6th जेनरेशन लड़ाकू विमान बनाने की रेस तेज, US-भारत के दुश्मन निकले आगे.. फ्रांस या UK.. किससे हाथ मिलाएं हम?
6th-Gen Fighter Program: दुनिया में अभी ज्यादातर देशों की एयरफोर्स के पास चौथी पीढ़ी या 4.5वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं और इस वक्त भी दुनिया में करीब 1500 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं, जिसे चीन, अमेरिका, रूस और तुर्की जैसे देशों ने बनाया है, लेकिन अब छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के निर्माण के लिए भी रेस शुरू हो गया है।
6th जेनरेशन लड़ाकू विमान की टेक्नोलॉजी पर अभी काम शुरू ही हुआ है और चूंकी ये टेक्नोलॉजी काफी ज्यादा एडवांस है, लिहाजा अभी इसमें विकास ही हो रहा है और इसलिए, इस टेक्नोलॉजी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है, कि ये काफी ज्यादा महंगी है।

वे पांचवीं और छठी पीढ़ी के कम्युनिकेश, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और प्लेटफॉर्म के बीच व्यापक डेटा शेयरिंग के साथ सिस्टम-ऑफ-सिस्टम दृष्टिकोण का उपयोग करते हैं।
चूंकी माना जा रहा है, कि 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान युद्ध को पूरी तरह से बदल कर रख देंगे, लिहाजा इस फाइटर जेट को बनाने को लेकर क्या कोशिशें हो रही हैं, कब तक इसका निर्माण होगा और क्या भारत, जो अभी पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को बनाने में जुटा है, क्या उसे 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान बनाने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए? आइये जानते हैं।
काफी महंगा होगा 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान
कई देश ऐसे हैं, जिन्हें कम विमानों की जरूरत है और वो 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए फंड जुटा नहीं सकते हैं, इसीलिए देशों ने ग्रुप बनाना शुरू कर दिया, ताकि फंड बनाकर संयुक्त रूप फाइटर जेट का निर्माण कर सके।
F-35 फाइटर जेट प्रोग्राम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कुछ देश अपने डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा देना चाहते हैं और अमेरिकी कार्यक्रमों पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं, क्योंकि अमेरिका की नीतियां बदलती रहती हैं और उसके कई फैसले अनिश्चित हो जाते हैं। जैसे अमेरिका ने F-35 कार्यक्रम के बीच रास्ते से तुर्की को बाहर कर दिया था।
6th जेनरेशन लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण तौर एक ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) बनाया गया है, जिसमें इटली, जापान और यूके की कंपनियों ने गठजोड़ किया है। चूंकि भारत अभी भी अपने 5वीं पीढ़ी के एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के साथ संघर्ष कर रहा है, इसलिए कुछ डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है, कि नई दिल्ली को GCAP में शामिल होने पर विचार करना चाहिए।
6th जेनरेशन लड़ाकू विमान में एडवांस टेक्नोलॉजी
6th जेनरेशन लड़ाकू विमान में अत्यधिक एडवांस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसमें हाई-कैपिसिटी नेटवर्किंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा फ्यूजन, साइबर वारफेयर, D2D (data-to-decision capability) और बैटलफिल्ड कमांड, कंट्रोल एंड कम्युनिकेशन (C3) क्षमताएं शामिल हैं।
इसके अलावा, 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान की स्पीड, पांचवीं पीढ़ी के विमानों की स्पीड से ज्यादा होगी, इसका रेंज ज्यादा होगा और सबसे अहम बात ये, कि इसे मानवरहित विमान के तौर पर भी डिजाइन किए जाने की योजना है।
रूस जो 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान बना रहा है, उसे बिना पायलट के भी उड़ाने पर डिजाइन किया जा रहा है।
एडवांस स्टील्थ एयरफ्रेम्स एंड एवियोनिक्स: 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान की टेक्नोलॉजी का मतलब है, कि इसमें ज्यादा मॉड्यूलर डिजाइन होंगे, यानि मिशन की जरूरत के मुताबिक इस फाइटर जेट की घटकों को कुछ ही घंटों में बदला जा सकता है और भविष्य में इसे अपग्रेड करना काफी आसान होगा। इसके अलावा, सॉफ्टवेयर आर्किटेक्चर, जो किसी फ्लाइट के संचालन के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होते हैं, उसे एडवांस स्टेज पर तैयार किया जाएगा।
छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों में ज्यादातर सिंगल-सीट कॉकपिट होंगे। बुनियादी उड़ान और प्रक्रिया प्रशिक्षण ज़्यादातर सिमुलेटर पर किया जाएगा। इसके अलावा, 6th जेनरेशन लड़ाकू विमान, दूसरे जमीनी विमानों के साथ साथ सैटेलाइट्स और दूसरे प्लेटफॉर्म्स से भी डेटा हासिल करने में सक्षम होंगे। यह ऑनबोर्ड डेटा को प्रोसेस भी करेगा और आसमान में ही नये टारगेट को सेट करने के साथ साथ अगले मिशन की तैयारी कर सकेगा।
किन देशों ने साइन किया FCAS प्रोग्राम?
जुलाई 2018 में, फर्नबोरो एयरशो के दौरान, यूके ने BAE सिस्टम्स के नेतृत्व वाले छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान 'टेम्पेस्ट' का एक मॉडल प्रदर्शित किया था। यह फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) का हिस्सा था। FCAS प्रोग्राम का लीडर फ्रांस है।
इसके एक साल बाद, जुलाई 2019 में, स्वीडन ने FCAS विकसित करने के लिए यूके के साथ एक MoU साइन किया था। वहीं, सितंबर 2019 में, इटली औपचारिक रूप से टेम्पेस्ट कार्यक्रम में शामिल हो गया। दिसंबर 2021 में, यूके, इटली और स्वीडन ने FCAS पर सहयोग के लिए एक त्रिपक्षीय MoU पर हस्ताक्षर किए।
टेम्पेस्ट कई नई तकनीकों की खोज करता है, जैसे कि डायरेक्टेड एनर्जी वीपन (DEW), बहुत कम या बिना किसी भौतिक नियंत्रण वाला एक ऑगमेंटेड रिएलिटी कॉकपिट और पायलट के हेलमेट से जुड़ा हेड-अप डिस्प्ले।
इन टेक्नोलॉजीज से फाइटर जेट का वजन कम होगा और सॉफ्टवेयर आधारित दृष्टिकोण से उन्नयन क्षमता में सुधार होगा, और सामान्य फ्लैट स्क्रीन व्यवस्था के बाहर सूचना के लिए अतिरिक्त प्रदर्शन स्थान उपलब्ध होगा।
टेम्पेस्ट को बिना चालक वाले हवाई वाहनों (यूएवी) के साथ काम करना था। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) समर्थित इंटेलिजेंट वर्चुअल असिस्टेंट (आईवीए) की योजना बनाई गई थी।

