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प्रशांत महासागर में दुर्घटनाग्रस्त हो गई एलियन टेक्नोलॉजी, हावर्ड वैज्ञानिक का दावा, चुंबक से निकालेंगे बाहर

रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ डेटा जो मिले हैं, उससे पता चलता है, कि प्रशांत महासागर में जो उल्कापिंड गिरा था, वो वस्तु इंटरस्टेलर मूल का है, लेकिन फिलहाल इसकी पुष्टि करना संभव नहीं है।

वॉशिंगटन, अगस्त 15: हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने दावा किया है, कि साल 2014 में प्रशांत महासागर में एलियंस की टेक्नोलॉजी क्रैश हो गई है, जिसे निकालने के बाद एलियंस की दुनिया के बारे में काफी कुछ पता लगाया जा सकता है। इसके साथ ही हॉर्वर्ड प्रोफेसर ने प्रशांत महासागर से उस एलियन टेक्नोलॉजी को बाहर निकालने का तरीका भी बताया है, जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म की तरह ही लगता है। दरअसल, साल 2014 में प्रशांत महासागर में एक उल्कापिंड क्रैश होकर गिर गया था, जिसको लेकर हॉर्वर्ड प्रोफेसर ने ये बड़ा दावा किया है।

प्रशांत महासागर में गिरी एलियन टेक्नोलॉजी

प्रशांत महासागर में गिरी एलियन टेक्नोलॉजी

हार्वर्ड यूनिवर्सिटीज डिपार्टमेंट ऑफ एस्ट्रोनॉमी के प्रेसिडेंट प्रोफेसर एवी लोएब ने साल 2014 में प्रशांत महासागर में क्रैश कर गए एक उल्कापिंड को लेकर कहा है, कि वो कोई एलियन टेक्नोलॉजी हो सकता है या फिर अभूतपूर्व भौतिक शक्ति का उल्कापिंड हो सकती है, जिसका भौतिक रूप से अध्ययन किए बिना इसकी पुष्टि करना संभव नहीं है, इसलिए प्रोफेसर ने इसे पुनः प्राप्त करने के लिए एक अभियान की योजना बनाई है जिसमें निजी दाताओं से वित्त पोषण में दस लाख डॉलर से अधिक जुटाने की कोशिश शुरू कर दी गई है। "यह पहली बार होगा जब मानव ने किसी अन्य तारे से आई वस्तु बनाने वाली सामग्री पर रिसर्च करने की कोशिश की है।"

उल्कापिंड इंटरस्टेलर मूल का है?

उल्कापिंड इंटरस्टेलर मूल का है?

रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ डेटा जो मिले हैं, उससे पता चलता है, कि प्रशांत महासागर में जो उल्कापिंड गिरा था, वो वस्तु इंटरस्टेलर मूल का है, लेकिन फिलहाल इसकी पुष्टि करना संभव नहीं है, जबतक की उस वस्तु का परीक्षण प्रयोगशाला में नहीं किया जाए। प्रोफेसर लोएब ने कहा कि, 'सरकारी सेंसर से जो जानकारियां मिली हैं, उसका इस्तेमाल फिलहाल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए किया जा रहा है, जो हमारे मिसाइल रक्षा प्रणाली का हिस्सा है।' प्रोफेसर लोएब और उनके छात्रों ने कई उल्कापिंडों का अध्ययन किया है और ये जानने की कोशिश की है, कि क्या उनका संबंध किसी और ग्रह पर रहने वाले किसी जीव से हो सकता है? प्रोफेसर और उनकी टीम इस बात का पता लगा रही है, कि क्या सौर मंडल के बाहर से कोई उल्कापिंड पृथ्वी पर आ सकता है?

लोहे से भी सख्त हो सकता है उल्कापिंड

लोहे से भी सख्त हो सकता है उल्कापिंड

प्रोफेसर लोएब ने समझाते हुए कहा कि, "मुझे कैटलॉग मिला है, कि सरकार ने उल्कापिंडों के बारे में जानकारियां जुटाई है, जो सरकारी सेंसर द्वारा पता लगाया गया है, जो हमारी मिसाइल चेतावनी प्रणाली का हिस्सा है। मैंने अपने छात्र से यह जांचने के लिए कहा, कि क्या कोई उल्का, जिसकी रफ्तार काफी ज्यादा है, वो क्या सौर मंडल के बाहर से पृथ्वी पर आ सकता है? प्रोफेसर लोएब के एक छात्र अमीर सिराज लगातार इस दिशा में काम कर रहे हैं और प्रोफेसर लोएब और छात्र सिराज ने उल्का पिंड की रफ्तार और उससे जले कुछ वस्तुओं की जांच करने के बाद पाया है कि जो उल्कापिंड प्रशांत महासागर में गिरा है, वो जिस भी चीज से बना है, वो यकीनन लोहे से भी ज्यादा सख्त होना चाहिए। वैज्ञानिक लोएब ने कहा कि, "और इसलिए इसकी संरचना के मामले में यह एक बाहरी ग्रह से आया लगता है। यह सौर मंडल के बाहर अपनी गति के मामले में भी एक बाहरी ग्रह का लगता था।

