Syria: बशर अल-असद के शासन का अंत, सीरिया की घटनाओं को लेकर नई दिल्ली चौकन्नी क्यों है?
Syria News: सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन को हयात तहरीर अल-शाम (HTS) ने सत्ता से उखाड़ फेंका है और वो राष्ट्रपति रूस भाग गये हैं, जिसके बाद दमिश्क की सड़कों पर खुशी मनाई जा रही है, लेकिन नई दिल्ली सहित आस-पास और दूर की राजधानियों में, सीरिया की घटना ने एक चिंता पैदा कर दिया है।
साल 2000 से देश पर शासन कर रहे असद को 1971 से शासन करने वाले अपने पिता हाफिज अल-असद से सत्ता विरासत में मिली थी, लेकिन रविवार (8 दिसंबर) को हयात तहरीर अल-शाम (HTS) के नेतृत्व में इस्लामी विद्रोहियों के सीरिया की राजधानी में घुसने के कारण उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा।

असद के खिलाफ भयानक असंतोष
अरब दुनिया में असद के शासन के खिलाफ गुस्सा एक अजीबोगरीब मामला है। 35 साल की उम्र में सत्ता में आने के बाद, असद एक शासन को लेकर अनिच्छुक रहे नेता से दिसंबर 2009 में CNN की तरफ से कहे जाने वाले "सबसे लोकप्रिय" कहे जाने वाले नेता बन गए, जहां लगभग 68% अरबों ने उनके लिए मतदान किया था। आंखों के इस डॉक्टर ने अपने पक्ष में लोकप्रिय पब्लिक रिलेशन कैम्पेन चलाया, और लगातार उन्हें तस्वीरों में हॉलीवुड की फिल्में देखते और रेस्टोरेंट में लोगों से बात करते हुए देखा जाता था।
लेकिन, अरब स्प्रिंग ने सबकुछ बदल दिया। इस दौरान बशर अल-असद का खौफनाक क्रूर चेहरा लोगों के सामने आया और उनकी बेरहमी ने दुनिया को दंग कर दिया। बशर अल-असद के इशारे पर प्रदर्शनकारियों का कत्लेआम करवाया गया, हजारों लोग जेल में ठूंस दिए गये और एक अनुमान के मुताबिक, अरब स्प्रिंग के दौरान 2011-12 में सीरिया के जेल में 15 हजार से ज्यादा लोग मारे गये।
असद ने एक उदारवादी सरकार बनाने का वादा किया था, लेकिन उनका ये वादा तोप के मुंह से बरसते गोलों में ध्वस्त हो गया और सीरिया, हजारों लोगों के लिए कब्रगाह बन गया।
सीरियाई शासन के खिलाफ नाराजगी बेरोजगारी से लेकर देश का आर्थिक पतन, आजीविका और लोकतांत्रिक सुधारों तक फैला था और कई लोगों को लगा, कि धार्मिक चरमपंथियों को इस अत्यधिक आधुनिक और धर्मनिरपेक्ष समाज में एक मौका दिखाई दे रहा है।
2011 में ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया से पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में छाए अरब स्प्रिंग की गूंज सीरिया में भी सड़कों पर हुए विरोध प्रदर्शनों में सुनाई दी। लेकिन असद ने सत्ता का विरोध करने वालों पर कठोर कार्रवाई करते हुए इसे बलपूर्वक दबा दिया। इससे देश में गृहयुद्ध शुरू हो गया, जिसमें अमेरिका विद्रोहियों का समर्थन कर रहा था, जबकि रूस, ईरान और हिज्बुल्लाह असद का समर्थन कर रहे थे।
और देखते ही देखते, सीरिया वैश्विक खिलाड़ियों के लिए जंग का मैदान बन गया।
असद के शासन पर विद्रोहियों और अपने ही लोगों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया, जबकि इस्लामिक स्टेट ने सीरिया के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया था।
हयात तहरीर अल-शाम का उदय
अलकायदा से अलग होकर बने हयात तहरीर अल-शाम के नेता बू मुहम्मद अल-जवलानी, जिसे अल-जोलानी भी कहा जाता है, उसने असद की सेना को परास्त कर दिया, जिन्होंने अपने लेफ्टिनेंट से कहा था, कि "अल्लाह की मंजूरी से, हम जल्द ही अलेप्पो और दमिश्क में ईद-उल-फितर मनाएंगे।" ईद-उल-फितर अभी चार महीने दूर है।
सीरिया संघर्ष को कैसे देखती है दिल्ली?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली में सूत्रों ने बताया है, कि पिछले छह महीनों में सीरिया के तीन मुख्य सहयोगी - रूस, ईरान और हिजबुल्लाह - या तो विचलित हो गए हैं या कमजोर हो गए हैं।
उन्होंने बताया, कि इससे विद्रोहियों को एक नया मौका मिल गया है। रूस यूक्रेन में युद्ध लड़ रहा है, ईरान इजराइल के साथ संघर्ष में फंसा हुआ है और हिज्बुल्लाह को पिछले तीन महीनों में करारी हार का सामना करना पड़ा है। असद की सेना अकेले ही विद्रोही समूहों के खिलाफ कुछ प्रमुख शहरों की रक्षा करने में असमर्थ है, जिनमें से कुछ अलकायदा से जुड़े हुए थे।

