IS के खतरे के बीच तालिबान के अंदर ही शुरू हो गया घमासान, जानिए कौन किस पर है भारी ?
काबुल, 29 अगस्त: अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद अब तालिबान के विभिन्न धड़ों के बीच ही सत्ता पर दबदबे लिए घमासान शुरू गया है। इसके चलते अफगानिस्तान की स्थिति और भी विस्फोटक हो गई है। जो लोग अमेरिकी डेडलाइन खत्म होने से पहले अबतक तालिबान में फंसे हुए हैं, उन्हें अपनी जान पर खतरा बढ़ गया लगता है। क्योंकि, तालिबान की टॉप लीडरशिप ने भले ही आम माफीनामे की बात कही हो, लेकिन हो सकता है कि विरोधी गुटों के आतंकी उसपर अमल करने के लिए राजी ना हों।

सत्ता पर कब्जे के लिए तालिबान में भयंकर गुटबाजी शुरू
न्यूयॉर्क पोस्ट में होली मैकी ने एक आर्टिकल में लिखा है कि अफगानिस्तान के कई सूत्रों और जमीन पर मौजूद लोगों के अलावा इंटेलिजेंस और सेना के पूर्व अफसरों ने इस बात की पुष्टि की ही कि तालिबान के विभिन्न धड़ों में सत्ता पर काबिज होने के लिए भयंकर मतभेद पैदा हो गया है। अमेरिका के वहां से जाने के बाद की स्थिति में पावर ट्रांसफर को लेकर ये गुट आपस में ही जोरदार तरीके से उलझ पड़े हैं। काबुल में मौजूद एक पूर्व सरकारी सूत्र ने कहा है,'जमीनी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, तालिबान पूरी तरह से विभाजित होता जा रहा है और अलग-अलग गुट पहले से ही अलग-अलग मीटिंग करने लगे हैं।' उन्होंने कहा कि 'यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि (तालिबान में) नेतृत्व को लेकर एकता का अभाव है, और इससे हिंसा को लेकर चिंता और ज्यादा बढ़ गई है।'

आपस में भिड़ने की स्थिति में कई कबीले
मैकी के मुताबिक कहा जा रहा है कि अमेरिका के जाने की वजह से पैदा हो रही चुनौतियों से निपटने को लेकर कबीलों के अपने-अपने आइडिया हैं, जिसमें से यह भी है कि आईएस-खुरासान के बढ़ते खतरे से कैसे निपटा जाए। सूत्रों ने पुख्ता जानकारी देते हुए बताया है कि 'सत्ता को लेकर बहुत ही ज्यादा विवाद है, और विभिन्न जातियां और कबीले सभी सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।' उसने बताया कि 'इनमें से हेलमंडी एक है, जो सबसे ज्यादा दबाव डाल रहा है, उसका दावा है कि उसने वर्षों में अमेरिकी ड्रोन हमलों का सबसे ज्यादा सामना किया है और सबसे ज्यादा 'कुर्बानियां' दी हैं। '

हक्कानी नेटवर्क की 'दादागीरी' भी विवाद की वजह
सूत्रों के मुताबिक हेलमंडी गुट हक्कानी नेटवर्क की दादागीरी को मानने के लिए तैयार नहीं है, जिसे कि पहले से ही काबुल की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिल चुकी है और वह पहले से ही राजनीतिक और मिलिट्री रूप में अफगानिस्तान के सभी मसलों पर सबपर भारी पड़ा है। हक्कानी नेटवर्क वही ग्रुप है जिसे 2012 में अमेरिका फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेन घोषित कर चुका है। लेकिन, यह आतंकी संगठन अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद सरकार में भागीदार बन चुका है। इसका एक सरगना खलिल हक्कानी एक पाकिस्तानी गुर्गा है, जिसे अमेरिका ने आतंकी घोषित करके उसपर 50 लाख अमेरिकी डॉलर का इनाम घोषित कर रखा है। लेकिन, आज की तारीख में तालिबान ने उसे अफगानिस्तान का नया सुरक्षा प्रमुख नियुक्त कर दिया है।

'तालिबान के दो गुटों में फायरिंग भी हो चकी है'
यही नहीं अफगानिस्तान की खुफिया जानकारी रखने वाले एक अंदरूनी शख्स ने इस ओर इशारा किया है कि हक्कानी के आतंकियों के पास काफी अमेरिकी हथियार हैं, जो उसके साथ या तो हामिद करजई इंटरनेशनल एरपोर्ट के अंदर दाखिल हो चुका है या पावर ट्रांसफर के बाद फौरन ऐसा करने की तैयारी में हैं। उधर एक अमेरिकी खुफिया सूत्र के मुताबिक शुक्रवार रात को एयरपोर्ट के पास ही तालिबान के दो गुटों में फायरिंग भी हुई थी। इन सबके बीच एक बात और स्पष्ट नहीं हो पा रही है कि तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के बीच सत्ता के कंट्रोल को कौन मैनेज कर रहा है, लेकिन इतना तो तय है कि हर गुट के भीतर गहरे मतभेद उभर रहे हैं। इनकी जानकारी रखने वाले काबुल के एक सूत्र का कहना है, 'हेलमंडी और कंधारी दोनों गुटों को चुनौती दे रहे हैं।' उसने आगे बताया कि 'तालिबान ने इनमें से कई को अच्छे पदों पर नियुक्त करके उन्हें शांत करने की कोशिश की है।'

तो अनियंत्रित हो जाएंगे तालिबान के आतंकी ?
2020 के जून में संयुक्त राष्ट्र की एक निगरानी टीम ने चेतावनी दी थी कि तालिबान का कम से कम एक वरिष्ठ सरगना अपने ग्रुप से इसलिए अलग हो गया था कि वह एक नया गुट बनाकर किसी भी संभावित शांति समझौते का विरोध कर सके। इनमें से तालिबान के कई आतंकी शामिल थे, जो डील को लेकर अमेरिकी शर्तों को मानने के खिलाफ थे। ऐसी स्थिति में जो लोग अभी तक अफगानिस्तान से नहीं निकल पाए हैं, उनकी जान पर खतरा बढ़ गया है। मैकी ने आशंका जाहिर कि है कि हो सकता है कि तालिबान की टॉप लीडरशिप ने वाकई में आम माफीनामे का वादा किया हो, लेकिन हो सकता है कि परस्पर विरोधी गुटों के जमीनी आतंकी उनके फरमान पर अमल करने से इनकार कर दें।












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