बांग्लादेश में बहुत बड़ा पॉलिटिकल फसाद, सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध, भारत खुश!
Bangladesh Supreme court bans largest Islamist party from elections: बांग्लादेश की सर्वोच्च अदालत ने रविवार को फैसला सुनाते हुए देश की सबसे बड़ी इस्लामिक पार्टी, जमात-ए-इस्लामी के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध बरकरार रखा है। बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी की चुनाव लड़ने की इजाजत देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है।
बांग्लादेशी सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला ऐतिहासिक माना जा रहा है और इस फैसले के बाद मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा साफ हो गया है।
बांग्लादेश की सर्वोच्च अदालत ने साल 2013 में इस्लामिक पार्टी जमात-ए-इस्लामी को देश की धर्मनिरपेक्षता के प्रावधानों का उल्लंघन करने का दोषी करार दिया था और उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया था।
बाग्लादेश में अगले साल 7 जनवरी को लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और जमात-ए-इस्लामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सर्वोच्च अदालत से 2013 के फैसले को पलटने की अपील की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है।

जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ फैसले का मतलब?
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ओबैदुल हसन की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय डिवीजन की पांच सदस्यीय पीठ ने ये फैसला सुनाया है। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के मुख्य वकील "व्यक्तिगत समस्याओं" के कारण अदालत में पेश नहीं हुए थे और सुनवाई छह सप्ताह के लिए स्थगित करने की मांग को लेकर पहले दायर की गई उनकी याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
10 साल पहले बांग्लादेश की एक हाईकोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी का इलेक्शन कमीशन में रजिस्ट्रेशन को रद्द कर दिया था और जमात-ए-इस्लामी की पार्टी चुनाव चिन्ह को भी रद्द कर दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध नहीं लगाया था, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया।
उस समय कोर्ट का फैसला, पाकिस्तान के खिलाफ देश के 1971 के स्वतंत्रता संग्राम का विरोध करने के लिए पार्टी पर प्रतिबंध लगाने की मांग के बीच आया था।
प्रधान मंत्री शेख हसीना की सरकार ने 2009 में सत्ता में आने के बाद, देश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नरसंहार और युद्ध अपराधों के कृत्यों में भूमिका के लिए, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के शीर्ष नेताओं पर मुकदमा चलाने की मांग की थी। वहीं, साल 2013 के बाद जमात-ए-इस्लामी के कई बड़े नेताओं को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद फांसी दे दी गई, जबकि कई नेताओं को उम्र-कैद की सजा सुनाई गई।
1971 के आंदोलन के दौरान जमात-ए-इस्लामी ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया था और बांग्लादेश में पाकिस्तानी आर्मी ने जो नरसंहार किए थे, उसमें इस संगठन ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। वहीं, बांग्लादेश बनने के बाद भी जमात-ए-इस्लामी का पाकिस्तान के साथ काफी करीबी रिश्ता बना हुआ है।
जमात-ए-इस्लामी पार्टी के खिलाफ खड़े वकील तानिया अमीर ने रविवार को कहा, कि "उच्च न्यायालय के फैसले को भी बरकरार रखा गया है।"
उन्होंने कहा, कि "अगर वे (जमात-ए-इस्लामी) किसी बैठक, रैली या किसी तरह की सभा आयोजित करने का प्रयास करते हैं, या अपनी पार्टी को किसी उच्चायोग, दूतावास, विदेशी एजेंसी या राज्य के लिए वैध बताते हैं, तो हम उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का एक नया आरोप लगाने के लिए स्वतंत्र हैं।"
हालांकि, जमात-ए-इस्लामी पार्टी की तरफ से कोर्ट में पेश हुए वकील मतीउर रहमान अकांदा ने कहा, कि जमात-ए-इस्लामी राजनीतिक तौर पर अभी भी सक्रिय रहेगी।
उन्होंने कहा, कि "अदालत ने इस पर अपनी राय दी है, कि क्या पंजीकरण (चुनाव आयोग के साथ) बरकरार रखा जाएगा?" उन्होंने कहा, "संवैधानिक रूप से जमात-ए-इस्लामी की राजनीति पर प्रतिबंध लगाने का कोई तरीका नहीं है।"
बांग्लादेश में लंबे समय से धर्मनिरपेक्ष ताकतों और अन्य लोगों द्वारा इस्लामवादी पार्टी पर प्रतिबंध लगाने के लिए कई बार मांग की गई है, लेकिन सरकार ने अभी तक जमात-ए-इस्लामी पार्टी पर प्रतबंध नहीं लगाया है, लेकिन ये ना तो चुनाव लड़ सकती है और ना ही किसी भी तरह की रैलियों का आयोजन ही कर सकती है।
हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका जमात-ए-इस्लामी को एक उदारवादी इस्लामी पार्टी मानता है और वो चाहता है, कि जमात-ए-इस्लामी चुनाव लड़े।
लिहाजा, इस बात को लेकर अमेरिका और बांग्लादेश के बीच लंबे समय से तनाव भी रहा है। अमेरिका ने फ्री एंड फेयर इलेक्शन के नाम पर बांग्लादेश सरकार के कई बड़े मंत्रियों और प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी के कई नेताओं पर वीजा प्रतिबंध भी इसी साल लगाए हैं। हालांकि, अमेरिका की तरफ से उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गये हैं।
वहीं, फिलहाल ये अस्पष्ट है, कि अदालत के फैसले के बाद भी जमात-ए-इस्लामी पर बांग्लादेशी गृह मंत्रालय प्रतिबंध लगाता है नहीं।

