बीबीसी पड़ताल: सीरिया में बशर अल-असद यूं पहुंचे जीत के क़रीब

बशर अल असद
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सीरिया में सात सालों के भयानक गृहयुद्ध में साढ़े तीन लाख से ज़्यादा लोगों के मारे जाने के बाद राष्ट्रपति बशर अल-असद उन ताक़तों से जीत हासिल करने के क़रीब हैं जो उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकना चाहती थीं.

आख़िर बशर अल-असद कैसे इस भयावह युद्ध में जीत के क़रीब पहुंचे? बीबीसी पैनोरमा और बीबीसी अरबी की संयुक्त पड़ताल में पता चला है कि रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की भूमिका असद के लिए रणनीतिक रूप से काफ़ी अहम रही है.

असद की सरकार ने सीरिया में लोगों के ख़िलाफ़ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर किया गया. इस बात के पक्के सबूत हैं और बीबीसी पूरी तरह से आश्वस्त है कि सीरिया में सितंबर 2013 से कम से कम 106 रासायनिक हमले हुए हैं.

इसी दौरान राष्ट्रपति बशर अल-असद ने इंटरनेशनल केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (सीडब्ल्यूसी) पर हस्ताक्षर किया था और देश के रासायनिक हथियारों के ज़ख़ीरे को नष्ट करने पर सहमति जताई थी.

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सीरिया ने राजधानी दमिष्क के उपनगरीय इलाक़ों में एक रासायनिक हमले के बाद सीडब्ल्यूसी पर हस्ताक्षर किया था. इस हमले में नर्व एजेंट का इस्तेमाल किया गया था और सैकड़ों लोग मारे गए थे. पीड़ितों की दिल दहलाने वाली तस्वीरें देख दुनिया स्तब्ध रह गई थी.

पश्चिम के देशों ने इस हमले को लेकर कहा था कि ऐसा केवल सरकार ही कर सकती है, लेकिन राष्ट्रपति असद ने इस हमले के लिए विपक्ष को ज़िम्मेदार ठहराया था.

तब अमरीका ने सीरिया पर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी थी, लेकिन असद के अहम सहयोगी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सीरिया में रासायनिक हथियारों के ज़ख़ीरे को नष्ट करवाने के समझौत पर पहुंचने में कामयाब रहे थे. इस समझौते के बाद अमरीका नरम पड़ गया था.

ऑर्गेनाइजेशन फोर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन्स (ओपीसीडब्ल्यू) और संयुक्त राष्ट्र की ओर से सीरियाई सरकार के घोषित 1,300 टन रासायनिक हथियार नष्ट किए जाने के बावजूद सीरिया में रासायनिक हमले जारी रहे.

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2016 में सीरिया के अलेप्पो शहर में असद की सेना आने से पहले विपक्षियों का क़ब्जा था. अबु जाफ़र अलेप्पो शहर में रहे हैं. वो कहते हैं, ''रासयनिक हमले ख़ौफ़नाक थे. बिना किसी अहसास के मौत की नींद सुला दी जाती थी. लेकिन इस हमले के बाद जो हालात पैदा होते हैं उनसे लोग धीरे-धीरे लोग मरते हैं. ऐसा लगता है कि पूरे इलाक़े में ऑक्सिजन नहीं है और लोग मौत के समंदर में गोते लगा रहे हैं. सच में यह बेहद ख़ौफ़नाक होता है.'' हालांकि असद हमेशा रासायनिक हमले से इनकार करते रहे हैं.

रासायनिक हथियार क्या होता है?

ओपीसीडब्ल्यू और ग्लोबल वॉचडॉग दुनिया भर में रासायनिक हथियारों पर नज़र रखते हैं और केमिकल वेपन्स कन्वेन्शन को भी ये ही संगठन लागू करवाते हैं.

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इनका कहना है कि रासायनिक हथियारों में लोगों को जानबूझकर मारने के इरादे से एक केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है या फिर इसकी मंशा ज़हरीले तत्वों के ज़रिए लोगों का नुक़सान पहुंचाना होता है.

इंटरनेशनल ह्यूमैनिटेरीअन लॉ के तहत रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल पर पाबंदी है. इसका इस्तेमाल विषम परिस्थितियों में किया जा सकता है, लेकिन इसके पीछे एक मज़बूत सैन्य तर्क होना चाहिए. इन हथियारों के इस्तेमाल से वातावरण पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है. रासायनिक हथियारों का ज़ख़्म बहुत ख़तरनाक होता है और इससे अनावश्यक पीड़ा लंबे वक़्त तक रहती है.