Global Combat Air Program (GCAP)
GCAP यूनाइटेड किंगडम, जापान और इटली के नेतृत्व में एक बहुराष्ट्रीय पहल है, जिसका उद्देश्य संयुक्त रूप से छठी पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट को विकसित करना है। संबंधित सरकारों ने 9 दिसंबर, 2022 को इसकी घोषणा की। इसे दिसंबर 2023 में जापान में हस्ताक्षरित एक संधि के साथ पुख्ता किया गया।
कार्यक्रम में जापान की पहले से अलग छठी पीढ़ी की परियोजनाओं को विलय करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, BAE सिस्टम्स टेम्पेस्ट (यूके और इटली) और मित्सुबिशी एफ-एक्स कार्यक्रम को भी इसमें शामिसल किया जाएगा। इस प्रयास के लिए सहयोगी सरकारी मुख्यालय और औद्योगिक केंद्र यूके में स्थित होगा, जिसमें जापान पहला सीईओ और इटली व्यवसाय इकाई का पहला नेता प्रदान करेगा।
औपचारिक विकास चरण 2025 में शुरू होगा। प्रोटोटाइप फ्लाइट डेमोस्ट्रेटर 2027 के आसपास और विमान सेवा में शामिल होने की उम्मीद 2035 के आसपास है।
कार्यक्रम का उद्देश्य रॉयल एयर फोर्स (RAF) और इटैलियन एयर फोर्स के साथ सेवा में मौजूद यूरोफाइटर टाइफून और जापान एयर सेल्फ डिफेंस फोर्स (JASDF) के साथ सेवा में मौजूद मित्सुबिशी F-2 को बदलना है। इस विमान को बेचे जाने की भी योजना बनाई गई है, ताकि प्रति यूनिट लागत में और कमी आए।
क्या भारत को GCAP में होना चाहिए शामिल?
भारत अभी भी अपने पांचवीं पीढ़ी के विमान, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) के लिए तकनीक विकसित कर रहा है। भारत अभी भी एयरो-इंजन, AESA रडार, EW सिस्टम, आधुनिक हथियार, एक्शनेबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अन्य एडवांस एवियोनिक्स से संबंधित तकनीकों में काम कर रहा है। भारत में भी कुछ छठी पीढ़ी की तकनीकें विकसित की जा रही हैं और उन्हें AMCA में शामिल किया जाएगा।
चीन के पास पहले से ही 200 से ज्यादा J-20 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं। वे 2027 तक 400 और 2035 तक 1,000 J-20 लड़ाकू विमान बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। भारत का AMCA 2035 के आसपास ही सेवा में शामिल हो सकता है। जबकि, पाकिस्तान ने 2029 तक चीन से J-31 खरीदने के लिए समझौता किया है।
लिहाजा भारत पीछे नहीं रह सकता। और पांचवीं पीढ़ी के विमान को विकसित करने के बाद भी भारत को छठी पीढ़ी की तकनीकों पर काम शुरू करना होगा। और चूंकी छठी पीढ़ी के विमानों में लागत काफी ज्यादा है, लिहाजा इस प्रोग्राम पर अकेले चलना भारत के लिए व्यावहारिक विकल्प नहीं होगा।
यूरो टाइम्स के एक लेख में रिटायर्ड एयर मार्शल अनिल चोपड़ा का कहना है, कि भारत को LCA Mk2 और AMCA को जल्द से जल्द तैयार करना चाहिए और अपनी MUM-T "लॉयल विंगमैन" तकनीक को सही तरीके से विकसित करना चाहिए।
हालांकि कई देशों के पास सहयोगात्मक मार्ग हैं। क्या भारत को GCAP या फ्रांस के नेतृत्व वाले FCAS कार्यक्रम में शामिल होना चाहिए? ये निर्णय लेना कठिन है। सहयोग का मतलब है लागत और जोखिम साझा करना।
भारत पहले ही 5वीं पीढ़ी के लड़ाकू कार्यक्रम पर रूस के साथ अपनी उंगलियां जला चुका है। भारत अधिक संख्या में आवश्यक सैन्य प्रणालियों का लाभ उठा सकता है। लेकिन अब समय आ गया है, कि धीरे धीरे ही सही, लेकिन मजबूत कदम उठाए जाएं।












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