जब डॉयनासोर का नामोनिशान मिटाने वाला 'दानव' पथ्वी पर गिरा था, तो धरती पर आ गई थी 'प्रलय'

वैज्ञानिकों को अलग अलग डायनासोरों के जो अवशेष मिले हैं, उससे पचा चला है कि उस वक्त धरती पर 130 फीट लंबे और करीब 77 टन वजनी डायनासोर हुआ करते थे और ऐस्टरॉइड की बारिश में उनका नामोनिशान ही मिट गया था।

वॉशिंगटन, दिसंबर 24: करीब 6.6 करोड़ साल पहले धरती के दैत्य डायनासोर का नामोनिशान मिटा देने वाला ऐस्टरॉइड के गिरने के बाद पूरी धरती पर दो सालों के लिए अंधेरा छा गया था। एक नए स्टडी से पता चला है कि, 6.6 करोड़ साल पहले डायनासोर और धरती पर मौजूद कई और प्रजातियों का पूरी तरह से सफाया करने वाले क्षुद्रग्रह जब पृथ्वी पर गिरा था, उस वक्त पृथ्वी की स्थिति ऐसी हो गई थी, मानो प्रलय आ गई हो और एक तरह से धरती के लिए ये प्रलय जैसा ही था।

धरती पर आया था प्रलय

धरती पर आया था प्रलय

कैलिफोर्निया एकेडमी ऑफ साइंसेज की एक टीम के अनुसार, ऐस्टरॉइड के पृथ्वी से टकराने के तुरंत बाद जंगल की आग की कालिख ने आकाश को भर दिया था और सूरज की रोशनी का धरती पर आना बंद हो गया था। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ये ऐस्टरॉइड करीब 7.5 मील चौड़ा था और उसकी रफ्तार 27 हजार मील प्रति घंटा से भी ज्यादा थी और यह ऐस्टरॉइड चिक्सुलब क्रेटर से टकराने के बाद मैक्सिको की खाड़ी में जा गिरा था। ऐस्टरॉइड के पृथ्वी पर टकराने की वजग से उस वक्त पृथ्वी पर मौजूद करीब करीब 75 प्रतिशत जिंदगियां विलुप्त हो गईं थीं और पिछले कई सालों से इस ऐस्टरॉइड को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं।

ऐस्टरॉइड की हुई थी बारिश

ऐस्टरॉइड की हुई थी बारिश

वैज्ञानिकों को अलग अलग डायनासोरों के जो अवशेष मिले हैं, उससे पचा चला है कि उस वक्त धरती पर 130 फीट लंबे और करीब 77 टन वजनी डायनासोर हुआ करते थे और ऐस्टरॉइड की बारिश में उनका नामोनिशान ही मिट गया था। लेकिन, अब वैज्ञानिकों को पता चला है कि, धरती पर ऐस्टरॉइड की बारिश की उस घटना के बाद धरती पर गुप्प अंधेरा छा गया था और दो सालों तक सूरज की रोशनी धरती पर नहीं आई थी। वायुमंडल में सिर्फ और सिर्फ राख और कालिख मौजूद था। वैज्ञानिकों ने कहा है कि, पथ्वी पर ऐस्टरॉइड के टकराने के बाद जो धुआं और कालिख उठा था, उसने लगातार दो सालों तक सूरजी की रोशनी को धरती पर नहीं आने दिया, जिसकी वजह से धरती पर मौजूद कई और प्रजातियों का विनाश हो गया।

धरती पर विनाश के बादल

धरती पर विनाश के बादल

वैज्ञानिकों को स्टडी से पता चला है कि, ऐस्टरॉइड के टक्कर के बाद पृथ्वी पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ा था और टक्कर के कई सालों बाद तक धरती पर नुकसान होता रहा है। जिसके तहत समुद्र में ज्वार की लहरों का उठना आम हो गया था और इसके साथ ही कई तरह से पर्यावरण में बदलाव हुए, जबकि पृथ्वी अंधेरे में डूबी हुई थी। शोधकर्ताओं का कहना है कि, धरती पर सूरज की रोशनी नहीं पहुंचने की वजह से पौधों के प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बंद हो गई थी और पोधों का विकास बंद हो गया था। वैज्ञानिकों की टीम ने 'लाइव साइंस' के साथ एक इंटरव्यू में बताया कि, इससे पारिस्थितिकी तंत्र का पतन हो गया होगा और सूर्य के प्रकाश के वापस आने के बाद भी, प्रकाश संश्लेषण में गिरावट दशकों तक जारी रही होगी।

वैश्विक तापमान हो गया था काफी ठंडा

वैश्विक तापमान हो गया था काफी ठंडा

वैज्ञानिकों की टीम के मुताबित, ऐस्टरॉइड के टक्कर के बाद पृथ्वी पर वायुमंडलीय तापमान में भारी गिरावट दर्ज की गई थी और इसके पीछे की वजह आकाश में बादलों में सफ्ल्यूरिक एसिड का निर्माण होना था, जिसने वैश्विक तापमान को ठंडा कर दिया था और अम्लीय वर्षा पैदा कर रहा था, जिसके कारण जंगलों में आग लगनी शुरु हो गई थी। वैज्ञानिकों ने कहा कि, ये स्थिति एक तरह से परमाणु बम के विस्फोट के बाद वाली हो सकती है। इस रिसर्च को पीटर रूपनारायण ने किया है और उन्होंने लाइव साइंस को अपने रिसर्च के बारे में विस्तार से समझाया है।

चार दशकों से चल रहा है रिसर्च

चार दशकों से चल रहा है रिसर्च

चार दशकों से भी अधिक समय से इसके सिद्धांत के बावजूद पिछले एक दशक में ही यह देखने के लिए मॉडल विकसित किए गए हैं कि ऐस्टरॉइड के धरती पर गिरने के बाद इस अंधेरे ने जीवन पर कैसे प्रभाव डाला। रूपनारायण ने कहा कि, "अब आम सोच यह है कि पूरी दुनिया के जंगलों में लगी आग की वजह से वातावरण में कालिख पसर गया था और धुंआ पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में फैल गया था।"

भविष्य को समझने में मदद

भविष्य को समझने में मदद

मेक्सिको में 66 मिलियन साल पहले गिरे ऐस्टरॉइड को Chicxulub नाम दिया है और Chicxulub ऐस्टरॉइड का पृथ्वी से टकराने का प्रभाव ना सिर्फ इतिहास को समझा रहा है, बल्कि कई भविष्यवाणियां भी करता है, कि वो आज का जीवन कैसे प्रभावित कर सकता है और अगर फिर से ऐसी कोई घटना होती है, तो फिर पृथ्वी पर उसका प्रभाव कैसा हो सकता है। मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के विख्यात रिसर्चर और जीवाश्म विज्ञानी फिल मैनिंग ने कहा कि, 'जीवाश्म रिकॉर्ड प्रदान करता है और महत्वपूर्ण जानकारियां देता है, जिसे आज लागू किया जा सकता है, ताकि हम कल के लिए योजना बना सकें।

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