जमात-ए-इस्लामी को समझिए
जमात-ए-इस्लामी, पूर्व प्रधान मंत्री खालिदा जिया के नेतृत्व वाली विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का एक प्रमुख भागीदार रहा है, जो दशकों से वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना की प्रतिद्वंद्वी रही है।
कट्टर इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी और खालिदा जिया ने साल 2001 से साल 2006 में एक साथ मिलकर बांग्लादेश की सरकार चलाई और उस दौरान खालिदा जिया प्रधानमंत्री थीं।
वहीं, इस साल जनवरी में होने वाले चुनाव में शेख हसीना एक बार फिर से सत्ता में लौटने के लिए जी-जान से जुटी हैं, जबकि खालिजा जिया की पार्टी ने चुनावों का बहिष्कार करने की धमकी दी है। बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का कहना है, कि वे भी शेख हसीना के नेतृत्व में चुनावों का बहिष्कार करेंगे।
बांग्लादेश में पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध की यादें आज भी ताजा हैं।
बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना है, कि स्थानीय सहयोगियों की सहायता से 1971 के गृहयुद्ध के दौरान पाकिस्तानी सैनिकों ने नौ महीने में 30 लाख बांग्लादेशियों की हत्या कर दी थी, जबकि 2 लाख से ज्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार किया और लगभग एक करोड़ लोगों को पड़ोसी देश भारत में भागने के लिए मजबूर किया गया।
1971 से पहले बांग्लादेश को पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था, जिसका नाम बदलकर आजादी के बाद बांग्लादेश कर दिया गया।
भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीतने के लिए देश के स्वतंत्रता नेता और मौजूदा प्रधानमंत्री शेख हसीना के पिता, राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व वाली निर्वासित सरकार की सहायता की थी। शेख हसीना को भारत का करीबी माना जाता है, जबकि बेगम खालिदा जिया पाकिस्तान की करीबी हैं।
मोदी सरकार पर आरोप लग रहे हैं, कि शेख हसीना की सरकार को चुनाव जितवाने के लिए वो काफी मदद कर रही है, जिसमें बांग्लादेश में कई प्रोजेक्ट्स का भी अनावरण शामिल है।












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