HTS की विचारधारा को कैसे समझ सकते हैं?
माना जाता है कि तुर्की ने भी HTS और विद्रोही समूहों का समर्थन किया है। HTS का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जो इसके वर्तमान और भविष्य को आकार देगा। वाशिंगटन इंस्टीट्यूट के एक वरिष्ठ फेलो और सीरिया के विशेषज्ञ आरोन वाई. ज़ेलिन ने एक लेख में बताया, कि क्यों वे उन्हें विचारधारा से प्रेरित "सलाफिस्ट जिहाद" के बजाय "राजनीतिक जिहादी" कहते हैं।
HTS की शुरुआत इस्लामिक स्टेट के पूर्ववर्ती समूह, इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक की एक शाखा के रूप में हुई थी, जब इसकी स्थापना जनवरी 2012 में जबात अल-नुसराह के रूप में हुई थी।
हालांकि, जेलिन लिखते हैं, जब अप्रैल 2013 में अबू बकर अल-बगदादी ने खुले तौर पर संगठन को इराक से सीरिया में लाया, तो जौलानी ने "बगदादी को खारिज कर दिया और अल-कायदा के तत्कालीन नेता अयमान अल-जवाहिरी के प्रति निष्ठा की शपथ ली।"
तीन साल बाद तब एक और मोड़ आया, जब जौलानी ने अल-कायदा और ग्लोबल जिहाद को भी खारिज कर दिया और उसने घोषणा की, कि उसका मकसद सिर्फ सीरिया पर ध्यान केन्द्रित करना है और ग्लोबल जिहाद को लेकर उसका कोई रूझान नहीं है।
इसके बाद HTS का गठन किया गया।
जेलिन लिखते हैं, कि "उस समय, इस समूह के इतिहास को देखते हुए यह सब कितना वास्तविक था, इस बारे में सवाल थे। हालांकि, इस बीच के समय में, हयात तहरीर अल-शाम ने न सिर्फ मुक्त क्षेत्रों में इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी को नष्ट कर दिया है, बल्कि इसने जून 2020 में सीरिया में हुरस अल-दीन नामक एक नई शाखा बनाने के अल-कायदा की कोशिश को भी नाकाम कर दिया। हालांकि, ये समूह अभी भी एक इस्लामवादी शासन के निर्माण का समर्थन करता है, लेकिन ये सीरिया की राजनीति को ज्यादा अहमियत देता है।
और यही वजह है, कि ये मजहब को दूसरे स्थान पर रहता है।
सीरिया को लेकर नई दिल्ली की नजर चौकन्नी क्यों है?
जेलिन के साथ कई पश्चिमी एक्सपर्ट्स का भी मानना है, कि HTS, जिहादी महत्वाकांक्षाओं के बजाय सीरियाई राष्ट्रवाद पर ज्यादा फोकस रखता है, लेकिन नई दिल्ली आने वाले दिनों और हफ्तों में HTS के कदमों के बारे में बहुत अधिक सतर्क है।
साउथ ब्लॉक के विशेषज्ञ याद करते हैं, कि गद्दाफी के पतन के बाद लीबिया में अरब स्प्रिंग प्रयोग कैसे जल्दी ही अराजकता में बदल गया। और कैसे मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड ने नियंत्रण कर लिया। इसलिए भारतीय प्रतिष्ठान में इस बात को लेकर सतर्कता है, कि असद के बाद सीरिया में यह कैसे चलेगा।
सीरिया के विदेश में मुख्य विपक्षी समूह (जिसे सीरियाई क्रांतिकारी और विपक्षी बलों के गठबंधन के रूप में जाना जाता है) के प्रमुख हादी अल-बहरा ने रविवार को एक बयान में कहा, कि दमिश्क अब "बशर अल-असद के बिना है।"
रविवार को सीरियाई राज्य टेलीविजन पर प्रसारित एक बयान में, विपक्षी लड़ाकों के एक समूह ने कहा, कि उन्होंने दमिश्क को "आजाद" कर दिया है और "अत्याचारी अल-असद" को उखाड़ फेंका है, उन्होंने कहा, कि शासन की जेलों में बंद सभी बंदियों को रिहा कर दिया गया है।
एचटीएस के अल-जौलानी ने अब तक अपने बयानों में अल्पसंख्यकों के डर को कम करने की कोशिश की है। 29 नवंबर को, उन्होंने सैनिकों से कहा, अलेप्पो पर कब्ज़ा करने के बाद, "पहली प्राथमिकता नागरिकों की संपत्ति और जीवन की रक्षा करना और सुरक्षा स्थापित करना और सभी संप्रदायों के लोगों के डर को शांत करना है"। उन्होंने पिछले हफ्ते CNN से कहा था, कि "सीरिया एक ऐसी शासन प्रणाली का हकदार है, जो संस्थागत हो, जहां कोई भी शासक मनमाने फैसले न ले।" उन्होंने कहा, "शब्दों से नहीं, बल्कि कामों से इंसाफ करें।"












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