Bangladesh: पाकिस्तान के कट्टर समर्थक गुट जमात-ए-इस्लामी से हटा बैन, 1200 लोगों का हत्यारा भी रिहा
Bangladesh: बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जमात-ए-इस्लामी पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया है, जिसके बाद जमात-ए-इस्लामी का बांग्लादेश के चुनाव में उतरने का रास्ता साफ हो गया है। शेख हसीना की सरकार ने कथित राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के कारण इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसे यूनुस की सरकार के कार्यकाल के दौरान बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया है। जमात-ए-इस्लामी की पहचान एक कट्टरपंथी गुट के तौर पर रही है जो पाकिस्तान की विचारधारा से मेल खाता है।
जमात-ए-इस्लामी का इतिहास
बांग्लादेश में दिसंबर 2013 में जमात-ए-इस्लामी को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बताते हुए बैन लगा दिया था। गौरतलब है कि जमात-ए-इस्लामी वही संगठन है, जिसने 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के समय बांग्ला बोलने वाले मुस्लमों की जगह पाकिस्तान के दमन का समर्थन किया था। इसके रजाकारों ने पाकिस्तानी फ़ौज के साथ मिलकर बांग्लादेश के लोगों और हिन्दुओं की हत्याओं, रेप और नरसंहार में हिस्सा लिया था। बांग्लादेश के आजाद होते ही 1971 में जमात-ए-इस्लामी पर बैन लगा दिया गया था। सनद रहे कि, इसी इस्लामी कट्टरपंथी संगठन ने जुलाई, 2024 के बाद शेख हसीना की सत्ता के खिलाफ खूब हिंसा की थी तख्तापलट में अहम रोल निभाया था। जो कथित लोग शेख हसीना का हिंसक विरोध कर रहे थे, उन्हें जमात-ए-इस्लामी का ही अंदरखाने सपोर्ट मिला हुआ था जिसमें वह फंडिंग से लेकर हथियार तक सब मुहैया करा रही थी।

हसीना के जमात-ए-इस्लामी पर सख्त फैसले
2009 में शेख हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश ने मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ सहयोग करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू की थी। जिसमें इन लोगों पर बांग्लादेश के लिए अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT-BD) में मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार का आरोप लगाया गया। इन मुकदमों के बाद जमात-ए-इस्लामी के छह प्रमुख नेताओं और बीएनपी के एक वरिष्ठ नेता को फांसी की सज़ा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय डिवीजन ने उनकी दोषसिद्धि और सज़ा की पुष्टि की, जिसके बाद उन्हें फांसी की सज़ा दी गई।
1200 लोगों का हत्यारा भी रिहा
इस्लामी कट्टरपंथ के समर्थन में उठाया गया यूनुस सरकार का यह कोई पहला कदम नहीं है। पिछले 8 दिनों में यह जमात-ए-इस्लामी की दूसरी जीत थी। इससे पहले बांग्लादेश का सुप्रीम कोर्ट और यूनुस सरकार ने जमात-ए-इस्लामी के एक ऐसे आतंकी को रिहा किया था, जिसे 1200 से अधिक लोगों की हत्याओं के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। इसका नाम ATM अजहरुल इस्लाम है। साथ ही रेप और अपहरण जैसे अपराध भी करता रहा है। इसके अलावा यूनुस ने सत्ता में आने के बाद जसीमउद्दीन रहमानी को भी रिहा किया था, जिसने रिहा होते ही भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया था। जसीमुद्दीन अंसारुल बांग्ला का सरगना है जिसे बिना कोई कानूनी प्रक्रिया के तहत छोड़ा गया है।
जमात और हसीना की पुरानी अदावत
जमात-ए-इस्लामी ऐतिहासिक रूप से बांग्लादेश में अवामी लीग की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रही है। हाल ही में आए अदालती फैसले से इन दोनों राजनीतिक संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन में संभावित रूप से बदलाव आ सकता है। इस बीच, पार्टी पर प्रतिबंध के बाद अवामी लीग से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म बंद कर दिए गए हैं, जिससे सियासी पारा और भी गर्म हो गया है।
राजनीतिक उथल-पुथल
बांग्लादेश में इस समय राजनीतिक उथल-पुथल काफ़ी बढ़ गई है। अदालत द्वारा जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध हटाए जाने से पार्टी के लिए नई संभावनाएं खुल गई हैं। पहले इसके नेताओं को गिरफ़्तारी की धमकिया मिलती थीं, लेकिन इस कानूनी बदलाव के साथ उनकी रिहाई जल्द ही होने वाली है। इस कदम से देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर भी असर पढ़ सकता है। चूंकि जमात-ए-इस्लामी की पहचान एक कट्टरपंथी गुट की है तो वहां महिलाओं के लिए मुश्किल हो सकती है।
भविष्य के चुनावों पर प्रभाव
प्रतिबंध हटने के बाद, जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के अगले आम चुनावों में भाग लेने के लिए तैयार है। जिसमें, अभी तक पर्दे के पीछे इस्लामी कट्टरपंथ को हवा देने वाले लोग और नेता अब खुलकर इस पार्टी की ओट में अपनी विचारधारा थोपने का काम करेंगे। जिस कड़वाहट के साथ बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हुआ था, अब एक बार फिर वही कड़वाहट और कट्टरपंथ सड़कों पर देखने को मिल सकता है। साथ ही यह बांग्लादेश के व्यापार और पहले से सिकुड़ चुके टूरिज्म के लिए ठीक नहीं हैं।
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