरत से ज़्यादा इज़ाफा हुआ." याद रहे कि ट्रंप ने कॉर्पोरेट टैक्स 35 प्रतिशत से घटाकर 21 प्रतिशत कर दिया था.

लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के रिकॉर्ड का बचाव करने वाले तर्क देते हैं कि उनके काल में अमेरिका ने क़र्ज़ लिए तो इसका फायदा भी नज़र आया - आर्थिक विकास की दर में बढ़ोतरी हुई, महँगाई कम हुई, बेरोज़गारी में रिकॉर्ड तोड़ कमी आयी और ब्याज़दर कम हुए. दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री कहते हैं कि राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनसे पहले राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के दौर में सब से अधिक क़र्ज़ बढ़े.

जोहान्स केपलर यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रिया के कुछ शिक्षकों ने अमेरिकी राष्ट्रपतियों द्वारा खर्च के रिकॉर्ड पर एक रिसर्च पेपर तैयार किया है जिसके अनुसार ओबामा के दौर में खर्च बढ़े थे और इससे पहले जॉर्ज बुश के दौर में और ज़्यादा भी ऐसा ही हुआ था क्योंकि राष्ट्रपति बुश के दौर में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ के ख़िलाफ़ सैन्य अभियान शुरू किया था जो सालों तक चला.

लेकिन अब कर्ज़ और अधिक बढे हैं, जैसा कि प्रो पुब्लिका के लेख में दावा किया गया, "हमारा राष्ट्रीय ऋण उस स्तर पर पहुंच गया है जो द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में था. याद रहे कि 75 साल पहले युद्ध के कारण कर्ज़ बढ़ा था, ट्रंप के दौर में कोई सैन्य अभियान नहीं शुरू किया गया. द्वितीय विश्व युद्ध के क़र्ज़ों की खाई से निकलना आसान था क्योंकि सरकार के पास मेडिकेयर और सोशल सिक्योरिटी जैसे मोटे खर्च वाली ज़िम्मेदारी नहीं थीं"

बाइडन के बेटे हंटर टैक्स मामलों को लेकर जांच के दायरे में

बाइडन का रुख़ भारत से जुड़े कई मसलों पर ट्रंप से है अलग

ताज़ा पैकेज के लिए क़र्ज़ कौन देगा और इसके नतीजे क्या होंगे?

अमेरिका में जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के प्रसिध्य अर्थशास्त्री स्टीव हैंकि ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ताज़ा कर्ज़ फेडरल रिजर्व (भारत में सेंट्रल बैंक आरबीआई जैसी वित्तीय संस्था) देगा.

इसका नतीजा क्या होगा इस पर प्रो हैंकि प्रकाश डालते हैं, "इसका मतलब ये है कि अतिरिक्त महँगाई बढ़ने का समय नज़दीक है. गहरे कर्ज की खाई में जाने के अलावा, नए सरकारी ख़र्चों के बोझ को कुछ नए करों को उठाना पड़ेगा, और नए करों के बोझ से निजी क्षेत्र में जीवन मुश्किल हो जाएगा."

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+