सरकार ने गुप्त रखी है ज्यादातर जानकारियां

सरकार ने गुप्त रखी है ज्यादातर जानकारियां

वैज्ञानिक के मुताबिक, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के कारण सरकार ने इस उल्कापिंड को लेकर ज्यादातक जानकारियों को गुप्त रखा है और बहुत सीमत जानकारी ही साझा की गई है, मगर उसके बाद भी उन्होंने कुछ ज़बरदस्त खोज की थी। उन्होंने अपने छात्र के साथ लिखे एक पेपर में इन बातों का जिक्र किया है, जो उन्हें सच लगता है। प्रोफेसर लोएब ने इन जानकारियों के बारे में तीन साल पहले ही अपने रिसर्च पेपर में लिखा था और अभी कुछ नये खुलासे भी उस उल्कापिंड को लेकर हुए हैं, जो प्रोफेसर के रिसर्च से काफी मिलता है। प्रोफेसर लोएब के रिसर्च पेपर के तीन सालों के बाद अब अमेरिकी रक्षा विभाग के यूएस स्पेस कमांड सेंटर की तरफ से एक पत्र जारी किया गया है, जिसमें कहा गया है, कि अभी तक जो भी जानकारी मिली है, उससे स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है, कि 99.99 प्रतिशत ये उल्कापिंड पृथ्वी के बाहर के सौर मंडल से आया है, जिसका मतलब ये हुआ, कि प्रोफेसर लोएब के दावे सच साबित हुए हैं और अगर ऐसा होता है, तो प्रोफेसर के इस दावे में भी दम है, कि ये उल्कापिंड असल में एलियंस की टेक्नोलॉजी हो सकती है, लिहाजा अब प्रोफेसर का कहना है, कि उस उल्कापिंड को प्रशांत महासागर से निकासा जाना चाहिए और फिर उसपर रिसर्च करना चाहिए।

समुद्र से निकाला जाएगा उल्कापिंड

समुद्र से निकाला जाएगा उल्कापिंड

अपने रिसर्च के सच साबित होने के बाद अब प्रोफेसर लोएब प्रशांत महासागर की अनंत गहराई से उस उल्कापिंड को बाहर निकालना चाहते हैं, जिससे अमूल्य जानकारियां हमारे हाथ लग सकती हैं। हालांकि, हिंद महासागर में साल 2014 में क्रैश हो चुके किसी उल्कापिंड को खोजने का काम असंभव सरीखा है, लेकिन प्रोफेसर लोएब का मानना है, कि ये उल्कापिंड समुद्र के तल में पेनीज के आकार के हो सकते हैं और उसे चुंबक के सहारे निकाला जा सकता है। प्रोफेसर लोएब अब इस योजना पर काम कर रहे हैं, कि जहाज के जरिए किसी विशाल चुंबक को प्रशांत महासागर में गिराया जाएगा और फिर उस उल्कापिंड को बाहर खींचा जाएगा। प्रोफेसर लोएब को भरोसा है, कि वे जो खोज रहे हैं उसे वापस पा लेंगे। उन्होंने कहा कि, "यह एक मछली पकड़ने का अभियान जैसा है, और हम जो कर सकते हैं वह मूल रूप से इस उल्का के प्रक्षेपवक्र को ले सकता है और इसे समुद्र की सतह तक फैला सकता है।"

प्रोफेसर लोएब कर चुके हैं गंभीर दावे

प्रोफेसर लोएब कर चुके हैं गंभीर दावे

आपको बता दें कि, इससे पहले पिछले साल मई महीने में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र सम्मेलन में लोगों को संबोधित करते हुए प्रोफेसर एवी लोएब ने कहा था, कि मैं दुनियाभर के वैज्ञानिकों से पूछना चाहता हूं, कि वो बताएं कि धरती पर इंसान कब तक रहेंगे, क्योंकि मुझे नहीं लगता कि वो सब सही दिशा में काम कर रहे हैं। उन्हें सतत ऊर्जा के विकल्प खोजने चाहिए। साथ ही ऐसा तरीका निकालें, जिससे सबको खाना मिल सके। उन्होंने आगे तंज कसते हुए कहा था, कि हमको एलियंस के साथ कॉन्टैक्ट करना चाहिए, क्योंकि जिस दिन हम तकनीकी तौर पर पूर्ण रूप से विकसित हो जाएंगे, उस दिन पृथ्वी नष्ट होने के लिए तैयार हो जाएगी। ऐसे में हमें पहले से ही अंतरिक्ष में बड़ा बेस स्टेशन बनाने की तैयारी करनी चाहिए।

'अभी तक अस्पविकसित हमारी तकनीक'

'अभी तक अस्पविकसित हमारी तकनीक'

प्रोफेसर लोएब के मुताबिक, उनसे कई बार पूछा गया कि हमारी तकनीकी सभ्यता कब तक जिंदा रहेगी। इस पर उन्होंने कहा कि, मेरा जवाब साफ है कि, हमारी तकनीकी सभ्यता की शुरुआत कुछ सौ साल पहले ही हुआ है और हम अभी बाल्यावस्था में ही हैं, लेकिन ये कुछ सदियों तक ही जिंदा रहेगी। उन्होंने कहा कि मैं ये बात हवा में नहीं कह रहा, बल्कि ये सब गणितीय गणना पर आधारित है। उन्होंने कहा था, कि इंसानों के बीच महामारी और युद्ध के बहुत से खतरे हैं। अगर इन सब पर अच्छे से काम नहीं किया गया, तो इंसानों का वजूद इस धरती से खत्म हो जाएगा। ऐसे में कुछ तो मारे जाएंगे, जबकि कुछ को स्पेस में जाकर रहना पड़ेगा। लोएब के मुताबिक, इंसान अपने मतलब के लिए जरूरत से ज्यादा इस धरती पर अत्याचार कर रहे हैं। मौजूदा वक्त में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे, ज्वालामुखी से लगातार आग निकल रही। हमारी ही लापरवाही की वजह से जंगल आग से तबाह हो रहे। ये सब आने वाले वक्त में मुश्किल खड़ी करेंगे।

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