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सीरिया में 2014 के बाद से ओपीसीडब्ल्यू के फैक्ट फाइडिंग मिशन (एफ़एफ़एम) और ओपीसीडब्ल्यू-यूएन की संयुक्त जांच टीम ने ज़हरीले केमिकल के इस्तेमाल की जांच की है. इस जांच टीम का कहना है कि सितंबर 2013 से अप्रैल 2018 के बीच केमिकल और हथियार के रूप में केमिकल के इस्तेमाल की बात सामने आई है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय आयोग और यूएन से जुड़ी अन्य टीमों ने भी अपनी जांच में कहा है कि 18 अन्य मामलों में भी रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया है.

पैनोरमा और बीबीसी अरबी ने सीरिया में रासायनिक हमले की 164 रिपोर्टों की पड़ताल की. सीरिया में ये घटनाएं सीडब्ल्यूसी पर उसके हस्ताक्षर किए जाने के बाद हुए हैं.

बीबीसी टीम इस बात को लेकर सुनिश्चित है कि 164 हमलों में से 106 में रासायनिक हथियार इस्तेमाल किए गए और इस बात के पक्के सबूत हैं. दूसरी तरफ़ कुछ ही घटनाएं मीडिया में सुर्खियां बनीं. हमले का जो पैटर्न है उससे पता चलता है कि रासायनिक हमले का इस्तेमाल किया गया है.

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सीरिया में ओपीसीडब्ल्यू मिशन के पूर्व प्रमुख जूलियन तंगाएरे ने बीबीसी से कहा, ''सरकारी सेना से जो संकेत मिले हैं उस आधार पर रासायनिक हमले की बात पुख़्ता होती है. सेना ने इसका इस्तेमाल करना जारी रखा.''

संयुक्त राष्ट्र में ब्रिटेन की स्थायी प्रतिनिधि कैरेन पिर्स का कहना है सीरिया में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल 'धृष्टता' है. वो कहती हैं, ''यह ऐसा इसलिए नहीं है कि इसका असर बहुत ख़तरनाक होता है बल्कि ये प्रतिबंधित हथियार हैं. इन पर पिछले 100 सालों से प्रतिबंध हैं.''

बीबीसी ने सितंबर 2013 के बाद से सीरया में रासायनिक हमले की 164 रिपोर्टों की पड़ताल की है. ये रिपोर्ट्स कई स्रोतों से आई हैं और इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध नहीं है. ये स्रोत सीरिया में किसी संघर्ष का हिस्सा भी नहीं हैं. इसमें अंतरराष्ट्रीय आयोग, मानवाधिकार समूह, मेडिकल ऑर्गेनाइजेशन और थिंक टैंक्स शामिल हैं.

इस पड़ताल में बीबीसी के रिसर्चरों ने यूएन और ओपीसीडब्ल्यू की पहले की जांचों की कई स्वतंत्र विश्लेषकों की मदद से समीक्षा की है. इस समीक्षा में सभी हमलों के सार्वजनिक डेटा की कसौटी पर भी कसा गया है. इसमें पीड़ितों और चश्मदीदों के बयान के साथ हमले की तस्वीरों और वीडियो को भी शामिल किया गया है. बीबीसी पड़ताल की विधि की जांच विशेषज्ञ रिसर्चरों से भी कराई गई है.

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बीबीसी रिसर्चरों ने अपनी पड़ताल में उन घटनाओं को शामिल नहीं किया है, जो एक ही स्रोत से सामने आए. मतलब घटनाओं के पक्ष में पर्याप्त सबूत होने के बाद ही उन्हें पड़ताल का हिस्सा बनाया गया. इस पड़ताल में साफ़ होता है कि कुल 106 हमलों में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल हुआ था.

बीबीसी टीम को सीरिया में ग्राउंड पर जाकर फ़िल्म बनाने की अनुमति नहीं मिली. यहां जाने की भी अनुमति नहीं मिली इसलिए हमलोग स्पष्ट रूप से इनके सबूतों की पुष्टि नहीं कर सकते. हालांकि हर मामले के पुख्ता सबूत हैं. सबूत के तौर पर वीडियो, तस्वीरें और लोकेशन की विस्तृत जानकारी के साथ टाइमिंग की भी व्याख्या है.

बीबीसी डेटा के अनुसार सीरिया के उत्तरी-पश्चिमी प्रांत इदलिब में इस तरह के हमले सबसे ज़्यादा हुए हैं. इसके बाद पड़ोसी प्रांत हामा, एलेप्पो और राजधानी दमिष्क के पास पूर्वी गूटा में ये हमले हुए. ये सारे इलाक़े विपक्षियों के क़ब्जे वाले थे और ये युद्धग्रस्त रहे हैं.

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रासायनिक हमले के बाद हामा प्रांत के कफ़्र ज़िता में सबसे ज़्यादा लोग हताहत हुए. इसके बाद पूर्वी गूटा के डूमा में हताहतों की संख्या सबसे ज़्यादा थी. ये दोनों शहर विद्रोही लड़ाकों और सरकार की सेना के बीच की जंग के मैदान रहे हैं.

रिपोर्टों के अनुसार चार अप्रैल 2017 को इदलिब प्रांत के ख़ान शेइख़ौन शहर में एक ही बार में 80 लोग मारे गए थे. ये रासायनिक हमले जानलेवा थे. यूएन के ह्यूमन राइट्स का कहना है कि ज़्यादातर हमलों में आम नागरिक मारे गए और ज़ख़्मी हुए और इनमें प्रतिबंधित हथियारों का इस्तेमाल किया गया. इस तरह के हमलों में घनी आबादी वाले इलाक़ों को निशाना बनाया गया.

ज़्यादातर सबूतों से सीरियाई सरकार घेरे में

ओपीसीडब्ल्यू और यूएन के संयुक्त मिशन के अधिकारियों ने जून 2014 में सीरिया में सभी घोषित रासायनिक हथियारों के ख़ात्मे की घोषणा की. सीरिया में रसायानिक हथियारों को नष्ट करने की सहमति पर रूस और अमरीका 2013 में पहुंचे थे.

ओपीसीडब्ल्यू के अधिकारियों में से एक इंस्पेक्टर टैंगाइर का कहना है, ''जिन ज़ख़ीरों के बारे में हमें पता था, उन्हें नष्ट कर दिया गया था. हमें वही जानकारी थी, जो हमें दी गई थी. यह मामला भरोसे का था. जिन ज़ख़ीरों की घोषणा की गई उन पर हमने भरोसा किया.''

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जुलाई 2018 में ओपीसीडब्ल्यू के महानिदेशक अहमत उज़ुमकु ने संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद से कहा कि उनकी टीम सभी मुद्दों पर स्पष्टीकरण देने की कोशिश कर रही है. जून 2014 में सीरिया में रासायनिक हथियारों के ख़त्म होने की घोषणा के बाद भी इसका इस्तेमाल थमा नहीं. हमलों में इन हथियारों के इस्तेमाल जारी रहे.

चार अप्रैल 2017 को ख़ान शेइख़ौन में अब्दुल योशेफ़ की पत्नी, उनके 11 महीने के दो जुड़वा बच्चे, दो भाई, एक भतीजा और कई पड़ोसी मारे गए थे. वो उस घटना को याद करते हुए बताते हैं कि अचानक से उनके पड़ोसी, परिवार के सदस्य ज़मीन पर गिर गए.

वो कहते हैं, ''सभी कांप रहे थे और उनके मुंह से झाग निकल रहे थे. वो ख़ौफ़नाक पल था. मुझे बाद में पता चला कि ये रासायनिक हमला है. मुझे बेहोशी की हालत में अस्पताल ले जाया गया और मुझे होश आया तो अपनी पत्नी और बच्चों के बारे में पूछा. 15 मिनट बाद मेरे सामने सबके शव पड़े थे. मैंने अपने जीवन के सारे अनमोल रिश्ते खो दिए.''

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ओपीसीडब्ल्यू और यूएन की संयुक्त जांच में उन लोगों को भी बड़ी संख्या में शामिल किया गया है जिन्होंने सरीन गैस के हमले को देखा था. सरीन के बारे में कहा जाता है कि यह साइनाइड से 20 गुना ज़्यादा ख़तरनाक होती है. सभी तरह के नर्व एजेंट से एन्ज़ाइम रासायनिक रिएक्शन को बढ़ा देता है.

यह नर्व सेल के लिए ख़तरनाक साबित होता है. संयुक्त जांच दल का कहना है कि वो इस बात को भरोसे के साथ कहने की स्थिति में हैं कि सीरियाई सरकार सरीन छोड़ने के लिए ज़िम्मेदार है. सीरियाई एयरफ़ोर्स पर आरोप है कि उसने शहरों में बम गिराए थे.

ख़ान शेइख़ौन से जो तस्वीरें आई थीं, उसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने सीरियाई एयर फ़ोर्स के बेस पर मिसाइल हमले का आदेश दिया था. राष्ट्रपति बशर अल-असद का कहना है कि ख़ान शेइख़ौन की घटना को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.

वहीं रूस का कहना था कि सीरिया ने आतंकियों के ठिकानों पर बमबारी की थी. रूस का कहना था कि वहां आतंकियों ने रासायनिक हथियारों के ज़ख़ीरे रखे थे.

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हालांकि ओपीसीडब्ल्यू के एक सदस्य स्टीफ़न मोग्ल का कहना है कि उनकी टीम को इस बात के सबूत मिले हैं कि ख़ान शेइख़ौन में सीरियाई सरकार ने सरीन का इस्तेमाल किया था. उन्होंने कहा कि सरीन सैंपल और 2014 में सीरिया में नष्ट किए गए रासायनिक हथियारों के बीच स्पष्ट मेल है.

संयुक्त जांच दल का कहना है कि सरीन का सैंपल सीरिया के ज़ख़ीरों से इस क़दर मिलता है कि इससे शक नहीं पैदा होता बल्कि सीरिया की संलिप्तता साबित होती है. मोग्ल कहते हैं, ''इससे साबित होता है कि सीरिया में सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ था.''

सबूतों में वीडियो, तस्वीरें और चश्मदीदों के बयानों के आधार पर पता चला है कि 106 हमलों में से 51 हमले हवाई हमले थे. बीबीसी का मानना है कि ये हवाई हमले सीरियाई सरकार की तरफ़ से किए गए थे.

हालांकि 2015 के बाद से रूस ने भी सीरिया में असद के समर्थन में कई हवाई हमले किए थे. यूएन ह्यूमन राइट्स का कहना है कि जांच में इस बात की पुष्टि नहीं हुई है कि रूसी बलों ने सीरिया में रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया था.

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रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल रणनीतिक साबित हुए

चैटम हाउस के डॉ ख़ातिब का कहना है कि रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल असद की सरकार ने वहीं किया जहां उसे कड़ा संदेश देना था. उनका कहना है कि यह संदेश स्थानीय आबादी को भी देना था कि विद्रोहियों की मौजूदगी असद की सेना को गंवारा नहीं है.

रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल आख़िरी सज़ा के तौर पर किया गया ताकि लोगों के बीच डर पैदा किया जा सके. संघर्ष में जब भी असद की सरकार को झटका लगा तो उन्होंने रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया.

लोगों के लिए रासायनिक हथियारों से ज़्यादा डरावना कुछ और नहीं हो सकता है. एलेप्पो की जंग असद के लिए काफ़ी चुनौतीपूर्ण बन गई थी, लेकिन वहां भी रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल रणनीति के तौर पर किया गया.

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अबु जाफ़र ने सीरियाई विपक्ष के साथ एक फोरेंसिक साइंटिस्ट के तौर पर काम किया है और उस दौरान एल्लेपो में ही थे, जब वहां हमले हो रहे थे. जाफ़र ने रासायनिक हमले में मारे गए लोगों के शवों की जांच की थी.

वो कहते हैं, ''मैं शवघरों में गया था और वहां से क्लोरिन की गंध नाक फाड़ने वाली थी. जब मैंने शवों की जांच की तो पता चला कि क्लोरिन से दम घुंटा था. इस इलाक़े के आकाश में हमेशा लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर दिखते थे.''

जब क्लोरिन को छोड़ा जाता है तो यह तत्काल गैस में बदल जाता है. यह गैस हवा से भी भारी होती है और कम दबाव वाले इलाक़ों में प्रवेश कर जाती है. लोग बेसमेंट में छुप रहे थे और पूरी तरह से अफ़रातफ़री का माहौल था. जब क्लोरिन नम टिशू जैसे- आंख, गला और फेफड़े के संपर्क में आता है तो इससे निकलने वाला एसिड काफ़ी नुकसान पहुंचा देता है.

हालांकि सीरियाई सरकार का कहना है कि उसने कभी क्लोरिन का इस्तेमाल नहीं किया. लेकिन बीबीसी की पड़ताल में पता चला है कि एल्लेपो में 11 ठिकानों पर हुए हमले में क्लोरिन का इस्तेमाल किया गया था.

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